यह अकल्पनीय है कि आज से लगभग 100 वर्ष पहले कोई कृषि की आधुनिक सिंचाई पद्दत्ति का अविष्कार कर ले। उस पद्दत्ति का उपयोग कर अपनी कृषिभूमि को सिंचित करके अन्य साथी किसानों से ज्यादा फसल की उपज प्राप्त कर सके!
आज कृषि वैज्ञानिक कृषकों को सिंचाई के समय देशी अथवा रासायनिक खाद को सिंचाई के स्रौत (कुएं या नलकूप) पर ही पानी मे घोलकर सिंचाई करने की सलाह देते हैं ताकि संबंधित देशी अथवा रासायनिक खाद का सम्पूर्ण खेत मे समानुपातिक वितरण करके अधिक उपज प्राप्त की जा सके।
पेड़ पौधो की अनुकूलतम वृद्धि के लिए
कई पोषक तत्व जरूरी होते हैं।पौधों को अपनी वृद्धि, प्रजनन, तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए खनिज लवणों एवं जल की आवश्यकता होती है जिनकी अनुपलब्धि का पौधों की उपयुक्त वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पौधे भूमि से जल तथा खनिज-लवण एवं सूर्य के प्रकाश प्रकाश की उपस्थिति में वायु से कार्बन डाई-आक्साइड प्राप्त करके स्वयं के लिए भोजन का निर्माण करते हैं।इस क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं। पौधों को लगभग 17 आवश्यक तत्वों की विभिन्न मात्रा में आवश्यकता होती है। इन तत्वों के बिना पौधे की वृद्धि-विकास तथा प्रजनन आदि क्रियाएं सम्भव नहीं हैं। ये प्रमुख तृत्व हैं: कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन , नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश, जिंक, मैग्नीशियम, एवं बोरोन आदि। प्रथम तीन तत्व पौधे वायुमंडल से ग्रहण करते हैं।इस बात को समझकर हथछोया के नथवा सिंह दिलावरे ने खादर क्षेत्र में आज से लगभग 140 वर्ष पूर्व 1873 में जैविक खेती की शुरुआत की थी। 1857 की क्रांति में दिलावरों ने देश के लिए बलिदान किया था,जिसकी कीमत उन्होंने सम्पूर्ण परिवार के लगभग सम्पूर्ण विनाश के रूप में चुकाई थी।शामली तहसील लूट के बाद क्रांति सेना पर अंग्रेजो ने 1858 के प्रारंभिक मुज़फ्फरनगर से आक्रमण किया जिससे क्रांतिकारियों के सामना बनत में हुआ।क्रांतिकारियों को अत्यधिक हानि उठानी पड़ी।शामली के चौधरी मोहर सिंह बनत मोर्चे पर शहीद हो गए।मोर्चे के सैन्य नेतृत्व भजन सिंह दिलावरे के हाथ में था।मोहर सिंह के कहने पर शेष क्रांतिकारी क्रांति को जीवित रखने के लिए भूमिगत हो गए।बाद में, हरियाणा के दिलावरा गांव में अंग्रेजों ने भजन सिंह एवं उनके साथियों को गिरफ्तार करके फांसी पर चढ़ा दिया।उनकी पत्नी दरबो गुजरी,जो उस समय गर्भवती थी किसी तरह जान बचाने में सफल हुई।वह दिलावरा गांव से अंग्रेजो के हाथ से सफाईकर्मी का वेश बनाकर बच निकली और अगले लगभग 10 वर्षों तक भूमिगत रहकर जान बचाने के लिए इधर उधर भटकती रही।पुलिस द्वारा क्रांतिकारी दिलावरे परिवार के जीवित बचे पुरुषों को "भगोडा" घोषित कर दिया था।
