Friday, October 6, 2017

सुमित गुर्जर एनकाउंटर:सच से सामना

3 जुलाई 2009 और 3 अक्टूबर 2017 तक क्या कुछ बदला क्या नही ? यह अलग अलग क्षेत्रों में हुए बदलाव में भिन्न हो सकता है लेकिन इन दो तिथियों में जो नही बदला वह है रस्सी को सांप बताकर रस्सी रखने वाले का इंतजाम कर देना।पुलिस अपनी पर आ जाये तो क्या नही कर सकती है? फिर वह केरल से लेकर उत्तराखण्ड या उत्तर प्रदेश कहीं की भी क्यों न हो।उत्तराखण्ड पुलिस के 17 जवानों ने "अदम्य साहस" का प्रदर्शन करते हुए एम बी ए के छात्र रणबीर की हत्या करके उसे मुठभेड़ का रूप दे दिया था। 3 अक्टूबर 2017 को नोएडा पुलिस ने सुमित गुर्जर नामक चिरचिटा गांव निवासी एक युवक का एनकाउंटर कर दिया।जब नोएडा पुलिस से इस कथित पचास हजारी बदमाश का आपराधिक रिकॉर्ड मांगा गया तो सिंभावली अहीर थाने से इसी नाम के अपराधी सुमित पुत्र शीशपाल का आपराधिक रिकॉर्ड दे दिया गया।बाद में पुलिस को पता चला कि जिस सुमित गुर्जर का नोएडा पुलिस ने एनकाउंटर किया है उसके पिता का नाम कर्मवीर है और सम्पूर्ण बागपत जनपद में कहीं भी सुमित पुत्र कर्मवीर का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नही है।पता चलते ही सिंभावली अहीर थाना पुलिस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई और उसने एनकाउंटर में मारे गए सुमित पुत्र कर्मवीर संबंधित अपना बयान वापस ले लिए ।मीडिया खबरों के अनुसार एसपी बागपत ने भी
ने भी सुमित पुत्र कर्मवीर पर बागपत जनपद में दर्ज किसी केस न होने की बात कही है।
सुमित के भाई अमरीश के अनुसार उसे 30 सितम्बर को नोएडा पुलिस बालैनी जिला बागपत से उस वक्त उठाकर गाड़ी में डालकर ले गई जब वह वहां एक दुकान पर चाय पी रहा था।
असल में सुमित पुत्र शीशपाल एवं सुमित पुत्र कर्मवीर दोनों एक ही गांव के हैं तथा सुमित पुत्र शीशपाल पर 50 हजार रुपये का इनाम पुलिस द्वारा घोषित किया गया है।नोएडा पुलिस ने असली वांछित की जगह दूसरे सुमित को उठाया और अतिउत्साह में बिना किसी होमवर्क के उसका एनकाउंटर कर दिया।सुमित के भाई अमरीश के अनुसार जब 30 सितम्बर को नोएडा पुलिस ने सुमित को बालैनी से उठाया था उसके बाद उन्होंने सुमित के फर्जी एनकाउंटर की आशंका से मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया था लेकिन कोई कार्यवाही नही हुई है। 3 अक्टूबर को वही हुआ जिसकी आशंका जताई गई थी।नोएडा पुलिस ने सुमित पुत्र कर्मवीर का एनकाउंटर कर डाला।यद्यपि सुमित पुत्र कर्मवीर को भी छुटभैया अपराधी बताया जा रहा हैं ।
पुलिस को कभी भी न्यायधीश की भूमिका नही दी जा सकती है। न्याय से जुड़ी उस परंपरा की रक्षा की जानी चाहिए जिसके अनुसार कहा जाता है कि "एक निर्दोष को बचाने के लिए 100 गुनाहगार भी छूट जाएं तो कोई बात नही।क्योंकि छूट गए गुनाहगार तो बाद में भी पकड़े जाएंगे लेकिन निर्दोष के साथ हुआ अत्याचार नही मिटेगा"
   समाज से अपराध को मिटाने के लिए बदमाशों का समूल उन्मूलन जरूरी है।खूंखार और निर्मम अपराधियों का एनकाउंटर भी जरूरी है।लेकिन इसकी आड़ में बिना किसी होमवर्क किये पुलिस को किसी निर्दोष की बलि चढ़ाने की अनुमति दिया जाना एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए किसी भी लिहाज से उचित नही है।

कई बार पुलिस और अपराध का गठजोड़ सामने आ चुका है।यह भी सर्वविदित है कि जब पुलिसिया भाईगिरी पर उतर जाए "तो रिश्वत न देने पर" आपको रातों रात 50 हजारी बनाकर एनकाउंटर कर सकते हैं।
सुमित एनकाउंटर में न्याय होना चाहिए और प्रदेश के नागरिकों को यह होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।इससे सरकार की प्रतिष्ठा में वृद्धि ही होगी। यह उन मतदाताओं की भी इच्छा है जिन्होंने सरकार को प्रचंड प्यार और समर्थन दिया है।प्रदेश के मुखिया स्वयं न्यायप्रिय है वह कभी भी यह नही चाहेंगे कि किसी निर्दोष की हत्या को पर्दा डालकर लीपापोती कर दी जाए।अपराध उन्मूलन के लिए निश्चित रूप से प्रशासन एवं पुलिस को स्वतंत्रता दी जानी चाहिए तथा उसे अनावश्यक हस्तक्षेप से दूर रखा जाना चाहिए लेकिन स्वतंत्रता के नाम पर मनमानी की छूट नही दी जा सकती है, नही तो अराजकता फैलने की आशंका बनी रहती है।मामले की गंभीरता को देखते हुए देहरादून में हुए रणबीर सिंह एनकाउंटर मामले की तरह सुमित गुर्जर मुठभेड़ की जांच विशेष सीबीआई अदालत से कराई जानी चाहिए ताकि जनता में सरकार के प्रति विश्वास पुख्ता हो सके और न्याय की मशाल को प्रज्ज्वलित रखा जा सके। सुमित की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि क्या कथित मुठभेड़ से पहले सुमित को पुलिस द्वारा थर्ड डिग्री प्रताड़ना भी दी गई थी?
          यदि सुमित गुर्जर पचास हजारी बदमाश था तो पुलिस को उसका "आपराधिक रिकॉर्ड" सार्वजनिक करना चाहिए।फिर किसी जांच की जरूरत ही नही पड़ेगी।
अच्छा रहेगा लीपापोती करने की बजाय दूध का दूध और पानी का पानी हो।
यदि सुमित गुर्जर का वास्तव में आपराधिक रिकॉर्ड है तो हर कोई पुलिस की हौसला अफजाई करेगा।पुलिस ने यदि गलती की है तो अड़ियल रवैया छोड़कर उसे कानूनी कार्यवाही का सामना करके पश्चाताप की मिसाल कायम करनी चाहिए। पुलिस में भी गलत तत्व हो सकते है तो उनसे गलती भी होना स्वाभाविक है।
(प्रस्तुत लेख में लेखक की निजी राय व्यक्त की गई है।)

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