जातिवाद को लेकर अक्सर हिंदुत्व को कई बार अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ता है।कई बार कुछ स्वार्थी तत्व छोटी छोटी घटनाओं को राजनीतिक रूप देकर अपना हितसाधन करते हैं।सामाजिक विभाजन केवल हिंदुओं में ही है ऐसा बिल्कुल नही है।वास्तव में उत्तर-मण्डल काल मे राजनीति में जातीय समीकरण प्रभावी भूमिका में आ गए।एक सोची समझी रणनीति के तहत देश के हिन्दू समाज को मीडया के माध्यम से चुनावी दौर में जातियों के रूप में संख्यावार मतदाता बताकर अपने अपने राजनीतिक समीकरण साधकर चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत लगाई गई।इसके विपरीत मुस्लिमों की संख्या कम होने के कारण सत्ताधीशों को उंन्हे अपने साथ वोटबैंक के रूप में चिपकाए रखने के लिए मुस्लिमों में भयंकर धार्मिक मतभेद के बावजूद केवल मुसलमान के रुप में प्रचारित किया गया।जबकि सत्य यह है कि सुन्नी शिया को छोड़िए,सुन्नी-सुन्नी एवं शिया-शिया के मध्य खलाफत एवं इमामत को लेकर जानलेवा मतभेद है।मुस्लिम समाज मे फिरकवाद हिन्दू समाज के जातिवाद से कहीं अधिक संगठित,कातिल और नफरतपूर्ण है।हिन्दू जातिवाद एवं मुस्लिम फिरकवाद में एक अंतर समझना जरूरी है जो जातिवाद को फिरकवाद के मुकाबले महत्वहीन श्रेणी में लाकर खड़ा कर देगा।असल मे हिन्दू जातिवाद का आधार मानसिक है।प्रारम्भ में यह वर्णधारित जरूर था लेकिन परिस्थितियों में समयानुकूल परिवर्तन के फलस्वरूप आज यह वर्णधारित न होकर केवल मानसिक तौर पर शेष है जबकि मुस्लिम फिरकवाद " वैचारिक एवं सैद्धांतिक है।उदाहरण के लिए सुन्नी पैगम्बर मुहम्मद के ससुर तो शिया उनके दामाद को पैगम्बर की मौत के बाद उनका उत्तराधिकारी मानते हैं जो आजतक दुनियाभर के अनेक देशों में दोनों संप्रदायों के बीच खूनी संघर्ष का कारण बना हुआ है।......
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