भजन सिंह दिलावरे के बलिदान के लगभग 3 माह बाद 25 दिसम्बर 1858 को उन्होंने नथवा सिंह को जन्म दिया।ब्रिटिश सरकार ने 1857 की क्रांति के बाद भारत सरकार का नियंत्रण अपने हाथ मे ले लिया और भारत मे 1861 में इंडियन कॉउंसिल एक्ट लागू किया गया।परिस्थितियां अनुकूल होने पर 1870 की गर्मियों में नथवा सिंह को लेकर अपने मायके संदल नवादा (हरियाणा) से दरबो गूजरी पुनः अपनी ससुराल हथछोया चली आई।अब नथवा सिंह 12 वर्ष के हो चुके थे।15 वर्ष की उम्र में नथवा सिंह दिलावरे का भूरा(कैराना) की धर्मवती के साथ विवाह हो गया।धर्मवती को प्यार से लोग धर्मी कहते थे।धर्मवती ने चार पुत्रों को जन्म दिया: राजाराम, बख्तावर सिंह,सूरजराम एवं मामराज सिंह।1857 की क्रांति के बाद दिलावरों की जमीन अंग्रेजो ने आने चहेतों में बांट दी शेष पर गांव के ही कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया।दरबो गूजरी के आने के बाद कुछ लोगों ने उन्हें खेती करके गुजारा करने के लिए कुछ भूमि दे दी।
दरबो गुजरी स्वयं बड़ी हष्टपुष्ट एवं कर्मठ थी।पुत्र नथवा सिंह भी माँ दरबो की भांति मजबूत कदकाठी का बलशाली युवक था।मां बेटे ने खूब मेहनत करके परिवार की पुनर्स्थापना की।शीघ्र ही नथवा सिंह के चारों पुत्र भी बाप के कंधे लग गए।दरबो गूजरी की सलाह पर खेत मे सिंचाई के लिए कुआं खोदने का निर्णय लिया गया।आधुनिक खेड़ेवाला (जहां देवस्थली विद्यापीठ की स्थापना की जा रही है) में नथवा परिवार खेती करता था।उन दिनों कुआं खोदना एक अत्यधिक श्रमसाध्य कार्य होता था क्यों कि सम्पूर्ण खुदाई कार्य हाथ से ही करना पड़ता था।कुआं खेती,पशु और मानव सभी के लिए जल का अहम स्रौत था।इसलिए यह मानव के पूर्त लक्ष्यों में शामिल था।अतः कुआं खोदने में श्रमदान को लोग अत्यधिक पुण्य कार्य मानते थे।नथवा सिंह ने चारों बेटों को हथछोया गांव में व्यक्तिगत तौर पर लोगों को श्रमदान हेतु आमंत्रित करने के लिए भेजा।दरबो एवं नथवा सिंह जानते थे कि कुंआ निर्माण के लिए श्रमदान हेतु शायद ही कोई शूरमा आये। वही हुआ जिसकी आशंका उंन्हे थी।दिलावरों के बागी चरित्र एवं उनपर पुलिसिया निगरानी के कारण गांव से एक भी व्यक्ति कुआं निर्माण के लिए श्रमदान हेतु नही पहुंचा।अंत में दरबो गूजरी ने स्वयं शुरुआत की और नथवा सिंह अपने चारों बेटों के साथ कुएं की खुदाई पर लग गए।लगभग डेढ़ महीने में उंन्हे सफलता मिली और कुआं बनकर तैयार हो गया।खेत,पशु और मानव के लिए जल की कुएं से प्राप्ति हुई।दरबो गूजरी एक प्रतिष्ठित परिवार की शिक्षित महिला थी।उसने खेत में आधुनिक प्रयोग किये और समकालीन सभी किसानों से कई गुणा कृषि उपज प्राप्त की।
आज सम्पूर्ण विश्व मे जैविक खेती लोकप्रिय होती जा रही है।
इसमें रासायनिक खाद के स्थान पर गौमूत्र,नीम के पिसे हुए सूखे पत्ते,सड़ी पुआल एवं नीम की निबोली के मिश्रण से तैयार द्रवित गोबर का प्रयोग करने पर जोर रहता है। द्रवित गोबर में 1.5 से 2 % नत्रजन, 1 % सल्फर तथा 1 % पोटाश पाया जाता है।
