Wednesday, October 18, 2017

सूडान में शांति सेना एवं भारत

पृष्टभूमि:
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अफ्रीकी महाद्वीप का सबसे बड़ा देश सूडान वर्ष 2011 में दो देशों में बंट चुका है लेकिन  सूडान के लोगों की समस्याओं का अभी अंत नही हुआ है। दक्षिण सूडान, खनिज तेल के भंडार से समृद्ध है,जहां तेल उत्पादक क्षेत्र "सुड़" हैं। जिसके नाम पर इस देश को सूडान नाम मिला है। इन समृद्ध तेल क्षेत्रों को लेकर उत्तर और दक्षिण सूडान के बीच लम्बा संघर्ष चला,जिसके परिणामस्वरूप देश का विभाजन हुआ। विभाजन भी देश को स्थाई शांति नही दे पाया, अब भी उत्तरी एवं दक्षिण सूडान शांत नही है। दक्षिण सूडान गृहयुद्ध की चपेट में हैं।स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने वहां शांति सेना तैनात की है।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुसार साल भर तक दक्षिण सूडान में 7,000 सैन्य और पुलिस जवान रहने थे जो शांति स्थापित न होने के कारण अभी भी वहीं बने हुए हैं। अगस्त 2016 तक संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में 5700 भारतीय सैनिक तैनात थे। इनमें से 2,300 सैनिक सूडान मिशन और 3,400 सैनिक कांगो मिशन में तैनात थे। संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में भारतीय शांति सैनिकों का कार्य निष्पादन शेष विश्व के सैनिकों श्रेष्ठतम है।भारतीय सैनिकों ने तैनाती स्थलों के न केवल नागरिकों की विद्रोहियों से रक्षा कार्य किया है वरन उन्होनें वहां मानवीय मूल्यों के आदर्श प्रस्तुत किये है और बेहतर समाज सेवा की है।
दक्षिण सूडान में गृहयुध्द:
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दक्षिण सूडान गृहयुद्ध की चपेट में है।जहां 2011 में देश की स्वतंत्रता से अभी तक लाखों लोग मारे जा चुके है तथा लाखों बेघर हो गए है। दक्षिण सूडान के गृहयुद्ध में बच्चों की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र के अनुसार एक पीढ़ी का भविष्य खतरे में है। यूएन के अनुसार 10 लाख लोग देश से भाग गए हैं और दस लाख विस्थापित हुए हैं।
उधर यूनिसेफ की  फरवरी 2017 में एक चेतावनी अनुसार यमन, नाइजीरिया, सोमालिया और दक्षिण सूडान में कुपोषण और अकाल की मार झेल रहे करीब 14 लाख बच्चे इस साल मर भी सकते हैं। दक्षिण सूडान को भी अकालग्रस्त घोषित किया गया है।
दक्षिण सूडान में गृहयुद्ध के कारण:
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2011 में दक्षिण सूडान को सूडान से आज़ादी तो म गई लेकिन तेल उत्पादन क्षेत्रों को लेकर सरकार चिंतित थी। सूडान की राजधानी खार्तूम से हुए समझौते के बाद दक्षिण सूडान में तेल उत्पादन शुरू हो सका था।लेकिन नवजात दक्षिण सूडान आज़ादी का उत्सव ज्यादा दिन नही मना पाया और गृहयुद्ध के हालात पैदा होने लगे।दक्षिण सूडान यद्यपि ईसाई बाहुल्य है लेकिन देश मे जनजातीय विविधता भी है।सरकार गठन के बाद अपनी अपनी राजनीतिक असुरक्षा की भावना को लेकर देश का बहुसंख्यक डिंका एवं द्वितीय बहुसंख्यक समुदाय नुएर के मध्य तनावपूर्ण हालात पैदा हो गए।
