गुल्ली डंडा ,
पिट्ठू जिंदाबाद.
गोल का टोरा..
चोट गोली पिल..
रेत से वो घर बनाना.
कंदूरी से भैंस -बैल बनाना.
ईंट की गाड़ी.
मुह से घुरघुर
करके गाड़ी चलने की,
आवाज निकालना..
जितना आनंद देता था
उतना आज सचमुच की लग्जरी
गाड़ी चलाने में भी नहीं आता.
क्यों नहीं बचपना
जवान हो जाता
अपनी उसी सादगी के साथ.
कुंवर सत्यम.
No comments:
Post a Comment