Saturday, December 29, 2012

कब होंगे हम इंसान..


वैज्ञानिक कहते है
हम बन्दर, चिम्पैज़ी, गुरिल्ले की
संतान हैं.
वो कहते है ,
कभी हमारी एक पूंछ होती थी.
पूँछ गायब हो गई ..
इन्सान होना एक प्रक्रिया है
यह प्रक्रिया हजारो साल से
 अनवरत जारी है..
हम लगातार कोशिश कर रहे है
 इन्सान बनने की.

हर बार हमारी कोशिश
चढ़ जाती है
हमारी लापरवाही की भेंट.
गलियों में घूमते बेख़ौफ़ भेडियों
ने हर बार हमारी उम्मीदों
पर हाथ साफ़ किया है..
हमारी हर कोशिश
हो जाती है बेमतलब.
हम अपने को आज भी,
 उसी चिम्पैंजी रूप में पाते है.
चारो तरफ कुत्ते, भेडिये,
और खूंखार जानवर..

दूर दूर तक जंगल सुनसान..
आखिर कब होंगे हम इंसान.?
अभी बहुत वक़्त लगेगा..
शायद १००/५००/१००० साल
या उससे भी ज्यादा..
आखिर कब तैयार होगी
 मानवता की बगिया,
कब तक दामिनियां
दरिंदगी की शिकार होंगी..
कब होंगे हम इंसान..
आखिर कब..?

सुनील सत्यम


Tuesday, December 25, 2012

ये मौसम गुलाबी..


यहाँ हर जगह शरदोत्सव,
और ये मौसम गुलाबी..
उधर हड्डियों में गलन  .
और उसकी तकदीर में खराबी.
यहाँ "अंगूरी" की आग,
वहां उसके फूटे भाग..
यहाँ देर तक अलाव होगा,
उसे चले जाना है आज रात ही,
सुबह उसका जलाव होगा..

Sunday, December 23, 2012

लखनवी गुलाबी ठण्ड


लखनवी गुलाबी ठण्ड..
गोमती नगर में हमारा होस्टल.
छुट्टियाँ और मै..
सिर्फ मै और दो चार मित्र
बाकी सब चम्पत..
श्यामलाल की बेड टी,
नाश्ता, खाना..
शाम को बेडमिन्टन कोर्ट
पर पसीना..
ठंडक गुलाबी से हिसाबी होने लगी..
कपडे गीले..चलो अब चाय पीले..
ठंडक गुलाबी नहीं है..

Monday, August 6, 2012

किसानों के लिए मासिक वेतन निर्धारित होना चाहिए.!!

खेत खलिहान और किसान की दशा सुधारने में सरकारी खेती, आमूलचूल परिवर्तन ला सकती है. इससे देश में उत्पादन की गुणवत्ता एवं गुणात्मकता भी बढ़ेगी. किसी फसल का अधिक्य होने पर उसके विनाश से भी बचा जा सकेगा.हर वर्ष देश में खरबों रुपये का खाद्यान्न भण्डारण के आभाव में नष्ट हो जाता है..
इस खेती में सरकार देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार फसल मानचित्र तैयार कराये और देश की आवश्यकता के हिसाब से किसी फसल के उत्पादन के लिए कुल भौगोलिक क्षेत्रफल निर्धारित कर दे.  सरकार देश के किसानो को सब्सिडी के बजाय मुफ्त में बीज-खाद-पानी दे. किसी फसल की क्षेत्र विशेष में प्रचलित उत्पादन दर को मानक मान कर उत्पादन के लिए लक्ष्य निर्धारित किया जाए. उससे अधिक उत्पादन होने पर किसानो के लिए बोनस की भी व्यवस्था होनी चाहिए ताकि किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.
किसान को उसकी भूमि का बाजार की प्रचलित कीमतों पर वार्षिक या मासिक आधार पर किराया दिया जाये. और किसानों के लिए मासिक वेतन निर्धारित होना चाहिए. क्योंकि इस व्यवस्था में किसान को सरकारी कर्मचारी के रूप में रखा जायेगा.
सरकारी खेती में किसान अपने लिए या बाजार के लिए उत्पादन न करके सरकार के लिए उत्पादन करेगा. फसल कटाई के बाद किसानों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार रियायती दरों पर फसल देकर शेष फसल सरकार अपनी आवश्यकताओं के लिए प्राप्त कर ले.
यदि हम इस व्यवस्था को अपना ले तो आत्महत्या के लिए मजबूर किसानों को तो रहत मिलेगी ही साथ में मंदी जैसी आपात स्थितियों से बचा जा सकेगा. किसान एवं ग्रामीण गरीब की दशा भी सुधरेगी..इसके माध्यम से हम भूख के अभिशाप और कुपोषण जैसी स्थितियों से भी बच सकेंगे. यह एक नयी अर्थव्यवस्था की और एक सार्थक कदम भी होगा..
एक प्रकार से यह ग्रामार्थाशास्त्र की शुरुआत होगी. सरकारी खेती का क्रियान्वयन ग्राम पंचायतों के माध्यम से होना चाहिए.  पंचायतों को प्रति वर्ष फसल विशेष के लिए सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य मिले. वेतन, बोनस एवं भूमि का मासिक/वार्षिक किराया भी पंचायतों के द्वारा ही सीधे किसानों को प्रदान किया जाना चाहिए.
                                               
                                                                                                                  कुंवर सुनील सत्यम.


Friday, August 3, 2012

मै बलिदान से नहीं डरता , सरकार मुझे अस्पताल ले जाकर मार देना चाहती है

हम अभी कुछ भूले नहीं हैं. रामदेव वाले आन्दोलन की यादे अभी ताजी है..जब जन आन्दोलन के सामने सरकार लगभग घुटने टेकने वाली थी..या कहे अगर बाबा का आन्दोलन उनके छुपे राजनितिक अजेंडे के लिए नहीं होता..या कहे की वह वन मेन आर्मी शो न होता..या कहे की बाबा अपने प्रवक्ता खुद ही न होते...बहुत सी ऐसी बाते....न कहे तो...

      कुल मिलाकर यदि उस रात कायरो की तरह महिलाओं के वस्त्र पहनकर बाबा रामदेव ने पीठ न दिखाई होती,,वो भागे नहीं होते तो तस्वीर कुछ और होती. उस समय पूरा देश दुखी था..एक आन्दोलन का बुरा अंत हुवा था..देश के चिंतको ने कहा था बाबा आखिर बाबा निकले , वहा आन्दोलन कारी नहीं है और बलिदान की उनकी सामर्थ्य नहीं है..वो डरपोक और कायर निकले..

