पूर्णतः संवैधानिक था कश्मीर विलय।
@ सुनील सत्यम
जम्मू कश्मीर बार एसोसिएशन ने जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को विवादास्पद एवं रहस्यमयी बताया है जो अपने आप में हास्यास्पद है।सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई से सम्बंधित मामले की सुनवाई के समय बार एसोसिएशन द्वारा दाखिल हलफनामे पर हैरानी जताई है।
कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और इसका विधिवत रूप से 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय कर दिया गया था।विलय पत्र पर कश्मीर के महाराजा हरीसिंह एवं तत्कालीन ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन के द्वारा हस्ताक्षर किए गए हैं।महाराजा हरीसिंह ने बिना किसी भय एवं दबाव के कश्मीर अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किए थे।अधिमिलन पत्र पर तत्कालीन गवर्नर जनरल के हस्ताक्षर होने के साथ ही जम्मू एवं कश्मीर की सम्पूर्ण रियासत संवैधानिक रूप से भारत का अविभाज्य अंग बन गई थी।इसके फलस्वरूप गिलगिट, बाल्टिस्तान, शक्सगाम एवं अक्साइचिन तक भारत की सीमाओं एवं प्रभुता का विस्तार हो गया था।
जम्मू एवं कश्मीर के अधिमिलन की प्रक्रिया वस्तुतः 26 अक्टूबर 1947 से काफी पहले प्रारम्भ हो चुकी थी। भारत सरकार अधिनियम 1935 के साथ ही वास्तव में देशी रियासतों के लिए एक प्रारूप निर्धारित किया गया था जिसमे रियासतों को किसी प्रकार के संशोधन की अनुमति नही थी।यह अधिनियम के सेक्सन सात में दिए गया है। इस प्रारूप में देशों रियासतों को अपने राज्य का नाम,हस्ताक्षर एवं मुहर अंकित करके, संबंधित राज्य के प्रतिरक्षा,विदेश एवं संचार सम्बन्धी समस्त अधिकार के लिए भारतीय डोमिनियन में अधिमिलन की स्वीकृति देनी थी। इस प्रारूप को विधिवत भरकर अपनी मुहर एवं हस्ताक्षर के द्वारा जम्मू कश्मीर के महाराजा हरीसिंह द्वारा भी स्वीकार्यता दी गई थी।
ब्रिटिश संसद ने 18 जुलाई को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 पारित किया था।इसमें भारत डोमिनियन को ब्रिटिश भारत सरकार का उत्तराधिकारी बनाया गया था। इस लिहाज से तो प्रत्येक ऐसी रियासत जो भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी के भी साथ सम्मिलन का विकल्प न चुनती, वह नियमतः एवं तकनीकी रूप से भारत का ही हिस्सा होती। भारत सरकार अधिनियम 1947 के अंतर्गत भारत एवं पाकिस्तान दो डोमिनियन का निर्माण किया जाना था तथा देशी रियासतों से ब्रिटिश सरकार की सर्वोच्चता समाप्त हो जानी थी।अधिनियम में रियासतों के समक्ष दोनों डोमिनियन में से किसी एक में शामिल होने के अलावा स्वतंत्रता का तीसरा विकल्प नही था। इस अधिनियम के पैरा पांच में स्पष्ट किया गया था कि " ये रियासतें ब्रिटिश भारत की उत्तराधिकारी सरकार या सरकारों के साथ संघीय संबंध स्थापित करेंगी और ऐसा न हो सकने की स्थिति में रियासतें विशेष राजनैतिक व्यवस्था ब्रिटिश भारत की उत्तराधिकारी सरकार या सरकारों के साथ स्थापित करेंगी।" 25 जुलाई 1947 को देशी राज्यों के शासकों के साथ हुई बैठक में भी लार्ड माउंटबेटन ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था कि देशी रियासतें भारत अथवा पाकिस्तान के साथ जुड़ने का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।लेकिन अधिकांश के पास भौगोलिक सुविधा के अनुसार भारत से जुड़ना ही बेहतर होगा।अपने किसी भाषण अथवा प्रस्ताव में लार्ड माउंटबेटन ने किसी रियासत के पूर्ण रूप से स्वतंत्र अर्थात दोनों नवगठित देशों में से किसी से भी न जुड़ने के अधिकार का कोई जिक्र नही किया था।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अधिमिलन पत्र पर महाराजा हरिसिंह द्वारा हस्ताक्षर करने के साथ ही जम्मू एवं कश्मीर को भारत मे अधिमिलन की प्रक्रिया अन्य रियासतों की भांति पूर्ण हो गई थी।
