712 में मुहम्मद बिन कासिम का सिंध पर जेहादी आक्रमण भारतीय इतिहास के उन पन्नो का भाग है जिसमे इस्लामी आक्रांताओं की क्रूरता एवं धर्मान्तरण के लिए हिंदुओं पर किये गए अत्याचारों के खून से सने अनेक वृतांत उध्दृत हैं।बिन कासिम जेहादी मानसकिता से प्रभावित एवं हिंदुस्तान में संग्रहित अतुल्य खजाने को लूटने की नीयत से आया था।उसके भारत पर आक्रमण का शिकार पहला राज्य सिंध और शासक राजा दाहिर था।सिंध में स्थित कोई मंदिर,मठ, विद्यालय,महाविद्यालय, शहर,नगर और ग्राम शेष नही रहा होगा जो मीर कासिम के अत्याचारों,लूट,बलात्कार का साक्षी न रहा हो।
ग्राम के ग्राम शमशान में परिवर्तित कर दिए गए।चारों तरफ चीत्कार और दर्द के स्वर के शून्य में विलीन हो जाने पर अनंत सन्नाटे का साम्राज्य था।मन्दिर,मठ, ग्राम,नगर एक विनष्ट सभ्यता के ध्वंसावशेषों में परिवर्तित हो चुके थे।उनके ऊपर घने वृक्ष एवं बड़ी बड़ी घास उग आई थी जो असंख्य जहरीले जीवों एवं खूंखार पशुओं के अभ्यारण्य में बदल चुके थे।समय का पहिया पूरी चौथाई सदी घूम चुका था।भविष्य में नवजीवन के सृजन की आशंका से मुहम्मद बिन कासिम ने पालने के निद्रालुओं एवं आंगन में किलकारियां गुंजायमान करने वाले बालपन को भी अपनी रक्तपिपासु तलवार का ग्रास बनाये बिना नही छोड़ा।जो कर-गणनीय जन बचे वह वो लोग थे जिन्होंने जान के बदले अपना आत्मसम्मान और धर्म बलिवेदी पर चढ़ा दिया था और नमाजी होना स्वीकार कर लिया था।सदैव प्रफुल्लित एवं उल्लसित रहने वाला सिंध एक विस्तृत शमशान से अधिक कुछ नही बचा था।जो धर्मप्रिय हिन्दू बचें भी उनमे भावनाएं एवं संवेदनाएं लुप्त हो गई थी क्योंकि उन नौनिहालों ने अपना सर्वस्व नष्ट होते हुए स्वयं की आंखों से देखा था।अरब के खलीफा के सहयोग से दाहिर के उसी सिंध की अरब सेना कन्नौज में सिंध दोहराने की योजना बना रही थी।योजना को योग्य गुप्तचरों ने सूंघ का प्रतापी गुर्जर प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय के समक्ष प्रकट कर दिया।नागभट्ट द्वितीय गुर्जर प्रतिहार वंश का प्रतापी शासक था जिसके नाम से ही अरब खौफ खाते थे। गुर्जर प्रतिहारों ने अपने शौर्य एवं बलिदान के दम पर लगभग 300 वर्षो तक अरब-आक्रन्ताओं से भारत भूमि को सुरक्षित रखकर, प्रतिहार (रक्षक) की भूमिका निभायी थी। वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने 816 ई. के लगभग गंगा की घाटी पर हमला किया, और कन्नौज पर अधिकार कर लिया। वहाँ के राजा को गद्दी से उतार दिया और वह अपनी राजधानी कन्नौज ले आया।इसी नागभट्ट द्वितीय का प्रमुख अंगरक्षक था-तक्षक।
तक्षक- संवेदनहीन,आँखो में सदैव गुस्सा,युद्ध मे धर्म-अधर्म पर विचार न करने वाला एक निर्दयी यौद्धा था।उसके बचपन की घटनाओं का उसके चरित्र के इस पक्ष के निर्माण पर गहरा असर हुआ था। अपने अंगरक्षक तक्षक के स्वभाव के विपरीत नागभट्ट द्वितीय एक धर्मप्रतिपालक राजा था और युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते थे। नागभट्ट द्वितीय ने कभी भी पीठ दिखाकर भागती हुई सेना पर न तो वार करते थे और न ही उनका पीछा करते थे। अरब खलीफाओं के दरबार में कन्नौज पर सिंध से भी भयंकर आक्रमण का षड्यंत्र रचा जा रहा था। नागभट्ट द्वितीय की सभा बैठी हुई थी कि तभी गुप्तचर ने महाराज के कान में कुछ कहा।महाराज ने सभा को वह घटना बताते हुए अरब षड्यंत्र की सूचना दे दी।