    टीम अन्ना ने बाबा से सबक लिया और इसने देश के सामने ऐसा ज़ाहिर किया की " हम आज़ादी की दूसरी लड़ाई लड़ रहे है,.." आन्दोलन का अंतिम चरण आते आते अरविन्द केज़ारिवाल इतने अधीर हो गए की अन्ना की जगह लेने के लिए उन्होंने अघोषित रूप से पूरा जोर लगा दिया..खुद को आन्दोलन का बड़ा नेता प्रस्तुत करने में वह सफल भी सिद्ध हुवे.

  अरविन्द I R S है, दूरदृष्टि भी है, वे जानते थे की लोग बाबा की कायरता को भूले नहीं है. इसलिए उन्होंने जुलाई-अगस्त २०१२ के इस आन्दोलन में मंच से जनता की भावनाओं का खूब दोहन किया..और इस काम को अंजाम दिया सरकारी चिकित्सकों की इस राय ने कि अनशन के कारण अरविन्द की हालत बिगड़ रही है अतः उनको हॉस्पिटल में भारती करने कि जरुरत है.." इस बात का अरविन्द ने पूरा फायदा उठाने की कोशिश की और उन्होंने खुद को बलिदानी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की..उन्होंने मंच से जनता को बताया." आज तक जितने भी अनशनकारियों की मौत हुवी है वह अस्पताल जाकर ही हुवी है. और मै बलिदान से नहीं डरता , सरकार मुझे अस्पताल ले जाकर मार देना चाहती है, बलिदान और हत्या में फर्क होता है." इसप्रकार अरविन्द ने बिना किसी बलिदान के जनता को यह सन्देश दे दिया की वह बलिदान के लिए तैयार है..लेकिन सरकार उनकी हत्या करवाने की फ़िराक में है..

   मुझे या मेरे जैसो को ऐतराज़ अरविन्द केज़रिवाल या टीम अन्ना द्वारा राजनितिक पार्टी के गठन को लेकर नहीं है...ऐतराज़ है तो इस बात पर की अपनी राजनितिक महावाकान्क्षाओं की पूर्ति के लिए उन्होंने जनता की भावनाओं का व्यापार किया. अरविन्द और किरण बेदी जैसे पूर्व प्रशाशकों ने यह बिना किसी पूर्व निर्धारित रणनीति के किया हो..इसमें मुझे पूरा संदेह है. इतिहास इस बात का भी गवाह है की जब जब जन आन्दोलनों का नेतृत्व उच्च वर्ग के हाथ में रहा है तब तब उन्होंने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए, आवश्यकता पड़ने पर आंदोलनों को गिरवी रख दिया था. अब रामदेव के पास फिर से हीरो बनने का मौका है...मैदान खाली है और खिलाडी केवल एक--बाबा रामदेव..देखते रहिये..

Monday, July 2, 2012

आज मेघा ऐसे बरसो.

आज मेघा ऐसे बरसो.
याद रहे जो बरसों.
चलानी है आज मुझे,
वो कागज़ की कश्ती.
नहाना है बूंदों पे,
लोटा दो वो बचपन की मस्ती.
वो पानी में उछलना ,
वो कीचड़ में फिसलना,
वो देर से आना वापस घर को.
आज मेघा ऐसे गरजो,
याद रहे जो बरसों..
           
            ........कुंवर सत्यम.

Saturday, April 28, 2012

Friday, January 20, 2012

जातीय समीकरण और उत्तर प्रदेश चुनाव

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है. स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मीडिया की भूमिका आज के माहोल में और ज्यादा बढ़ गयी है..उत्तर प्रदेश सहित अन्य ५ राज्यों में चुनाव होने वाले है..लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव होते है चुनाव..यह देख कर दुःख होता है की चुनावी माहोल में धरातली मुद्दों को उभारने के बजाय मीडिया सिर्फ मसाला तलासती नजर आ रही है. उत्तर प्रदेश की हालत इतनी ख़राब दिख रही है की रचनात्मक एवं धरातली मुद्दे गौण हो गए है..विकास यहाँ मुद्दे के रूप में स्थापित नहीं हो पाया है. भ्रष्टाचार का मुद्दा यहाँ निस्तेज पड़ा दिखाई दे रहा है.
ऐसा लगता है की ये चुनाव उत्तर प्रदेश के लिए दुर्भाग्य का दरवाजा खोल देंगे ..
मुद्दे के आभाव में सिर्फ जातीय समीकरण ही चुनाव चर्चा का विषय बने हुवे है.. पार्टियाँ जातीय समीकरण के बहाने चुनावी वैतरणी पार करने की फ़िराक में है जो सिर्फ दुर्भाग्य ही ला सकता है.
बहन जी के चुनावी पंडितों ने २००७ के चुनावों का विश्लेषण सामाजिक इंजीनियरिंग के रूप में प्रचारित किया था, जो एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था. जब कि मेरा मत है कि कथित सामाजिक इंजीनियरिंग का परिणाम नहीं था कि मायावती जी को पूर्ण बहुमत मिला था. बल्कि इसका सबसे बड़ा कारण था कम मतदान होना. २००७ के चुनावों में ४५.९५% मत पड़े थे.
दलित और अति-पिछड़ा वोटर बसपा को वोट डालता है.गत चुनाव चिलचिलाती गर्मी के मौसम में हुवे थे जिसमे भाजपा और अन्य पार्टियों को वोट डालने वाला आराम पसंद वोटर बूथ तक ही नहीं पहुंचा . इसके विपरीत मेहनतकश दलित और पिछड़े मतदाताओं ने बसपा के लिए वोट किया और उसे पूर्ण बहुमत तक पहुँचाया.
गत चुनावों में हुवे मतदान के आंकड़ों पर नजर डाले तो बात स्पष्ट हो जाएगी.

वोटर मत प्रतिशत

अति-पिछड़े और दलित 80% मतदान
मुस्लिम 5०%
सवर्ण 27%
उच्च-पिछड़ा 27%

कुल मतदान ४६%

इस बार चुनाव के समय को देखते हुवे लगता है कि मत प्रतिशत ६० से ६५ % के बीच पहुँच जायेगा. अगर ऐसा हुवा तो बहन जी राजनितिक यात्रा कठिन लगती है.क्योंकि बढ़ा हुवा मत प्रतिशत ज्यादातर सपा और भाजपा को लाभ कि स्थिति में पहुंचा देगा.यदि मत प्रतिशत में होने वाली बढोतरी से स्वर्ण ५२ से ५५%, उच्च-पिछड़ा ५० से ५७% तक पहुँच गया. यद्यपि मुस्लिम मत प्रतिशत में भी ५ से ८ % कि मत वृद्धि कि संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.
बढे हुवे मत प्रतिशत का अल्प लाभ ही बसपा को मिलने कि संभावना है. सवर्णों के बढे हुवे मतदान का सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा.जबकि उच्च-पिछड़ों के बढे मत प्रतिशत का लाभ सपा और भाजपा दोनों को मिलेगा. ऐसे में यदि पहले और दूसरे नंबर पर भाजपा और सपा आसीन हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.बसपा ९० से ११० सीटो तक सिमट सकती है.
कांग्रेस ३५ से ४२ सीते प्राप्त कर सकती है. कुल मिलाकर राज्य का भाग्य पस्त करने में यह चुनाव अहम् भूमिका निभाएगा.