यद्यपि दक्षिण सूडान में अनेक छोटे सशस्त्र विद्रोही लड़ाकों के कई गुट उपस्थित हैं, जिनके बीच संघर्ष होते रहते थे। लेकिन यह संघर्ष देश की राजधानी जुबा से दूरस्थ क्षेत्रों तक ही सीमित थे।
जुलाई 2013 में सत्तारूढ़ दल एसपीएलएम में उस समय आंतरिक संघर्ष चरम पर पहुंच गया जब राष्ट्रपति सल्वा कीर ने जो कि बहुसंख्यक डिंका समुदाय से आते हैं, तख्ता पलट की साजिश का आरोप लगाकर, देश के उप राष्ट्रपति रायक माचर को बर्खास्त कर दिया था, जो दूसरे बड़े समुदाय नुएर के प्रतिनिधि हैं। दरअसल सल्वा कीर एवं रायक माचर के बीच राजनीतिक मतभेद इतने बढ़ गए थे कि राष्ट्रपति ने रायक माचर को बर्खास्त कर दिया। उन्होंने रायक माचक पर तख्ता पलट की कोशिश के आरोप लगाए गए। स्वयं रायक माचर ने ऐसी किसी कोशिस से इनकार किया है। डिंका एवं नुएर समुदाय के इन दो बड़े नेताओं के बीच के मतभेद ने जातीय हिंसा का रूप ले लिया और दक्षिण सूडान, दिसम्बर 2013 आते आते गृहयुद्ध की चपेट में आ गया। अब माचर भूमिगत रहकर कीर के विरुद्ध सशस्त्र गुरिल्ला संघर्ष चला रहे हैं। माचर ने कीर द्वारा लगाए गए सभी आरोपों का हमेशा  खंडन किया है और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति सल्वा कीर की सार्वजनिक तौर पर आलोचना की।सल्वा कीर सरकार से माचर समर्थक विद्रोही सेना बनाकर सशस्त्र लड़ाई लड़ रहे हैं।
दोनों गुटों के संघर्ष में अब तक कई हजार लोग मारे जा चुके हैं और लगभग बीस लाख से ज़्यादा लोग बेघर हो चुके हैं।दक्षिण सूडान में हालात पर नियंत्रण के लिए संयुक्त राष्ट्र शांति सेना तैनात है।
सल्वा कीर सरकार ने रायक माचर नुएर के कई वरिष्ठ साथियों को गिरफ्तार का जेलों में डाल दिया ,जहां उनका, नुएर विद्रोहियों के अनुसार, भयंकर उत्पीड़न किया जा रहा है।विद्रोही नेता रायक माचर की मांग है कि सल्वा कीर सरकार द्वारा गिरफ्तार किए गए उनके सभी राजनीतिक सहयोगियों को अविलम्ब रिहा किया जाना चाहिए।इसके विपरीत सल्वा कीर बिना शर्त विद्रोहियों से वार्ता करना चाहते हैं।
रायक माचर का कहना है कि "हम एक लोकतांत्रिक देश चाहते हैं। हम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहते हैं।हम चाहते हैं कि सल्वा कीर पद से हट जाएं।"
माचर का कहना है कि वह सत्ता हथियाने के लिए नही बल्कि देश में लोकतत्रं बहाली के लिए लड़ रहे हैं।
विभाजन से पूर्व सूडान 22 वर्ष तक गृह युद्ध की आग में झुलसता रहा जिसमें दस लाख से ज़्यादा लोग मारे गए थे। इसके बाद वर्ष 2011 में दक्षिण सूडान स्वतंत्र हुआ था। देश में जारी हिंसा के चलते लगभग 80 हज़ार लोग अपने-अपने घरों को छोड़कर, आसपास के देशों में शरण लेने को मजबूर हो गए।इसके परिणामस्वरूप हुई जातीय हिंसा में बड़े पैमाने पर दोनों समुदाय के लोगों के कत्लेआम की ख़बर है। माचर का समर्थन कर रही सेना ने देश के मुख्य शहर बोर और तेल उत्पादक प्रांत यूनिटी स्टेट की राजधानी बेंतू पर कब्ज़ा  जमा रखा है।वर्तमान में देश एक अवैध आयुधागार बना हुआ है और पूरी तरह से बंदूकों से पटा हुआ है।  जनजातीय समूहों के बीच हिंसक झड़प का सूडान का पुराना इतिहास रहा है। सत्ता में बने रहने के लिए देश के प्रमुख नेता भी इन संघर्षों को बनाये रखना चाहते हैं।