15-20 दिन तक संग्रहित गोबर में अनुमानित 20 प्रतिशत नाइट्रोजन अमोनियम नाइट्रेट के रूप होता है। अत: यदि इसका तुरंत उपयोग खेत में सिंचाई नाली के माध्यम से किया जाये तो इसका लाभ रासायनिक खाद की तरह फसल पर तुरंत होता है और उत्पादन में 10-20 प्रतिशत बढ़त हो जाती है। द्रवित गोबर (सलूरी) के खाद में नत्रजन, सल्फर एवं पोटाश के अतिरिक्त सूक्ष्म पोषके तत्व एवं ह्यूमस भी होता हैं।जिससे मिट्टी की संरचना एवं प्रोफाइल में सुधार होता है। मिट्टी की जल धारण क्षमता भी द्रवित गोबर खाद से बढ़ती है। सूखी खाद असिंचित खेती में 5 टन एवं सिंचित खेती में 10 टन प्रति हैक्टर की आवश्यकता होगी। ताजी गोबर स्लरी सिंचित खेती में 3-4 टन प्रति हैक्टर में लगती है। सूखी खाद का उपयोग अन्तिम बखरनी के समय एवं ताजी स्लरी का उपयोग सिंचाई के दौरान किया जाता है। स्लरी के उपयोग से फसलों को तीन वर्ष तक पोषक तत्व धीरे-धीरे उपलब्ध होते रहते हैं।
फूलसिंह दिलावरे एवं मंगल सिंह दिलावरे बताते थे कि दादी दरबो गूजरी
2 किलो नीम की निबोली लेकर उसे सिल बट्टे से पीसकर बिल्कुल महीन बना लेती थी।उसके बाद इसमें 2 लीटर ताजा गौ मूत्र मिला और 10 किलो छांछ मिलाकर 4 दिनतक बड़े बड़े माठ में रखती थी जिसे करीब 200 लीटर पानी मे मिलवाकर वह खेत में छिड़काव भी करवाती थी ताकि कीटों से फसल को नुकसान न हो।
नथवा सिंह एवं दरबो गूजरी गोबर,नीम की निबोली एवं गौमूत्र का घोल आवश्यकतानुसार बड़े मटकों में तैयार करती थी।इस घोल को 15-20 दिन ऊपर से बंद करके रखा जाता था ताकि इसकी स्लरी तैयार हो जाये।फिर खेत की सिंचाई के समय इस घोल को कुएं के जल निकास स्रौत पर ही जल में मिला दिया जाता था। ताकि यह स्लरी पूरे खेत में पानी से सिंचाई के साथ समानुपात में फैलकर आवश्यक कृषि पौषक तत्वों से कृषि उपज को लाभान्वित कर सके।
फूल सिंह दिलावरे(5जून 1907-12 मई 2011)जो नथवा सिंह के प्रपौत्र थे,बताते थे कि दादी दरबो गूजरी हर कार्य को बड़े तरीके से करती थी।वह बड़ी संख्या में गाय-बैल रखती थी। जिनका गोबर एवं मूत्र तथा दूध से निर्मित लस्सी तक का खाद बनाकर खेत मे प्रयोग करवाती थी।
उपरोक्त में नीम पत्ती एवं निबोली चूर्ण का मिश्रण करके उसे डंडे और हाथ से मिलाने के बाद 15-20 दिनों तक छावं मे रखवाती थी । पन्द्रह दिनों तक उस मिश्रण को हम सुबह शाम डंडे से घुमाते थे। पन्द्रह दिनों में वह खाद बनकर तैयार होती थी । फिर उस खाद को कुएं से निकलते हुए पानी मे मिलाकर खेत मे पहुंचाते थे।दो महीने में तीन बार इस तरह से खेत में खाद डाला जाता था।
उस समय ग्रामवासियों को इस तकनीकी की जानकारी नही थी।अतः उन्होंने इसका गलत अर्थ निकालकर गांव एवं आसपास के क्षेत्र में दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया कि दिलावरे कुएं के पानी मे गोबर घोल देते है ताकि कोई पानी पीकर अपनी प्यास न बुझा सके।असल में यह ऐसा करने वाले लोगों की कुंठा एवं जलन को प्रदर्शित करता था क्योंकि दिलावरे परिवार की तुलना में उनकी कृषि उपज एक चौथाई ही होती थी।वह नकारात्मक लोग थे जिन्होंने दिलावरों से नवीन कृषि तकनीकी सीखने की बजाय उनको बदनाम करने में अपनी ऊर्जा नष्ट कर दी।
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