कुंवर सत्यम.

Sunday, January 15, 2012

चुनाव आयोग की मूर्तियां...!

चुनाव आयोग को इसकी वास्तविक महत्ता का भान तत्कालीन चुनाव आयुक्त टी.एन . शेषण ने कराया था. तब से लेकर आज तक यह चुनावोत्सव के सफलता पूर्वक कई aayojan कर चुका है.
हाल में ५ राज्यों में चुनावों का आयोजन होने जा रहा है. जिनकी तयारी में चुनाव आयोग कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता है. अनेक महत्वपूर्ण फैसले इस सन्दर्भ में चुनाव योग ले चुका है.
लेकिन इसी बीच एक हास्यास्पद और सनक से भरा फैसला भी योग ने लिया जो किसी भी तरह से तार्किक नहीं है. यह फैसला है हाथियों की मूर्तियों को ढकने का. मूर्तियों को ढकने में लाखो रुपये का खर्चा आयेगा जो सिर्फ फिजूल खर्च माना जाना चाहिए. हाथी की या किसी अन्य चुनाव चिन्ह की प्रतिमा बना देने मात्र से वोट नहीं मिलते..आज का मतदाता पहले से कही अधिक जागरूक है. उसे पता हिया की वह किसे और क्यों वोट देगा.
सभी व्यक्तियों के दो दो हाथ हैं जो कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है..लेकिन फिर भी लोग सिर्फ इसी वजह से कांग्रेस को वोट नहीं दे देते..
मूर्ती ढकने का मूर्खता पूर्ण फैसला लेने से चुनाव आयोग बसपा का चुना प्रचार ही कर रहा है..जब से यह खबर बनी तब से अनेक बार टीवी चैनल हाथी की मूर्तियों का प्रसारण कर चुके है और अनेक बार समाचार पत्र इनकी तस्वीरे प्रकाशित कर चुके है..यहाँ काम अगर करना ही था तो इन मूर्तियों की तस्वीरो से सम्बंधित खबरे प्रकाशित होने एवं उनके प्रसारण को रोकने की व्यवस्था चुनाव आयोग क्यों नहीं कर पाया. क्या एक चुनाव आयुक्त की सनक पूरा करने का खर्च उठाने के लिए देश की जनता विवश है..

चुनाव आयोग की जिम्मेदारी लोकतंत्र के सबसे बड़े रक्षक की भूमिका निभाने की है..मदारी की नहीं...

कुंवर सत्यम.

Tuesday, November 29, 2011

काला धन या कला धन....?

देश में आजकल काला धन चर्चा में है. बड़ी बड़ी बाते हो रही है. रामदेव और आडवाणी जी विरोध में ताल थोक रहे है कि विदेश से काला धन वापस लाया जाये. सरकार के पसीने छूट रहे है, उसे आशंका है कि देश कि जनता कही इसकी भारी कीमत न वसूल कर ले...चुनाव में.

काला धन क्यों उत्पन्न हो गया इससे जनता को कुछ खास लेना देना नहीं है. कुछ अ[वादों को छोड़ दे ( नेताओं के पैसे को ) तो विदेश में जमा अधिकांश काला धन टैक्स व्यवस्था में अन्तर्निहित खामियों के कारन पैदा हुवा है..ये उस समय में इकठ्ठा हुवा जब फेरा जैसे कानूनों का दौर था.टैक्स डरे बहुत ज्यादा थी.सुविधाओं और प्रोत्साहन के नाम पर बाबुओं कि दुत्कार के आलावा कुछ नहीं था.. ऐसे में अपनी मेहनत कि कमाई कोई टैक्स के रूप में क्यों देना चाहेगा . नतीजा काला धन के रूप में आया..हम इसे कला धन भी कह सकते है.. क्योंकि इसे इसके मालिकों ने अपनी कला से कमाया था जिसे वे ऐसी निकम्मी सरकार को नहीं देना चाहते थे जो बदले में उनको कोई भी सुविधा न देती हो..जिसके नेता चोर हो. और इतना ही नहीं गोपनीयता के नाम पर उनके सारे काले कारनामों को सुरक्षा का मजबूत आवरण उपलब्ध हो..घोटाले बाज नेताओं का मकसद ही जनता कि गाढ़ी कमाई को चाट कर जाना रहा हो..

विदेश में जमा काले धन को दो वर्गों में बांटा जा सकता है.
१. ऐसा धन जो ऊंची टैक्स दरो से बचने के लिए विदेश में जमा किया गया है..यह मुख्य रूप से व्यवसाइयों एवं उद्योगपतियों का पैसा है.

इस पैसे को विदेश से भारत लाकर आज कि टैक्स दरों के हिसाब से टैक्स काटकर इसके मालिको को सौंप देना चाहिए ताकि यह पैसा देशी अर्थव्यस्था को मजबूती प्रदान कर इसके साथ यह शर्त होनी चाहिए कि इस पैसे का उपयोग ये लोग ग्रामीण उद्योगीकरण, ग्रामीण सड़को एवं परिवहन के उन्नतीकरण एवं ग्रामीण क्षेत्रों के विद्युतीकरण में करेंगे.

२. दूसरी श्रेणी में ऐसा पैसा है जो नेताओं ने इस देश को लूटकर कमाया है. ऐसे धन को वापस लाकर राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर देना चाहिए. देश को लूटने वाले इन नेताओं के विरुद्ध कठोर क़ानूनी कार्यवाही कि जनि चाहिए. इस पैसे का उपयोग देश में आधारभूत सरंचना को मजबूत करने, कृषि अर्थव्यवस्था में अनुसन्धान एवं गरीबी उन्मूलन योजनाओं पर खर्च करना चाहिए.

उपरोक्त के अतिरिक्त काले धन का एक और वर्ग है जिस के बारे में कोई बात करने को तैयार नहीं है..यह है इस देश के मठ, मंदिर मस्जिद,आश्रमों चर्चों और गुरद्वारों में दबा अथाह धन का भंडार..सरकार सभी दलों की सहमति से देश के सभी धार्मिक स्थानों को वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर ट्रस्टों को सौंप दे ताकि वहां चल रही धार्मिक लूट को रोक कर इस पैसे का धार्मिक स्थानों के विकास एवं सञ्चालन के साथ साथ देश की आर्थिक उन्नति के लिए भी प्रयोग किया जा सके. ऐसा करने से इन धार्मिक स्थानों पर कार्यरत लोगो को तो सरकारी सरंक्षण मिलेगा ही और बहुत से लोगो को भी वहां रोजगार दिया जा सकता है..

