Sunday, October 1, 2017

जीएसटी से होगा नए भारत का उदय

जीएसटी को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं प्रचारित की जा रही है। जो व्यक्ति जीएसटी के बारे में कुछ भी नहीं जानता है वह भी जीएसटी का विषय विशेषज्ञ बनने का दिखावा कर रहा है और समाज के अंदर जीएसटी को लेकर विभिन्न तरह के भ्रम फैला रहा है। वास्तव में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जीएसटी भारत का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी कर सुधार कानून है। यह कानून अनेक प्रकार के करो जैसे मूल्य संवर्धित कर, प्रवेश कर, केंद्रीय बिक्री, कर मनोरंजन, कर सेंट्रल एक्साइज कर एवं सेवाकर आदि विभिन्न प्रकार के लगभग सतरह केंद्रीय और राज्य करों को एक जगह समायोजित करके बनाया गया है। अर्थात अभी तक लगने वाले सतरह प्रकार के कर समाप्त करके उनके स्थान पर केवल जीएसटी लगाया जाएगा। ऐसा मान लीजिए कि अगर एक व्यापारी इन सभी विभागों में से यदि आधे या 5-7 क्षेत्र में भी व्यापार करता था और उसको यह कर देने पड़ते थे। अर्थात उस व्यक्ति को जितने करो के संबंध में व्यापार करना था उतने ही रिटर्न प्रतिमाह भरने होते थे। जैसे यदि साधारण तौर पर हम यह भी मान ले कि एक व्यापारी केवल वस्तु व्यापार में ही संलग्न था और वह प्रांतीय खरीद,केंद्रीय खरीद-बिक्री करता था, और अन्य प्रदेश से दूसरे क्षेत्र में वस्तु का आयात करता था तो उसको प्रतिमाह तीन रिटर्न और एक वार्षिक रिटर्न सहित कुल सैंतीस रिटर्न दाखिल करने होते थे। इसके अतिरिक्त उसे अन्य प्रदेश से माल लाने के लिए और केंद्रीय बिक्री करने के लिए क्रमशः फॉर्म 38 एवं फॉर्म सी आदि की आवश्यकता होती थी ।इन फॉर्म को प्राप्त करने के लिए प्राय उसको वैट कार्यालय का बार बार चक्कर लगाना पड़ता था। यानि व्यापार करने में परेशानियां बहुत ज्यादा थी। जीएसटी को लेकर ऐसे लोग ज्यादा भ्रांतियां फैला रहे हैं जो जीएसटी के मसले पर सरकार को बदनाम करके इस कानून को विफल करने का दिवास्वप्न देख रहे हैं। ज्यादातर वह लोग जो जीएसटी लागू होने के बाद मूल्यों में आई कमी के लाभ को उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचने देना चाहते हैं और उस लाभ को वह खुद हड़प कर जाना चाहते हैं, वही समाज में जीएसटी की गलत छवि पैदा करना चाह रहे हैं। ऐसे व्यापारी उनके व्यापार स्थल पर किसी उपभोक्ता के आने के बाद कहना शुरु कर देते हैं कि जीएसटी ने व्यापार तबाह कर दिया, व्यापार करना मुश्किल हो गया है,बाजार में काम ही नहीं है। बिल्कुल मंदी है, आदि तरह-तरह की बातें करना शुरू कर देता है ताकि नासमझ एवं अनपढ़ उपभोक्ता को लगे कि वास्तव में जीएसटी ने बाजार में अर्थव्यवस्था को धराशाई कर के रख दिया है। दो उदाहरण यहां मैं रखना चाहूंगा: मेरी पत्नि सहारनपुर के एक बाजार में शॉपिंग करने गई तो वह चूड़ी की दुकान पर गई। चूड़ी वाले व्यापारी ने मेरी पत्नि और उनकी सहेली