15 अगस्त 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के अंतर्गत जम्मू एवं कश्मीर रियासत का ब्रिटिश राजसत्ता से संवैधानिक सम्बन्ध विच्छेद हो गया था। रियासत के भविष्य का निर्धारण अब महाराजा हरिसिंह को करना था। हरीसिंह स्वाभाविक रूप से भारत में अधिमिलन चाहते थे लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनके सामने शेख को सत्ता में भागीदार करने के शर्त थोप दी, जिसके लिए महाराजा तैयार नही थे।अधिमिलन के विषय में नेहरू जी का रवैया असहयोगात्मक था।अतः इस दुविधाजनक स्थिति में भारत एवं पाकिस्तान के समक्ष कश्मीर के विषय में "यथास्थिति समझौता" करने का प्रस्ताव ब्रिटिश सरकार द्वारा किया गया।पाकिस्तान द्वारा एक और जहां टेलीग्राम द्वारा यथास्थिति समझौता करने की स्वीकृति दे दी गई वहीं दूसरी और कश्मीर की पीठ में छुरा घोंपते हुए उस पर कबायली आक्रमण करवाकर कश्मीर को हड़पने का प्रयास भी किया गया।उधर भारत द्वारा यथास्थिति समझौते के संदर्भ में बात करने के लिए जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री मेहर चंद महाजन को दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा गया। लेकिन कबायली आक्रमण की स्थिति से उपजी स्थितियों में उनका दिल्ली जाना सम्भव नही हो सका। वैसे बता दूं कि यथास्थिति समझौते का जम्मू कश्मीर के भारत में अधिमिलन से कोई संबंध नही था।पाकिस्तान ने यथास्थिति समझौते का उपयोग अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आँखों में धूल झौंककर कश्मीर को हड़पने के लिए किया।इतना ही नही यथास्थिति समझौते को तोड़ते हुए पाकिस्तान द्वारा कबायली आक्रमण करवाकर जम्मू कश्मीर एवं सियालकोट के मध्य न केवल अनावश्यक रूप से रेल सेवा रोक दी वरन पेट्रोल आदि आवश्यक पदार्थों की आपूर्ति भी रोक दी जो जम्मू कश्मीर एवं पाकिस्तान के मध्य हुए यथास्थिति समझौते की आवश्यक शर्त थी।
कश्मीर पर पाकिस्तान के बढ़ते कबायली आक्रमण की परिस्थितियों में जम्मू कश्मीर ने 24 अक्टूबर को भारत से सैन्य मदद की मांग की और दो दिन बाद महाराजा हरिसिंह द्वारा भारत के साथ अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करके दस्तावेज दिल्ली भिजवा दिया गया,जहां अगले दिन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने इस पर अपनी स्वीकृति देते हुए हस्ताक्षर किए।इस प्रकार भारतीय संविधान की अनुसूची एक में जम्मू एवं कश्मीर भारत का पंद्रहवाँ राज्य बन गया। भारत की संविधान सभा में भी जम्मू कश्मीर से चार प्रतिनिधि संविधान निर्माण प्रक्रिया में शामिल रहे हैं। ऐसे में जम्मू कश्मीर के भारत में संवैधानिक रूप से हुए विलय पर सवाल खड़े करके विलय को विवादास्पद एवं रहस्यमयी बताना केवल परोक्ष रूप से पाकिस्तानी एजेंडा चलाने के अतिरिक्त कुछ नही है।
(लेखक राज्य जीएसटी विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर है,लेख में प्रस्तुत विचार लेखक की निजिराय है)
No comments:
Post a Comment