कुंवर सत्यम..

Wednesday, November 23, 2011

ईंट की गाड़ी.

गुल्ली डंडा ,

पिट्ठू जिंदाबाद.

गोल का टोरा..
चोट गोली पिल..
रेत से वो घर बनाना.
कंदूरी से भैंस -बैल बनाना.

ईंट की गाड़ी.
मुह से घुरघुर
करके गाड़ी चलने की,
आवाज निकालना..
जितना आनंद देता था
उतना आज सचमुच की लग्जरी
गाड़ी चलाने में भी नहीं आता.

क्यों नहीं बचपना
जवान हो जाता
अपनी उसी सादगी के साथ.

कुंवर सत्यम.

Sunday, November 13, 2011

TET EXAM...

केंद्र के साथ साथ राज्यों में भी TET परीक्षा लागू कर दी गई है. बेरोजगारी का आलम है की आप किसी भी चीज के लिए कोई परीक्षा पद्दति लागु कर दे तो दो चार लाख की भीड़ आराम से मिल जाएगी. जिस किसी भी महाशय ने शिक्षकों की योग्यता परखने के लिए टेट का सुझाव दिया होगा वह भी अपने आप को धन्य मान रहा होगा की उसका दिया सुझाव लागू हो गया है..

टेट की नौटंकी की कीमत लाखों बेरोजगार युवक आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार से चुकायेंगे. टेट एक नौटंकी परीक्षा है यह किसी रोजगार की गारंटी नहीं है. tet का अर्थ है teacher 's elegibility test अर्थात अध्यापक पात्रता (योग्यता) परीक्षा . यह परीक्षा पास करने वालो को योग्यता का प्रमाण पत्र मिलेगा जो इस बात का प्रमाण होगा का certificate धारक अध्यापक नियुक्त किये जाने के योग्य है..लेकिन उसकी योग्यता का यह प्रमाण पत्र उसे जीवनभर कही अध्यापक नियुक्त करवा सकेगा इस बात की कोई गारंटी नहीं है.यानि कि जीवन भर युवक को हताशामय जिंदगी जीने की गारंटी जरुर मिलेगी...धारक को हमेशा एक बात सालती रहेगी की योग्य होने के बावजूद भी उसके पास नौकरी नहीं है.

टेट का दूसरा पहलु यह है की टेट की परीक्षा पास करने के बाद भी प्रमाण पत्र धारक को नोकरी पाने के लिए दोबारा परीक्षा पास करनी होगी. जब दोबारा, तिबारा परीक्षा पास करके ही नोकरी मिलनी है तो टेट के नाम पर युवा शक्ति की योग्यता का मखौल क्यों.?

हम सब जानते है की आज B.Ed. करने के नाम पर हजारो संस्थान कुकुरमुत्तों की भांति सड़क के दोनों किनारों पर उग आये है. वहां बी.एड. की डिग्री कैसे मिलाती है यह किसी से छुपा नहीं है..उत्तर प्रदेश सरकार ने विशिष्ट बी.टी.सी की शुरुवात की थी ..जिसने प्रदेश में हजारो युवको को रोजगार तो दिया लेकिन उनकी योग्यता आंकने के लिए कोई परीक्षा क्यों नहीं ली गई ? इस बात पर कोई प्रशन कही किसी ने नहीं पूछा. जब यही सब होना है तो फिर टेट का नाटक क्यों? और अगर टेट परीक्षा से योग्यता की परीक्षा होनी है ( जो संभव है ) तो फिर टेट पास करने के बाद भी नौकरी की गारंटी क्यों नहीं.?
सवाल यह है की युवा शक्ति की शक्ति का मखौल कब तक उड़ाया जाता रहेगा..क्या वास्तव में कोई राजनितिक दल युवा शक्ति की शक्ति का राष्ट्रहित में सदुपयोग कर पायेगा.

कुंवर सत्यम.

Tuesday, November 1, 2011

दिग्विजय को चाहिए चंदे का हिसाब..

दिग्विजय सिंह अन्ना आन्दोलन के धुर विरोधी है. उन्होंने हमेशा आन्दोलन की निंदा की है. उनका हर संभव प्रयास आन्दोलन को किसी भी प्रकार से बदनाम करने का रहा है. अन्ना आन्दोलन को उन्होंने चवन्नी का दान नहीं दिया. लेकिन उन्हें आन्दोलन को मिले चंदे का हिसाब चाहिए. एक-एक पाई का हिसाब चाहिए दिग्विजय को.. देश की जनता , जिसने १५ दिन के अन्दर आन्दोलन को लगभग ३ करोड़ रुपये का चंदा दिया, उसने कभी आन्दोलन से चंदे के पैसे का हिसाब नहीं माँगा. जनता को अपने सामाजिक नेतृत्व पर भरोसा है इसीलिए उसने आन्दोलनकारियों से हिसाब नहीं माँगा.
अच्छा रहता की दिग्विजय सिंह ने दिल्ली में हुए commanwealth games में हुए खर्च का हिसाब शीला दीक्षित से माँगा होता. कांग्रेस को मिले राजनितिक चंदे का कभी हिसाब माँगा होता. अच्छा रहता उन्होंने दिल्ली में बन रहे सिग्नेचर ब्रिज पर हो रही लूट का दिल्ली की मुख्यमंत्री से हिसाब माँगा होता.
ऐसे बहुत से हिसाब है जो यदि दिग्विजय सिंह ने मांगे होते तो उनके साथ-साथ कांग्रेस की छवि भी सुधरी होती..

कुंवर सत्यम

Saturday, October 29, 2011

जिन्ना भारत विभाजन के लिए जिम्मेदार नहीं थे.

अन्ना के संघ से संबंधों पर दिग्विजय सिंह ने ऐसे हाय तौबा मचा रखी है जैसे कि संघ ही अल-कायदा हो.
यह समझ से परे है कि दिग्विजय सिंह ओसामा बिन लादेन जैसे कुख्यात आतंकवादी को तो ओसामा जी कहकर संबोधित करते है और संघ से इतनी चिढ रखते है. देश का पढ़ा लिखा मुस्लिम वर्ग भी समझता है कि क्या संघ उनके खिलाफ है.? दिग्विजय सिंह की यह हाय तौबा मुस्लिम वोटो के लिए एक नौटंकी है.. लेकिन कांग्रेस इस समय आपातकाल के समय की लोकप्रियता के स्तर से भी न्यूनतम स्तर पर है..
दिग्विजय सिंह को शुभ कामनाये कि वह कांग्रेस की लोकप्रियता के गिरते ग्राफ को ऊपर उठा सके. इसके लिए जरुरी है कि उन्हें अपने बयानों को और ज्यादा घटियातम बनाना होगा.
आनेवाले दिनों में दिग्विजय सिंह कुछ और बयान दे सकते है...जैसे..