जो उनके साथ में थी, के सामने जाते ही जीएसटी का रोना शुरु कर दिया। बहन जी देखो जीएसटी ने तबाह कर दिया। मार्केट बिल्कुल खत्म है, यह जो चूड़ी का डब्बा आप लेना चाह रहे हैं, जीएसटी लगने से पहले यह चालीस रुपए का था। अब यही डब्बा सत्तर रुपए का हो गया है। मैं आपको बता दूं कि चूड़ियों पर जीएसटी में शून्य कर है अर्थात चूड़ी एक ऐसी वस्तु है जिस पर कोई कर नहीं है। और उस व्यापारी ने जीएसटी का हव्वा दिखा करके ₹40 की चूड़ियों का डब्बा मेरी पत्नी को ₹70 में भेड दिया। जीएसटी में कर की उच्चतम दर 28 प्रतिशत है। अगर हम यह भी मान लें कि ₹40 के चूड़ी के इस डब्बे को उच्चतम कर स्लैब में भी रख दिया जाता तो भी ₹40 का यह डब्बा ₹70 का किसी भी तरह से नहीं बैठता था।
   एक अन्य उदाहरण जो मेरे सामने आया है। वह तो और भी मजेदार है।मैं अपने गांव हथछोया में अपने मित्र के मेडिकल स्टोर पर कुछ दवाइयां लेने गया। वहां मुझे एक फेरीवाला मिला जो कपड़े बेचता है। उससे हमने पूछा कि जीएसटी का आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ा है।तो उसने अपनी समझ के अनुसार बताया कि जो कपड़ा पहले ₹65 का आता था और वह 68 रुपए का मिलता है।  इस विषय पर हमने ज्यादा चर्चा न करके ,चर्चा में थोड़ा घुमाव किया। उसके बाद उसने अपने साथ घटित एक उदाहरण से जीएसटी की उपभोक्ता पर मार को समझाने की कोशिश की। उसने भारी मन से बताया कि जीएसटी का आम आदमी पर कितना पर असर है पड़ा है वह मैं आपको समझाना चाहता हूं। पिंडोरा गांव मेरे गांव के पास में है। उसने बताया कि "मैं पिण्डोरा में एक नाई की दुकान पर गया बाल कटवाने के लिए। नाई ₹10 लेता था बाल काटने के। बाल कटवाने के बाद मैंने नाई को ₹10 दिए।
नाई ने ₹10 वापस करके कहा भैया अब  ₹20 लगेंगे।जीएसटी ने हालत खराब कर दी है।बाल काटने के दाम बढ़ गए है।और मुझे नाई को आखिरकार ₹20 देने पड़े।अब आप ही बताओ।जीएसटी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है या नही।" टैक्स तो छोड़िए,गांव का जो नाई जीएसटी में पंजीकृत तक नही है उसने जीएसटी के नाम पर एक आम उपभोक्ता से 100% की दर से कर की गैर-कानूनी वसूली कर ली।।
एक अन्य उदाहरण से समझते हैं। अफसर तोमर,जो मेरा मित्र है और गांव में एक छोटा सा मेडिकल स्टोर चलता है। मैंने अफसर से बीटाडीन की एक मरहम ट्यूब मांगी। यह कहते हुए कि बच्चे छोटे हैं कभी-कभी चोट लग जाती है तो चाहिए। अफसर ने मुझे बताया कि उसने जो बीटाड़ीन दी थी वह सिप्ला कंपनी की है और जीएसटी लगने से पहले 53 रुपए की आती थी जो कि अब जीएसटी लगने के बाद मात्र 18 रुपए की आती है। इस प्रकार जीएसटी के सकारात्मक लाभों को उपभोक्ताओं को नहीं बताया जा रहा है। क्योंकि कपड़े पर एमआरपी प्रिंट नहीं होता है, ऐसे में उपभोक्ता को लूटने के लिए बहुत ज्यादा गुंजाइश बनी रहती है। उस पर एक्साइज ड्यूटी कम होने के लाभों को व्यापारी उपभोक्ता तक नहीं पहुंचाना चाहता है  और तुच्छ मानसकिता एवं स्वार्थी लोग इन लाभों को उपभोक्ता को हस्तांतरित न करने के लिए इस तरह के भ्रम फैलाते हैं।
