आम भारतीय महंगाई का अर्थशास्त्र नहीं समझता है. आये दिन मीडिया में महंगाई को लेकर शौर मचता है. कांग्रेस के किसी प्रवक्ता से पूछो तो कहता है की ये वित्त मंत्री से सम्बंधित है अतः आप उन्ही से पूछो की महंगाई कब ख़त्म होगी. जैसे वित्त मंत्री विपक्ष के मंत्री हो. प्रणव मुखर्जी और यहाँ तक की मनमोहन सिंह देश के उच्च कोटि के अर्थशास्त्री है क्या वो नहीं जानते की महंगाई का मूल कारन क्या है.? यह विश्वास करने के कोई कारन नहीं है की ये दोनों ही महंगाई के कारणों एवं निवारण से अनभिज्ञ हैं.
मेरी अपनी सोच शायद छोटी हो लेकिन भारत जैसे विकाशशील देशों में महंगाई का कारन वैश्विक नहीं है. एक ऐसे देश में जहाँ वैश्विक आर्थिक मंदी भी अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए ज्यादा चिंता का कारन नहीं बन पाई हो महंगाई के कारणों को वैश्विक परिदृश्य से जोड़ना गले नहीं उतरता है.
अर्थशास्त्र मांग और पूर्ति के सिद्दांत का आंख बंद करके पालन करता है. फिर मांग चाहे वास्तविक हो या कृत्रिम..देश की जनसँख्या यदि आज की परस्थितियों में १.५ अरब के बजाय २.५ अरब भी हो तो देश का किसान उसका आसानी से पेट भर सकता है वह भी आज दिनांक २६ अक्तूबर २०११ की कीमतों से भी कम पर..बशर्ते मांग को अनार्थिक तरीको से बढाया न जाये.
मेरी एवं मुझसे अधिक आयु के लोग अच्छी तरह से जानते होंगे की ७० एवं ८० के दशक में सरकारी लेवी की पूर्ति के लिए सरकार किसानों से उनका अधिशेष उत्पादन जबरन खरीद लेती थी और किसानो की आड़ में मुनाफाखोरों द्वारा पूर्ति को कृत्रिम तरीके से प्रभावित करके मूल्य वृद्धि को रोक देती थी.यहाँ तक की कई बार तो किसानो द्वारा भविष्य की आवश्यकताओं के लिए संगृहीत अनाज भी सरकार छीन लेती थी और कुछ दिनों बाद किसानो को खुद भी महँगी दरों पर अनाज खरीदना पड़ता था..
वैश्विकरण की अंधी दौड़ में सामाजिक सरोकार इतने पीछे छूट गए है कि अब सरकार खुद ही व्यापारी की भूमिका में खड़ी हो गई और वह भी घ्रणित कमीसन खोर एजेंट के रूप में.
विशेष कर सन २००० के बाद सरकार ने खाद्य एवं अन्य दैनिक जरुरी उत्पादों की सरकारी जुआं-गिरी को संस्थागत रूप प्रदान कर दिया है. बाजार में खाद्य एवं जरुरी वस्तुओं की अनार्थिक मांग बढ़ने के सभी उपाय सरकार ने कर दिए है.
देश में प्रतिदिन बेतहाशा बढ़ती महंगाई का प्रमुख कारन देश में कमोडिटी एक्सचेंज की शुरुवात होना है. कमोडिटी एक्सचेंज में कमोडिटीज जैसे कच्चे तेल , खाद्य पदार्थ तथा सोना , चांदी जैसी वस्तुओं का व्यापर होता है. किसी वस्तु की आगामी भविष्य की कीमतों का अनुमान लगाकर उसकी खरीद बिक्री करना यानि फ्यूचर ट्रेडिंग का कार्य ही कमोडिटी बाजार की खाशियत है. यानि कमोडिटी मार्केट में वस्तुओं का भौतिक रूप में नहीं बल्कि उनकी कीमत का व्यापर होता है..इस प्रकार वस्तु की आपूर्ति का यहाँ कोई महत्व नहीं है..जितना है उससे कही ज्यादा मात्रा में वस्तुए बेचीं जा सकती है, खरीदी जा सकती है..यहाँ हर समय हर वस्तु की अप्रत्याशित मांग बनी रहती है अतः हरपल कीमते परिवर्तित होती रहती है..रिजर्व बैंक अपनी रेपो रेट,बैंक रेट,CRR आदि नियंत्रक गतिविधियों से भी कमोडिटी मार्केट में कीमत व्यापर को नियंत्रित नहीं कर सकता है.यहाँ लोग छः महीने से भी पहले किसी वस्तु की कीमत का अनुमान लगाकर उसकी खरीद बिक्री कर सकते है..एक प्रकार से कमोडिटी मार्केट कालाबाजारी के सरकारी बाजार है.
भारत में वैसे तो सन २००२ में कमोडिटी बाजार का प्रराम्भा हो गया था लेकिन यह सिर्फ सांकेतिक था.इसमें प्राय धातुओं का व्यापर होता था.२००३ में MCX भी शुरू हो गया था. लेकिन ३ मई २००५ से NCDEXAGRI देश में कृषिगत वस्तुओं का पहला सूचकांक है ..
एक अनुमान के अनुशार देश का कमोडिटी बाजार शेयर बाजार की तुलना में ५ गुना बड़ा है. २००५ में इसके शुरू होने से लेकर २००८-०९ तक कमोडिटी ट्रेडिंग में ३१ गुना वृद्धि दर्ज की गई है..
सत्ता के खेल में शामिल पक्ष हो या विपक्ष, अधिकांश लोग सरकारी कालाबाजारी के बाजार में शामिल है.
महंगाई का बम महंगाई को कम करने की जद्दोजहद के बीच ही अचानक फट पड़ा है..टीवी पर एक दो दिन बहसों का नहीं तू तू मै मै का दौर चलेगा. सब कुछ सामान्य हो जायेगा. न करे रुकेंगी न अर्थव्यवस्था की गति कम होगी.विपक्षी दलो के लोग फिर इंतजार करेंगे नए महंगाई बम के फटने का.. जिंदाबाद -मुर्दाबाद का दौर यूँ ही चलता रहेगा.
आम आदमी की बिना इलाज के वहीँ दूर गाँव में मौत हो जाएगी.
इति भारतम
मै समझता हूँ की अब एक आम आदमी भी समझ सकता है की कमोडिटी मार्केट के रहते हुवे क्या कोई उपाय है जो कथित महंगाई को रोक सके..
कुंवर सत्यम.
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