गुप्तचर के अनुसार अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी थी।जिसके संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर पहुंच जाने की आशंका थी।
महाराज ने युद्ध रणनीतिकारों की आपात बैठक बुलाई और इस सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए विचार-मंथन शुरू हो गया। नागभट्ट अपने सभी सेनानायकों के विचार के उपरांत ही युद्ध सम्बन्धी नीति को अंतिम रूप देते थे। इस सभा में सभी सेनानायक अपना अपना विचार रख रहे थे। सभी के विचार सुनने के बाद तक्षक अचानक बोल उठा--
"महाराज, अधर्मी के साथ धर्म कैसा? दुश्मन को दुश्मन की शैली में प्रत्युत्तर देने से ही धर्म की रक्षा हो सकेगी !" महाराज ने विस्तार पूर्वक अपनी बात कहने का तक्षक की और संकेत किया!
"महाराज, अरब असभ्य,बर्बर,अधर्मी और क्रूर हैं।अधर्मी से धर्म कैसा? इसका अर्थ है अपनी प्रजा के साथ घात करना!
दुश्मन से “उसी की शैली” में निपटना धर्म है।"
महाराज विस्मयता से बोले "किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते हैं तक्षक"
“क्षमा करें महाराज! मर्यादा का निर्वाह” उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का “अर्थ” समझते हों। ये बर्बर एवं धर्मांध राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।"
"परन्तु यह हमारा धर्म नही हैं वीर ! राजा का केवल “एक ही धर्म” होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर जघन्य अत्याचार किया था!"
कल्पना में भी यदि हम पराजित हुए तो इन राक्षसों के हमारी संतानों ,स्त्रियों और धर्म पर अत्याचार अकल्पनीय है।
महाराज की चुप्पी और सभा का सन्नाटा बता रहा था कि सब तक्षक से सहमत थे।
युद्ध व्यूह रचना के लिए एक साथ सब रणनीतिकार यौद्धा गुप्त सभाकक्ष की और बढ़ चले।
सुबह होते ही दोनों सेनाएं आमने सामने थी।एक भयंकर युद्ध का साक्षी बनने के लिए सीमांत प्रदेश विवश था।पूरा दिन व्यतीत हो गया दोनों सेनाएं शायद एक दूसरे के सामर्थ्य का आकलन कर रही थी।बीतते बीतते आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी।
अरबों को किसी “हिन्दू शासक से ” रात्रि युद्ध की आशा “न” थी। वे निद्रा से जगते,सावधान होते और हथियार सँभालते उससे पहले गाजर-मूली की तरह काट डाले गए।जिनको कुछ क्षण मिले वे सिर पर पैर रखकर भागने लगे और तक्षक जैसे वीरों के तीरों का शिकार हो गए।यह रात अरबों के लिए कालरात्रि सिद्ध हुई।तक्षक का शौर्य सबने देखा मानो प्रत्यक्ष महादेव युद्ध भूमि में तांडव कर रहे हों!जिधर से भी तक्षक का घोड़ा।निकलता उधर ही शवों के ढेर लग जाते।सूर्य की प्रथम किरण ने भारत विजय का सत्कार किया।जो भागने में सफल हुआ होगा वही अरब सैनिक जीवित सिंध लौटा होगा।दिवस के प्रथम प्रहर तक अरब सेना नष्ट हो चुकी थी।महाराज नागभट्ट तक्षक के शौर्य और रणनीति पर गौरवान्वित अनुभव कर रहे थे।लेकिन "तक्षक है कहाँ?" महाराज ने अंगरक्षक प्रवीर से पूछा !
