मनु अभी जिन्दा हैं..राजा ने उन्हें आखिरकार जिन्दा कर ही दिया..
मायावती बहन ने मनु को इतनी गाली दे दी थी की उनकी मौत ही हो गई थी,, ऐसा लगने लगा था.अपने राजनितिक सफ़र को गति प्रदान करने के लिए मायावती जी के पास कोई मुद्दा नहीं था.. उनके पास यदि कुछ था तो वह था सदियों से दमित समाज को आत्मविश्वास से भर देने वाले कुछ नारे..तिलक,तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार..और मनु को ज्यादा से ज्यादा गलियों से संबोधित करना.. दलित वोट बैंक को संगठित करने के बाद मायावती ने सर्वसमाज की वैतरणी से राजनितिक दरिया को पार करके सिंहासन सुख चखा ...सर्वसमाज की बाते होने लगी तो मनु महाराज गौण हो गए.हम तो भूल ही गए थे मनु को..
लेकिन अब महाराजा दिग्विजय सिंह ने मनु को पुनरजीवित कर दिया है.मनु ने लगभग ३५० ईस्वी के आस पास कानून की पुस्तक मनुस्मृति की रचना की थी .इसमें उन्होंने जाति आधारित दंड संहिता की व्यवस्था की थी..मै समझता हूँ इस संदर्भ में अधिक गहराई में जाने की जरुरत नहीं है.
अब जब सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था तो राजा दिग्विजय सिंह को मनु की जरुरत महसूस हुई . दिग्विजय सिंह राजा है तो उन्होंने क़ानूनी सलाहकार की जरुरत पड़ती ही है. दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव के व्यवसायिक रूप से चिढ़ते है, वे उन्हें दण्डित करना चाहते है. लेकिन गलती से आज भारत में लोक-तंत्र है अतः राजा साहब यूँ ही किसी को पकड़-कर दण्डित नहीं कर सकते है. ऐसे में वह सिर्फ किस स्थिति में किस व्यक्ति को क्या दंड दिया जाना चाहिए, यही व्यक्त कर सकते है. भारतीय लोक-तंत्र में दिग्विजय सिंह जी जैसे कुछ लोग राज-तंत्र के अंतिम स्तम्भ है. अतः इनका राज-धर्म बनता है की ये राज-तंत्र की आत्मा को जिन्दा रखे.यह काम सिर्फ बयानबाजी से संभव है.. और यह काम राजा साहब बखूबी कर रहे है. राजा साहब ने मनुस्मृति से संदर्भ देते हुवे कहा है की ' यदि कोई व्यक्ति सन्यासी के वेश में व्यवसाय करे तो राजा का धर्म है की वह उसके गले में भारी पत्थर बाँध कर उसे नदी में डूबा दे,."
दिग्विजय जी के राज-तंत्र में विरोधी आवाज के लिए कोई स्थान नहीं है..यही राजतन्त्र की वास्तविक आत्मा है. यदि दिग्गी हिंदुस्तान के वास्तविक राजा होते तो सबसे पहले RSS को नेस्तनाबूद कर दिया जाता.भाजपा सहित तमाम विपक्षी दलों को समाप्त कर दिया जाता.हिंदुस्तान में सिर्फ एक दल होता..कांग्रेस..
रामदेव, अन्ना आदि कोई भी व्यक्ति यदि सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के खिलाफ बोलेगा तो उसे
येन-केन-प्रकरणेंन बदनाम करके ठिकाने लगाने के समस्त प्रबंध किये जायेंगे. दिग्गी साहब बखूबी जानते है की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से प्राप्त सत्ता में राजतंत्र की चासनी कैसे लगाई जा सकती है. सत्ता प्रतिष्ठान का प्रयोग लोकतंत्र को बंधक बनाने में कैसे किया जा सकता है , यह भी वह जानते है. जो भी लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना आदि के साथ खड़े होंगे, उनसे जुड़े सारे ऐसे दस्तावेज ढूंढ निकाले जायेंगे जो उन्हें नंगा कर सके.बस टिकट में २ रुपये बचा लेने तक की तुलना भी कलमाड़ी जैसे माननीयों के घपलों से कर दी जाएगी.
इस देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आज अगर कोई खड़ा है तो वह सोनिया जी और कांग्रेस है, ऐसा दिग्गी साहब का मानना है. यह सही भी है क्योंकि कई कांग्रेसी इस समय तिहाड़ में छुट्टियाँ बिता रहे है. कांग्रेस उन्हें जेल जाने से रोक तो नहीं सकती थी लेकिन उनके जेल जाने को राजनितिक रूप से भुनाया तो जा ही सकता है.. दिग्गी महाराज कलमाड़ी के लिए सार्वजनिक रूप से टीवी पार दुवा कर रहे है की वह अपने आप को निर्दोष साबित कर सके.
मैंने पहले भी कहा है की देश में दिग्विजय-वाद का उदय हो रहा है. दिग्विजय-वाद की आत्मा है- लोकतंत्र के साथ राजतन्त्र का काकटेल. इसमे हमें मनु की जरुरत हमेशा रहेगी ही. दिग्विजय-वाद कभी मनु को मरने ही नहीं देगा. अब हमें देखना यह है की हमेशा मनु की मुखर विरोधी रही बहन जी इस के साथ कैसे सामंजस्य बैठाती है.
भारत अब दुनिया में गांधीवाद के साथ-साथ दिग्विजय-वाद के लिए भी जाना जायेगा.
कुंवर सत्यम.
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