* जिन्ना भारत विभाजन के लिए जिम्मेदार नहीं थे. मुस्लिम लीग कांग्रेस जितनी ही देशभक्त पार्टी थी. हिन्दू महासभा और संघ ने उसे विभाजन का मार्ग चुनने के लिए मजबूर किया था.

* आपातकाल लगने के पीछे संघ कि गतिविधियाँ जिम्मेदार थी. संघ ने इंदिरा जी कि हत्या का षड्यंत्र रचा था जिसकी खबर मिलने पर इंदिरा जी ने भय के कारण आपातकाल कि घोषणा की थी.

* भारत-पाक युद्धों के लिए संघ ही जिम्मेदार था. पाकिस्तान कि मंशा भारत पर आक्रमण करना नहीं था. क्योंकि संघ हिंदुस्तान के मुस्लिमो का कत्ले-आम करना चाहता था अतः उनकी रक्षा के लिए ही पाक ने भारत पर आक्रमण किया था.

* कारगिल युद्ध का षड़यंत्र तत्कालीन भाजपा सरकार ने अपनी लोक प्रियता बढ़ाने के लिए किया था. कश्मीर में उस समय पाकिस्तान कि और से कोई घुसपैठ नहीं हुई थी.. भाजपा ने जेलों में बांध पाकिस्तानी कैदियों को मारकर यह दिखाया था कि ये वह घुसपैठिये है जिनकी कारगिल युद्ध में मोत हुई है.

* भारतीय संसद पर हमला, मुंबई आतंकवादी हमलो, दिल्ली विस्फोटों के पीछे संघ परिवार का हाथ है.. आगामी चुनावों को देखते हुए संघ देश के विभिन्न हिस्सों में विस्फोटों कि साजिश रच रहा है.

* संघ मेरी हत्या का षड्यंत्र रच रहा है. मेरे ऊपर हमला हो सकता है. इसके लिए संघ जिम्मेदार होगा..

* कोमनवैल्थ खेलों में हुए घोटाले की लिए भाजपा सरकार जिम्मेदार है. भाजपा सरकार के समय में भारत को इन खेलो की मेजबानी सौंपी गई थी. तभी इस घोटाले की नीव पड़ गई थी. कलमाड़ी निर्दोष है.

इस प्रकार के बयान आने वाले दिनों में यदि आपको सुने पड़े तो आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए..

कुंवर सत्यम.

Friday, October 28, 2011

मनु अभी जिन्दा हैं.


मनु अभी जिन्दा हैं..राजा ने उन्हें आखिरकार जिन्दा कर ही दिया..

मायावती बहन ने मनु को इतनी गाली दे दी थी की उनकी मौत ही हो गई थी,, ऐसा लगने लगा था.अपने राजनितिक सफ़र को गति प्रदान करने के लिए मायावती जी के पास कोई मुद्दा नहीं था.. उनके पास यदि कुछ था तो वह था सदियों से दमित समाज को आत्मविश्वास से भर देने वाले कुछ नारे..तिलक,तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार..और मनु को ज्यादा से ज्यादा गलियों से संबोधित करना.. दलित वोट बैंक को संगठित करने के बाद मायावती ने सर्वसमाज की वैतरणी से राजनितिक दरिया को पार करके सिंहासन सुख चखा ...सर्वसमाज की बाते होने लगी तो मनु महाराज गौण हो गए.हम तो भूल ही गए थे मनु को..
  लेकिन अब महाराजा दिग्विजय सिंह ने मनु को पुनरजीवित  कर दिया है.मनु ने लगभग ३५० ईस्वी के आस पास कानून की पुस्तक मनुस्मृति की रचना की थी .इसमें उन्होंने जाति आधारित दंड संहिता की व्यवस्था की थी..मै समझता हूँ इस संदर्भ में अधिक गहराई में जाने की जरुरत नहीं है.
अब जब सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था तो राजा दिग्विजय सिंह को मनु की जरुरत महसूस हुई . दिग्विजय सिंह राजा है तो उन्होंने क़ानूनी सलाहकार की जरुरत पड़ती ही है. दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव के व्यवसायिक रूप से चिढ़ते है, वे उन्हें दण्डित करना चाहते है. लेकिन गलती से आज भारत में लोक-तंत्र है अतः राजा साहब यूँ ही किसी को पकड़-कर दण्डित नहीं कर सकते है. ऐसे में वह सिर्फ किस स्थिति में किस व्यक्ति को क्या दंड दिया जाना चाहिए, यही व्यक्त कर सकते है. भारतीय लोक-तंत्र में दिग्विजय सिंह जी जैसे कुछ लोग राज-तंत्र के अंतिम स्तम्भ है. अतः इनका राज-धर्म बनता है की ये राज-तंत्र की आत्मा को जिन्दा रखे.यह काम सिर्फ बयानबाजी से संभव है.. और यह काम राजा साहब बखूबी कर रहे है. राजा साहब ने मनुस्मृति से संदर्भ देते हुवे कहा है की ' यदि कोई व्यक्ति सन्यासी के वेश में व्यवसाय करे तो राजा का धर्म है की वह उसके गले में भारी पत्थर बाँध कर उसे नदी में डूबा दे,."
दिग्विजय जी के राज-तंत्र में विरोधी आवाज के लिए कोई स्थान नहीं है..यही राजतन्त्र की वास्तविक आत्मा है. यदि दिग्गी हिंदुस्तान के वास्तविक राजा होते तो सबसे पहले RSS को नेस्तनाबूद कर दिया जाता.भाजपा सहित तमाम विपक्षी दलों को समाप्त कर दिया जाता.हिंदुस्तान में सिर्फ एक दल होता..कांग्रेस..
 रामदेव, अन्ना आदि कोई भी व्यक्ति यदि सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के खिलाफ बोलेगा तो उसे
येन-केन-प्रकरणेंन बदनाम करके ठिकाने लगाने के समस्त प्रबंध किये जायेंगे. दिग्गी साहब बखूबी जानते है की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से प्राप्त सत्ता में राजतंत्र की चासनी कैसे लगाई जा सकती है. सत्ता प्रतिष्ठान का प्रयोग लोकतंत्र को बंधक बनाने में कैसे किया जा सकता है , यह भी वह जानते है. जो भी लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना आदि के साथ खड़े होंगे, उनसे जुड़े सारे ऐसे दस्तावेज ढूंढ निकाले जायेंगे जो उन्हें नंगा कर सके.बस टिकट में २ रुपये बचा लेने तक की तुलना भी कलमाड़ी जैसे माननीयों के घपलों से कर दी जाएगी.
इस देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आज अगर कोई खड़ा है तो वह सोनिया जी और कांग्रेस है, ऐसा दिग्गी साहब का मानना है. यह सही भी है क्योंकि कई कांग्रेसी इस समय तिहाड़ में छुट्टियाँ बिता रहे है. कांग्रेस उन्हें जेल जाने से रोक तो नहीं सकती थी लेकिन उनके जेल जाने को राजनितिक रूप से भुनाया तो जा ही सकता है.. दिग्गी महाराज कलमाड़ी के लिए सार्वजनिक रूप से टीवी पार दुवा कर रहे है की वह अपने आप को निर्दोष साबित कर सके.