दक्षिण सूडान में शांति सेना:
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गृहयुध्द से उपजी परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने दक्षिण सूडान में शांति सेना तैनात की है।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुसार साल भर तक दक्षिण सूडान में 7,000 सैन्य और पुलिस जवान रहने थे जो शांति स्थापित न होने के कारण अभी भी वहीं बने हुए हैं। अगस्त 2016 तक संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में 5700 भारतीय सैनिक तैनात थे। इनमें से 2,300 सैनिक सूडान मिशन और 3,400 सैनिक कांगो मिशन में तैनात थे।
विषम परिस्थितियों को देखते हुए
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से संयुक्त राष्ट्र शांतिसैनिकों की संख्या 6,800 से बढ़ाकर 11,800 करने की अपील की है।

गत वर्ष दक्षिण सूडान के उपराष्ट्रपति रायक माचर के सैनिक प्रवक्ता ने कहा कि दक्षिण सूडान में फिर से युद्ध शुरू हो गया है।
कर्नल विलियम गत्ज़ियाथ ने बीबीसी को बताया कि उपराष्ट्रपति मचार और राष्ट्रपति सलवा कीर के समर्थक सैनिकों के बीच फिर से लड़ाई शुरू हो चुकी है।
उनके मुताबिक तीन दिन की लड़ाई में सैकड़ों सैनिकों की मौत हो गई है और उनकी टुकड़ियां राजधानी जूबा की तरफ़ कूच कर रही हैं। राष्ट्रपति सलवा कीर पर माचर समर्थकों द्वारा शांति समझौते को लेकर गंभीर नहीं होने का आरोप लगाया है। रीक माचर के समर्थकों का कहना है कि सरकारी समर्थन वाले सुरक्षा बलों ने राजधानी जूबा में उनके ठिकनों पर हमला किया है।इसके विपरीत सल्वा कीर सरकार के सूचना मंत्री माइकल मकुई लियुथ ने यु्द्ध की ख़बरों को झूठा बताया। उन्होंने हमलों को केवल जबाबी कार्यवाही बताया।
संयुक्त राष्ट्र मिशन ने भी दावा किया था  कि उसके परिसर में सैकड़ों लोगों ने शरण ली। संयुक्त राष्ट्र ने शांति समझौते के प्रति गंभीर नहीं होने के लिए दोनों पक्षों की निंदा की है। स्थानीय रेडियो स्टेशन तामाज़ुज के मुताबिक इस लड़ाई में मरने वालों की संख्या 271 अनुमानित की गई।
दक्षिण सूडान में भारत का निवेश:
सूडान के विभाजन के समय एक ओर जहां खार्तूम को 75 प्रतिशत तेल उत्पादन से हाथ धोना पड़ा था तो वहीं दूसरी ओर दक्षिण सूडान के जूबा को भी तेल पाइपलाइनों से वंचित होना पड़ा था। दक्षिण सूडान में उत्पादित कच्चे तेल में चीन की लगभग 45 प्रतिशत हिस्सेदारी है। सूडान तेल संपदा के मामले में काफी समृद्ध है। यहां के तेल भंडार ही संघर्ष की मूल वजह है। लंबे संघर्ष और भारी हिंसा के कारण 20 लाख से अधिक लोगों के मारे जाने के बाद सूडान का विभाजन हुआ और दक्षिण सूडान स्वतंत्र हुआ था।भारत एशिया का पहला देश था जिसने दक्षिणी सूडान की राजधानी जूबा में अपना वाणिज्य दूतावास खोला और दक्षिण सूडान को एक स्वतंत्र देश के रुप में मान्यता दी थी।