चुनाव आयोग को इसकी वास्तविक महत्ता का भान तत्कालीन चुनाव आयुक्त टी.एन . शेषण ने कराया था. तब से लेकर आज तक यह चुनावोत्सव के सफलता पूर्वक कई aayojan कर चुका है.
हाल में ५ राज्यों में चुनावों का आयोजन होने जा रहा है. जिनकी तयारी में चुनाव आयोग कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता है. अनेक महत्वपूर्ण फैसले इस सन्दर्भ में चुनाव योग ले चुका है.
लेकिन इसी बीच एक हास्यास्पद और सनक से भरा फैसला भी योग ने लिया जो किसी भी तरह से तार्किक नहीं है. यह फैसला है हाथियों की मूर्तियों को ढकने का. मूर्तियों को ढकने में लाखो रुपये का खर्चा आयेगा जो सिर्फ फिजूल खर्च माना जाना चाहिए. हाथी की या किसी अन्य चुनाव चिन्ह की प्रतिमा बना देने मात्र से वोट नहीं मिलते..आज का मतदाता पहले से कही अधिक जागरूक है. उसे पता हिया की वह किसे और क्यों वोट देगा.
सभी व्यक्तियों के दो दो हाथ हैं जो कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है..लेकिन फिर भी लोग सिर्फ इसी वजह से कांग्रेस को वोट नहीं दे देते..
मूर्ती ढकने का मूर्खता पूर्ण फैसला लेने से चुनाव आयोग बसपा का चुना प्रचार ही कर रहा है..जब से यह खबर बनी तब से अनेक बार टीवी चैनल हाथी की मूर्तियों का प्रसारण कर चुके है और अनेक बार समाचार पत्र इनकी तस्वीरे प्रकाशित कर चुके है..यहाँ काम अगर करना ही था तो इन मूर्तियों की तस्वीरो से सम्बंधित खबरे प्रकाशित होने एवं उनके प्रसारण को रोकने की व्यवस्था चुनाव आयोग क्यों नहीं कर पाया. क्या एक चुनाव आयुक्त की सनक पूरा करने का खर्च उठाने के लिए देश की जनता विवश है..
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी लोकतंत्र के सबसे बड़े रक्षक की भूमिका निभाने की है..मदारी की नहीं...
कुंवर सत्यम.
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