मैंने पहले भी कहा है की देश में दिग्विजय-वाद का उदय हो रहा है. दिग्विजय-वाद की आत्मा है- लोकतंत्र के साथ राजतन्त्र का काकटेल. इसमे हमें मनु की जरुरत हमेशा रहेगी ही. दिग्विजय-वाद कभी मनु को मरने ही नहीं देगा. अब हमें देखना यह है की हमेशा मनु की मुखर विरोधी रही बहन जी इस के साथ कैसे सामंजस्य बैठाती है.

भारत अब दुनिया में गांधीवाद के साथ-साथ दिग्विजय-वाद के लिए भी जाना जायेगा.

कुंवर सत्यम.

दिग्विजय- वाद का आगमन होने वाला है



दिग्विजय सिंह को इस देश के महानतम नेताओं में शामिल किया जायेगा.आये दिन वह जो बयान दे रहे है उनका संकलन करके गाँधी-वाद, मार्क्स-वाद आदि की भांति  दिग्विजय- वाद का आगमन होने वाला है. दिग्विजय-वाद में धारा के उलटे चलने की सीख निहित होगी. हमारी समझ बहुत छोटी है..सो हम अभी उनकी महानता का अंदाजा नहीं लगा सकते है..कबीर की उलटबांसियों की ही भांति  दिग्विजय सिंह जी के बयानों के भी कुछ विशेष अर्थ है जिसे हम मूर्ख-अज्ञानी लोग नहीं समझ सकते है..
गाँधी वाद हमें दुश्मन के ह्रदय परिवर्तन का दर्शन देता है..अगर कोई तुम्हारे एक गाल  पर थप्पड़ मारे  तो तुम दूसरा आगे कर दो..और जब दूसरे पर मारे तो पहला...यही क्रम लगातार तब तक दोहराते रहो जब तक उसके हाथ न दुखने लगे..यही वह ज्ञान है जो सहनशीलता की वृद्धि करता है..गाँधी जी कहते थे की पाप से घृणा करो पापी से नहीं..दिग्विजय सिंह जी ने इसका व्यवहारिक तोड़ दे दिया जब उन्होंने ओसामा बिन लादेन को ओसामा जी कहकर संबोधित किया था..यानि आतंकवाद से घृणा करो आतंकी से नहीं..आखिर वो भी तो हम जैसे ही इन्सान है.दो चार दस निर्दोष लोगो को किसी आतंकवादी ने मार भी दिया तो क्या..? गलती तो किसी से भी हो सकती है..जो गलती नहीं करता वह सिर्फ भगवान ही हो सकता है..
यदि कोई आतंकवादी किसी आतंकी घटना में  पकड़ा जाता है तो उसे हमें उसे जेल में नहीं सडाना चाहिए बल्कि चार्ज शीट दायर करके उसे जमानत देकर उसके मानवाधिकारो का  सम्मान करना चाहिए. इतनी उदारता सिर्फ दिगविजयवाद की ही विशेषता हो सकती है. सुरेश कलमाड़ी जी एवं राजा जी जैसे प्रतिभाशाली राजनीतिज्ञों की जगह तिहाड़ में नहीं होनी चाहिए. अमरीका ने उदरता  का परिचय देते हुवे रजत गुप्ता  को चार्ज शीट दायर करने के बाद जमानत पर रिहा कर दिया है.. क्योंकि अमेरिका जानता है की रजत जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति की जगह जेल में नहीं होनी चाहिए ..... अमेरिका ऐसा सोच सकता  है क्योंकि वह अमेरिका है.. हम ऐसा नहीं सोच सकते  है क्योंकि हमारे पास सिर्फ एक ही दिग्विजय सिंह है ...लेकिन अब हम ऐसा सोच सकते है क्योंकि अब हमारे पास दिगविजयवाद है. हमें कलमाड़ी जैसी प्रतिभाओं का देश हित में लाभ उठाना चाहिए न की उन्हें जेलों में सड़ने के लिए छोड़ देना चाहिए.
देश की संसद पर बम फेंकने वाले "अफजल जी" जैसे महान लोगों के मानवाधिकारों का सम्मान करते हुवे उन्हें जमानत पर रिहा कर देना चाहिए. मै तो कहूँगा की उन्हें मेरे गृह जनपद प्रबुद्ध नगर से सांसद चुनाव भी लडवा देना चाहिए.
  आइये प्रणाम करते है भारत और  दुनिया को एक नई दृष्टि   " दिग्विजय वाद " देने के लिए श्री दिग्विजय सिंह जी को..

कुंवर सत्यम.

Thursday, October 27, 2011

महंगाई का अर्थशास्त्र..महंगाई का बम ..

आम भारतीय महंगाई का अर्थशास्त्र नहीं समझता है. आये दिन मीडिया में महंगाई को लेकर शौर मचता है. कांग्रेस के किसी प्रवक्ता से पूछो तो कहता है की ये वित्त मंत्री से सम्बंधित है अतः आप उन्ही से पूछो की महंगाई कब ख़त्म होगी. जैसे वित्त मंत्री विपक्ष के मंत्री हो. प्रणव मुखर्जी और यहाँ तक की मनमोहन सिंह देश के उच्च कोटि के अर्थशास्त्री है क्या वो नहीं जानते की महंगाई का मूल कारन क्या है.? यह विश्वास करने के कोई कारन नहीं है की ये दोनों ही महंगाई के कारणों एवं निवारण से अनभिज्ञ हैं.

मेरी अपनी सोच शायद छोटी हो लेकिन भारत जैसे विकाशशील देशों में महंगाई का कारन वैश्विक नहीं है. एक ऐसे देश में जहाँ वैश्विक आर्थिक मंदी भी अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए ज्यादा चिंता का कारन नहीं बन पाई हो महंगाई के कारणों को वैश्विक परिदृश्य से जोड़ना गले नहीं उतरता है.

अर्थशास्त्र मांग और पूर्ति के सिद्दांत का आंख बंद करके पालन करता है. फिर मांग चाहे वास्तविक हो या कृत्रिम..देश की जनसँख्या यदि आज की परस्थितियों में १.५ अरब के बजाय २.५ अरब भी हो तो देश का किसान उसका आसानी से पेट भर सकता है वह भी आज दिनांक २६ अक्तूबर २०११ की कीमतों से भी कम पर..बशर्ते मांग को अनार्थिक तरीको से बढाया न जाये.

मेरी एवं मुझसे अधिक आयु के लोग अच्छी तरह से जानते होंगे की ७० एवं ८० के दशक में सरकारी लेवी की पूर्ति के लिए सरकार किसानों से उनका अधिशेष उत्पादन जबरन खरीद लेती थी और किसानो की आड़ में मुनाफाखोरों द्वारा पूर्ति को कृत्रिम तरीके से प्रभावित करके मूल्य वृद्धि को रोक देती थी.यहाँ तक की कई बार तो किसानो द्वारा भविष्य की आवश्यकताओं के लिए संगृहीत अनाज भी सरकार छीन लेती थी और कुछ दिनों बाद किसानो को खुद भी महँगी दरों पर अनाज खरीदना पड़ता था..



वैश्विकरण की अंधी दौड़ में सामाजिक सरोकार इतने पीछे छूट गए है कि अब सरकार खुद ही व्यापारी की भूमिका में खड़ी हो गई और वह भी घ्रणित कमीसन खोर एजेंट के रूप में.

विशेष कर सन २००० के बाद सरकार ने खाद्य एवं अन्य दैनिक जरुरी उत्पादों की सरकारी जुआं-गिरी को संस्थागत रूप प्रदान कर दिया है. बाजार में खाद्य एवं जरुरी वस्तुओं की अनार्थिक मांग बढ़ने के सभी उपाय सरकार ने कर दिए है.

देश में प्रतिदिन बेतहाशा बढ़ती महंगाई का प्रमुख कारन देश में कमोडिटी एक्सचेंज की शुरुवात होना है. कमोडिटी एक्सचेंज में कमोडिटीज जैसे कच्चे तेल , खाद्य पदार्थ तथा सोना , चांदी जैसी वस्तुओं का व्यापर होता है. किसी वस्तु की आगामी भविष्य की कीमतों का अनुमान लगाकर उसकी खरीद बिक्री करना यानि फ्यूचर ट्रेडिंग का कार्य ही कमोडिटी बाजार की खाशियत है. यानि कमोडिटी मार्केट में वस्तुओं का भौतिक रूप में नहीं बल्कि उनकी कीमत का व्यापर होता है..इस प्रकार वस्तु की आपूर्ति का यहाँ कोई महत्व नहीं है..जितना है उससे कही ज्यादा मात्रा में वस्तुए बेचीं जा सकती है, खरीदी जा सकती है..यहाँ हर समय हर वस्तु की अप्रत्याशित मांग बनी रहती है अतः हरपल कीमते परिवर्तित होती रहती है..रिजर्व बैंक अपनी रेपो रेट,बैंक रेट,CRR आदि नियंत्रक गतिविधियों से भी कमोडिटी मार्केट में कीमत व्यापर को नियंत्रित नहीं कर सकता है.यहाँ लोग छः महीने से भी पहले किसी वस्तु की कीमत का अनुमान लगाकर उसकी खरीद बिक्री कर सकते है..एक प्रकार से कमोडिटी मार्केट कालाबाजारी के सरकारी बाजार है.

भारत में वैसे तो सन २००२ में कमोडिटी बाजार का प्रराम्भा हो गया था लेकिन यह सिर्फ सांकेतिक था.इसमें प्राय धातुओं का व्यापर होता था.२००३ में MCX भी शुरू हो गया था. लेकिन ३ मई २००५ से NCDEXAGRI देश में कृषिगत वस्तुओं का पहला सूचकांक है ..

एक अनुमान के अनुशार देश का कमोडिटी बाजार शेयर बाजार की तुलना में ५ गुना बड़ा है. २००५ में इसके शुरू होने से लेकर २००८-०९ तक कमोडिटी ट्रेडिंग में ३१ गुना वृद्धि दर्ज की गई है..

सत्ता के खेल में शामिल पक्ष हो या विपक्ष, अधिकांश लोग सरकारी कालाबाजारी के बाजार में शामिल है.

महंगाई का बम महंगाई को कम करने की जद्दोजहद के बीच ही अचानक फट पड़ा है..टीवी पर एक दो दिन बहसों का नहीं तू तू मै मै का दौर चलेगा. सब कुछ सामान्य हो जायेगा. न करे रुकेंगी न अर्थव्यवस्था की गति कम होगी.विपक्षी दलो के लोग फिर इंतजार करेंगे नए महंगाई बम के फटने का.. जिंदाबाद -मुर्दाबाद का दौर यूँ ही चलता रहेगा.


आम आदमी की बिना इलाज के वहीँ दूर गाँव में मौत हो जाएगी.

इति भारतम


मै समझता हूँ की अब एक आम आदमी भी समझ सकता है की कमोडिटी मार्केट के रहते हुवे क्या कोई उपाय है जो कथित महंगाई को रोक सके..



कुंवर सत्यम.


Wednesday, September 21, 2011

लोकतंत्र जिंदाबाद,जनता जिंदाबाद.

स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष जरुरी होता है.लोकतंत्र में विपक्षी दल की भूमिका कंट्रोल रूम की भांति होती है. अगर किसी व्यवस्था का कंट्रोल रूम ठीक से काम न करे तो हम समझ सकते है कि कितनी समस्या हो सकती है. देश हितो के खिलाफ किसी मुद्दे पर विरोध दर्ज करना विपक्षी दल का राष्ट्र - धर्म होता है..अगर विपक्ष अपने कम में सफल नहीं होता है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे का निशान माना जाना चाहिए. इसके दो ही अर्थ हो सकते है.. १. विपक्ष सत्ता के किसी भी प्रकार से प्रभाव में है..उसने या तो रिश्वत ली है अथवा राजनतिक लाभ लेकर लोकतान्त्रिक हितों को गिरवी रख दिया है. अथवा २. विपक्ष बहुत कमजोर है. इस समय देश में राजग प्रमुख विपक्षी गठबंधन है तथा भाजपा प्रमुख विपक्षी दल. विभिन्न अवसरों पर इसने अपना प्रबल विरोध दर्ज करके लोकतंत्र कि सेवा की है. और अपने आप को सिद्ध किया है. दर-असल हम लोग यह मन लेते है की देश में सिर्फ सत्ता-दल की ही भूमिका होती है..विपक्ष के पास कोई काम नहीं होता. हमारे अन्दर एक खूबी और है की हमें लोकतंत्र के स्वास्थ्य से कोई लेना देना नहीं होता वरन हम जिस दल से भी जुडाव रखते है उसी के प्रवक्ता बन जाते है.अपनी पार्टी के कुकर्त्यों पर पानी डाल देना और दूसरी के अच्छे कार्यों को भी महत्वहीन करार देना हमारा पार्टी धर्म बन जाता है जिसका अधिकांश भारतीय जी-जान से निर्वाह करते है. छोटे छोटे मुद्दों को पार्टी से जोड़ कर आम आदमी भी ऐसे बयान जारी करता है जैसे वह उसका राष्ट्रीय प्रवक्ता हो. भले ही पार्टी में किसी भी स्तर पर उसकी व्यक्तिगत हैसियत कुछ भी न हो..मेरे कहने का अभिप्राय है की हर व्यक्ति अपनी पार्टी के लिए मनीष तिवारी बन जाना चाहता है..यह पृवृत्ति लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक संक्रमण का संकेत है. एक जागरूक लोकतंत्र-प्रेमी को पार्टी से ऊपर उठकर लोकतंत्र की रक्षा एवं राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए. भ्रष्टाचार इस समय एक राष्ट्रीय मुद्दा है.अन्ना आन्दोलन को अभी ज्यादा दिन नहीं हुवे हैं.पूरे देश को इस मुद्दे ने प्रभावित किया है.महंगाई की कोई सीमा रेखा नहीं है.उस पर वास्तविकता से बेखबर हमारे मंत्री महोदय कुछ गैर जिम्मेदाराना बयान जारी करके जले पर नमक छिड़कने का काम कर देते हैं..जैसे महंगाई बढने का प्रमुख कारण अन्य कारणों के साथ सरकार द्वारा यह भी बताया जा रहा है कि अब ज्यादातर लोगो ने क्योंकि सब्जियां खानी शुरू कर दी है अतः मूल्य वृद्धि स्वाअभाविक है .इसी प्रकार एक कारण यह भी बताया गया है कि लोगो कि भोजन सम्बन्धी आदतें बदल रही है अतः खाद्य वस्तुओं कि कमी के कारण मूल्य बढ रहे है.. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तो स्थिति यह है कि अन्ना आन्दोलन के बाद ऐसा लगता है सरकार यही तय नहीं कर पा रही है कि किसे भ्रष्ट माना जाए.रिश्वत देनेवाले को,लेने वाले को या फिर न लेने वाले को. अगर ऐसा नहीं होता तो" कैश फॉर वोट " कांड में सरकार सभी को एक तराजू में नहीं तोलती.भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा पहली बार हुवा है कि रिश्वत खोरी का भांडाफोड़ करने वालों को सजा मिली हो.भाजपा के पूर्व सांसदों ने नुक्लियर डील मसले पर सरकार के पक्ष में वोट डालने के लिए मिले एक-एक करोड़ रूपये लेकर अगर अपनी जेबे गरम कर ली होती तो शायद सांसद रिश्वत-काण्ड कि हकीक़त से सारा देश वंचित रह जाता .अमर सिंह जी के राजनीतिक चरित्र को सारा देश जानता है.उनके काल कि किसी पोलिटिकल होर्स ट्रेडिंग में वह शामिल न रहे हो इस बात के सबूत नहीं हैं..लेकिन उनके साथ साथ उनकी असलियत को सामने वालो को जो इनाम मिला है.उसकी प्रशंशा में मेरे पास तो शब्द नहीं है.यह हमारे लोकतंत्र कि सेहत के लिए ठीक नहीं है. हमें दलगत सोच से ऊपर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी कि इस बात का समर्थन करना चाहिए कि उन्होंने उस समय के विपक्ष का नेता होने के नाते कुलस्ते एवं भगोरा द्वारा संसद में रिश्वत में मिले नोटों को दिखाने के काम के लिए खुद को जिम्मेवार मानकर सरकार से खुद को भी जेल में डालने कि मांग कर डाली.राजनितिक चश्मा लगाये हुवे लोगो को इसमें नोटंकी,ड्रामा या राजनितिक लाभ पाने कि आशा में किया जाने वाला प्रपंच दिख सकता है.लेकिन वास्तव में यह आडवानी जी कि लोकतान्त्रिक सोच को प्रतिबिंबित करता है.भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनकी रथ-यात्रा से वे भाजपा को कितना लाभ दिला पाएंगे यह मेरे चिंतन का विषय नहीं है.अडवानी जी रथ यात्रा द्वारा जनजागरण में माहिर है. लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राष्ट्रिय पहल कि घोषणा करके उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि वह अपने विपक्ष-धर्म को बखूबी जानते हैं.माध्यम कोई भी हो लोकतंत्र को मजबूती मिलती रहनी चाहिए.लोकतंत्र जिंदाबाद,जनता जिंदाबाद. कुंवर सत्यम.

Tuesday, March 18, 2008

तिब्बत के साथ खड़े हों...!

दुनिया की छत तिब्बत संकटों से घिरा हुआ है। चीन अपनी तानाशाही पर अडा हुआ है.चिन का साम्राज्यवाद कम्युनिस्टों को नजर नही आता है...
आवश्यकता एस बात की है की सभी मतभेदों,वादों को भुलाकर दुनिया चिन के साथ खड़ी हो...तिब्बत की आजादी से ही भारत का भला होगा...
कुंवर सत्यम.

Friday, March 14, 2008

जाना बहुत है दूर.

मित्रों आज का दौर बहुत ही दुविधापूर्ण है.कहाँ क्या चल रहा है पता चलना कठिन है...ऐसे मी बह्ताकने का डर बना रहता है। युवा वर्ग क्योंकि अधिक भावुक होता है सो उसके भटकने का ज्याद डर है। हम ऐसे युवाओं का मंच बनाना चाहते है जो मुद्दों को लोकतांत्रिक तरीके से उठा सके ...बहरे कानों तक अपनी बात को पहुँचा सके.हमें बम और गोली में नही बल्कि दम और बोली मे विश्वास रखने वालो की जरुरत है।
आज देश को ऐसे यौंग पोलितिअनोस की जरूरत है जो जरुरत पड़ने पर चुनाओं मे उम्मीदवार का साक्षात्कार लेने से भी नही घबराए....और जरुरत पड़े टू ख़ुद चुनाव मैदान मे आए....जरुरत है अधिक से अधिक युवा .पढ़ा लिखा, स्वच्छ छवि का युवा राजनीती मे आए और नक्कारे बदमाशों को हराकर देश का भार कम करें.