  यह मोटी मोटी चीजें मैंने बताई कि जीएसटी की, किस प्रकार से एक गलत छवि बनाकर प्रस्तुत की जा रही है। हकीकत में जीएसटी लगने से व्यापार करना सफल हुआ है।व्यापार की ऑपरेटिंग कॉस्ट पहले से बहुत कम हुई है। मैं आपको बता दूं कि जीएसटी में जो सामान्य व्यापारी है, उसको प्रतिमाह एक रिटर्न भरना है और इस प्रकार वर्ष में 12 रिटर्न और यदि इसमें कोई विवरण छूट जाता है तो व्यापारी इसे अपने अंतिम यानि वार्षिक रिटर्न में दिखाकर के वार्षिक रिटर्न भरेगा। इसप्रकार कुल मिलाकर 13 रिटर्न उसको भरने हैं। समाधान के व्यापारी को त्रैमासिक रिटर्न भरना है अर्थात वर्ष में 4 रिटर्न। लेकिन अनजाने में कुछ एकाउंटेंट्स,लेखाकार एवं अधिवक्ताओं द्वारा या जीएसटी से जुड़े अन्य लोगों द्वारा यह भ्रांति फैलाई जा रही है कि व्यापारी को जीएसटी में अब प्रतिमाह तीन रिटर्न भरने हैं और इस प्रकार वर्ष में 37 रिटर्न दाखिल करने हैं। सैंतीस रिटर्न का नाम सुनकर व्यापारी पर स्वाभाविक रूप से एक मानसिक तनाव उत्पन्न होता है। जबकि हकीकत यह है कि जीएसटी कार्य पूर्व की व्यवस्थाओं जैसे वैट एवं सर्विस टैक्स आदि से अब व्यापार करना काफी आसान हो गया है। अब एक सामान्य व्यापारी भी जिस तरह से फेसबुक और व्हाट्सएप्प आदि का प्रयोग करता है उसी तरह से जीएसटी अकाउंट में अपनी सप्लाई आउटपुट सप्लाई अर्थात बिक्री को प्रदर्शित करके अपना रिटर्न दाखिल कर सकता है। बाकी चीजें जैसे आईटीसी या अन्य चीजें जीएसटी पोर्टल पर ऑटो को पोपुलेटिड यानी स्वतः सृजित होती हैं। इस रिटर्न को जीएसटी आर-1 कहा जाता है। जीएसटी आर-1 रिटर्न सफलतापूर्वक दाखिल हो जाने के बाद जब सिस्टम आपूर्तिकर्ता और आपूर्ति प्राप्तकर्ता की दाखिल की गई विवरणिका मैच कर लेगा तो वेरिफिकेशन हो जाएगा फलस्वरुप ऑटोमेटिकली जीएसटी आर-2 स्वतः सृजित हो जाएगा और जीएसटी आर-2 जनरेट होने के बाद स्वतः ही जीएसटी आर-3 सृजित हो जाएगा।जीएसटी आर 2 एवं 3 में किसी व्यापारी,अधिवक्त,सीए अथवा अकाउंटेंट की कोई भूमिका नही है लेकिन फिर भी यह दुष्प्रचार जारी है कि प्रति माह 3 रिटर्न दाखिल किए जाने हैं।जीएसटी भारत में एक नई कार्यसंस्कृति को पैदा करने की और बढ़ाया गया आर्थिक कदम है।अब ऑफिस में कागज-रहित कार्य होगा।मोटी मोटी फ़ाइल और उनमें से कागजात गुम हो जाना अब गुजरे जमाने की बात होगी।सब कुछज ऑनलाइन होना है।व्यवस्था नई है अतः कुछ व्यवस्था जनित प्रारम्भिक कठिनाइयों के अलावा जीएसटी एक नए सुखद आर्थिक युग की ओर प्रस्थान का यज्ञ है।इसमें हम सभी को अपने अपने तरीके से आहुति डालकर राष्ट्र कार्य मे अपना योगदान सुनिश्चित करना चाहिए।
(लेखक राज्यकर विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर है।यहां प्रस्तुत विचार लेखक की निजिराय है न कि विभाग का नजरिया)

No comments: