कितना कमाया? यह सवाल भारत में सामान्य जन मानस के अंदर गहरे तक पैठ बनाए हुए है जो भ्रष्टाचार के प्रति व्यापक सामाजिक सम्मति का द्योतक है। आज जब एक सरकारी नौकर कहीं जाता है, उससे कोई व्यक्ति बात करता है, बात करने वाला देश का सामान्य व्यक्ति हो सकता है, कोई आम आदमी हो सकता है, बिजनेस मैन हो सकता है। वह यह सामान्य सवाल करता है कि "कितने पैसे कमा लिए? कितने प्लॉट खरीदे? कितने घर बनाए? इस प्रकार के कई सवाल हैं जो हमारी मानसिकता को भ्रष्टाचार के प्रति प्रेरित करते हैं! यदि आप किसी सरकारी सेवा में हैं तो सामान्य व्यक्ति आपसे आपकी तनख्वाह के बारे में जानने के लिए ज्यादा उत्सुक नहीं रहता है, वह हमेशा उस ऊपरी कमाई के बारे में जाना चाहता है जो एक पद पर रहने के कारण समाज अपेक्षा करता है कि कोई व्यक्ति कितना पैसा प्रति माह या कितना रुपया प्रतिमा काम आता होगा? यह कैसी विडंबना है। यदि एक व्यक्ति ईमानदारीपूर्वक अपने दायित्वों का निर्वहन करता है और वह भ्रष्ट तरीकों से कोई अतिरिक्त आय नहीं सृजित करता है। तो कैसे उसकी निष्ठा या कहिए उसकी कार्य क्षमता पर लोग सवाल खड़े करते हैं! भ्रष्टाचार के प्रति समाज की स्वीकार्यता इतनी सहज है कि हम कभी यह सवाल नहीं पूछते हैं कि मेरा पड़ोसी जो अमुक पद पर सरकारी नौकर है, उसका वेतन 50000 रुपये प्रतिमाह या 70000 रुपये प्रतिमाह है, तो कैसे उसने इतना बड़ा साम्राज्य कैसे खड़ा कर दिया? आखिर उसने कमाई के कौन से स्रोत सृजित कर लिए हैं कि उसकी आय से ज्यादा संपत्ति है, उसके पास कई कई मकान महंगी लग्जरी गाड़ियां हैं! क्या हम कभी यह सवाल पूछते हैं कि क्या वह व्यक्ति उस अनुपात में इनकम टैक्स जमा करता है? यदि कोई व्यक्ति व्यापारी है तो उसके व्यापार का वॉल्यूम क्या है? और क्या वह उस वॉल्यूम में, उसके पास उपलब्ध सुविधाओं की तुलना में अनुपात में कर अदा करता है? जब तक समाज में भ्रष्ट तरीकों से कमाई गई आय या कमाए गए धन के प्रति सहज स्वीकार्यता समाप्त नहीं होगी, जब तक समाज की अनैतिक आचरण को लेकर मानसिकता में परिवर्तन नहीं होगा। जब तक हम सिर्फ दूसरों से भ्रष्टाचार रहित आचरण की उम्मीद करते रहेंगे लेकिन स्वयं उस मार्ग पर चलने के लिए हम मानसिक रुप से तैयार नहीं होंगे,समाज मे सकारात्मक परिवर्तन नही होंगे।आज हर व्यक्ति को ईमानदार समाज तो चाहिए, हमें ईमानदार अधिकारी और व्यापारी तो चाहिए लेकिन जब हमारे आचरण का सवाल आता है तो उस समय हम गाहे-बगाहे नजरें बचाकर भ्रष्ट आचरण करने में, अनैतिक व्यवहार करने में कोई संकोच नहीं करते हैं। मैं वर्ष 2012 से वाणिज्य कर विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर कार्यरत हूं। लोग अक्सर मुझसे बात करते हैं। अक्सर मुझसे पूछते हैं कितनी कमाई हो जाती है भाई साहब? मेरे पास उनका मुंह देखने के अलावा या आश्चर्य व्यक्त करने के अलावा कोई उत्तर नहीं होता है? लोग यह समझते हैं कि असिस्टेंट कमिश्नर होने का मतलब वर्ष में कई करोड़ रुपया की कमाई ! यह धारणा ऐसे ही नहीं बनी है। अधिकारियों ने सदाचरण के विपरीत कार्य करने के अनेक रिकॉर्ड कायम किए हैं। ऐसा नहीं कि देश में, प्रदेश में, ईमानदार अधिकारियों की कोई कमी है! आज भी देश में, प्रदेश में, एक से बढ़कर एक ईमानदार अधिकारी है। जिनके दम पर, जिनके बल पर यह व्यवस्था सुचारु रुप से कायम है। भ्रष्ट लोग कम होंगे लेकिन उनकी ख्याति ज्यादा है। उन लोगों ने समाज में ऐसी मान्यता स्थापित कर दी हैं कि एक पद विशेष पर होने का मतलब इतने करोड़ रुपये का मालिक होना है। लेकिन इतने करोड़ रुपए की कमाई से एक व्यापक सार्वजनिक छवि नहीं कमाई जा सकती। मेरा मत है कि ईमानदारी एक बहुत महंगी चीज है। इसे अर्जित करना वास्तव में धन अर्जित करने से कहीं ज्यादा जोखिम भरा कार्य है। ईमानदारी के उदाहरण प्रस्तुत करना, समाज में आदर्श प्रस्तुत करना, सबसे बड़ा जोखिम और सबसे बड़ा निवेश है। मेरी समझ में ईमानदारी यदि आपने कमाई, एक व्यापक स्वीकार्यता समाज के अंदर ईमानदार के रूप में अपने कमाई, तो उस से बड़ा कोई धन नहीं है।
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