इस सवाल के बाद स्वतः तक्षक की खोज प्रारम्भ हुई।तक्षक जहां था उस दृश्य को देखकर सबका शीश गर्व से अकड़ गया लेकिन सम्मान में झुक भी गया। अरब सैनिकों के शवों के ढेर के बीच "तक्षक" की अमर-देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे, उन्होंने अपना मुकुट एवं तलवार तक्षक के चरणों में रख कर उस अमर वीर को श्रद्धासुमन अर्पित किए।युद्धोपरांत निर्वात में गर्म सांसो का एक तेज बवंडर उठा और महाराज बोल उठे-"
तक्षक ! तुम्हारी मातृभूमि और तुम्हारी भारतपुत्र तुम पर हमेशा गर्व करेंगे।अब हम सीख गए है कि देश के लिए जान लेना, उसके लिए जान देने से कितना महान कार्य है। है तक्षक तुमने हम रण कौशल का वह अध्याय सिखाया है जो युगों तक मातृभूमि की रक्षा का सूत्र बनेगा। भारतभूमि युगों युगों तक तुम्हारे बलिदान को नमन करेगी, तुमसे प्रेरणा लेगी।"
इस युद्ध के परिणामों ने अरबों को इतना भयभीत कर दिया कि आगामी तीन सदियों तक अरबों में भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत तक नही हुई।
इतिहास ने तक्षक को यह गुरिल्ला युद्द प्रणाली सिखाई थी। बिन कासिम के अभियान के समय तक्षक केवल आठ वर्ष का था जब उसने उसके अत्याचारों के भयावह मंजर देखा था।
मुल्तान विजय के बाद बिन कासिम के जेहादी आतंकियों ने सिंध के गांव एवं शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों का शील-भंग किया गया, हजारों अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं। समस्त युवाशक्ति को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। अरब ने पहली बार भारत को इस्लाम के वास्तविक चरित्र से परिचित कराया था। भारत ने पहली बार मानवता की हत्या देखी थी।तक्षक के पिता सिंधु नरेश दाहिर के सैनिक थे जो 712 ईसवी के उस इस्लामी अधर्म युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे।
लूटपाट एवं।भयंकर रक्तपात करती अरब सेना ने तक्षक के गांव में भयंकर तबाही मचाई थी।स्त्रियों,बच्चों,बूढों सबके साथ दरिंदगी हुई।अस्मत लूटी,हत्याएं हुई। तक्षक और उसकी दो बहनें उस समय घर मे भयाक्रांत थी। तक्षक की माँ सब जान चुकी थी और तय कर चुकी थी कि उन्हें क्या करना है।
मां ने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और तीनों बच्चों को खींच कर छाती से लगा लिया। फिर उस क्षत्राणी ने तलवार उठाई और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला। उसके बाद बेटे की ओर देखा और तलवार से अपना सीना चीरकर बलिदान कर दिया।तक्षक आठ वर्ष का अबोध बालक था।एक ही अध्याय में वह जीवन का समस्त सार सीख गया था।एक दृष्टि अपनी बहनों के शीश और मां की देह को निहारा
और घर के पिछले द्वार से निकल कर जंगल में खो गया।पचीस वर्ष बीत गए। वही अष्टवर्षीय तक्षक अब बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी, उसकी आँखे सदैव अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए “आदर्श ” था।
सिंध में तक्षक का सम्पूर्ण परिवार तो बलिदान हो गया था लेकिन उसी बलिदान से निकला था नागभट्ट द्वितीय की अरब विजय का अमृत।तक्षक नही रहा लेकिन अपने रण चातुर्य और बलिदान से वह वीर असंख्य देश रक्षक पैदा कर गया।
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