दक्षिण सूडान में बढ़ती हिंसा के बीच भारतीय सैनिकों के 32 सदस्यीय काफिले पर हमले के बाद 40 हजार बैरल प्रति दिन तेल उत्पादन वाले ग्रेटर नील ऑयल प्रोजेक्ट और ब्लॉक 5 ए से भारत ने अपने सभी अधिकारियों को वापस बुला लिया था। इस हमले में भारतीय सेना के एक लेफ्टिनेंट कर्नल सहित पांच सैन्यकर्मी शहीद हो गए थे।। भारत सरकार की कंपनी ओएनजीसी का विदेश में काम देखने वाली कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड [ओवीएल] ने अपने 11 अधिकारियों को सूडान की उस तेल परियोजना के लिए तैनात किया था। सत्ता से हटाए गए सूडान के उप राष्ट्रपति रायक माचर की वफादार विद्रोही सेना ने यूनिटी राज्य पर कब्जा कर लिया, जहां सबसे अधिक तेल क्षेत्रों में काम होता था। ग्रेटर नील आयल प्रोजेक्ट में ओवीएल की 25 फीसद हिस्सेदारी है जबकि ब्लॉक 5ए में 24.125 फीसद है जहां से पांच हजार बैरल प्रतिदिन तेल निकलता था। इस परियोजना में 40 फीसद हिस्सेदार चीन और 30 फीसद हिस्सेदार मलेशिया ने भी दक्षिण सूडान से अपने अधिकारियों को खाली कराने का फैसला लिया। इसप्रकार देश की मौजूदा संकटों के कारण तेल उत्पादन घटने से विश्व के तेल बाज़ार पर भी असर पड़ा।




दक्षिण सूडान में भारत की भूमिका:
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दक्षिण सूडान में तैनात शांति सैनिकों ने सैन्य दायित्वों के अतिरिक्त सामाजिक प्रदर्शन से सम्पूर्ण विश्व का ध्यान आकर्षित किया है।दक्षिण सूडान में शांति स्थापना के लिए कई भारतीय सैनिकों ने अपना बलिदान भी दिया है।
दिसंबर 2013 में  दक्षिणी सूडान के राज्य जोंगलेई में संयुक्त राष्ट्र के एक परिसर में हुए हमले में दो भारतीय शांति सैनिक शहीद हो गए थे।यह हमला नुएर विद्रोहियों ने किया था। इन हमलावरों का निशाना आम लोग थे, जिनमें ज़्यादातर डिंका समुदाय के थे। यह हमला अकोबा स्थित संयुक्त राष्ट्र के परिसर में  उस समय हुआ जब वहां 43 भारतीय शांति सैनिक उपस्थित थे।
ज़्यादातर हमलावर युवा थे और उनके निशाने पर डिंका समुदाय के 32 लोग थे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र के परिसर में शरण मांगी थी। संयुक्त राष्ट्र  डिंका और नुएर के बीच गृह युद्ध शुरू होने की आशंका पहले ही जाहिर कर चुका था।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून  दक्षिण सूडान के कई हिस्सों में हिंसा बढ़ने, मानवाधिकार उल्लंघन और हत्या की ख़बरों से स्वयं काफी चिंतित हैं।
भारतीय शांति सैनिकों का सम्मान:
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दक्षिण सूडान में तैनात भारतीय सैनिकों की कर्तव्यनिष्ठा और समाज सेवा के कार्यों को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी पुरुस्कृत कर मान्यता दी है। अक्टूबर 2017में युद्धग्रस्त दक्षिणी सूडान में शांति स्थापित करने में योगदान के लिए 50 भारतीय सैनिकों को संयुक्त राष्ट्र (यूएन) पदक से सम्मानित किया गया है। दक्षिणी सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन के सेना कमांडर जनरल फ्रैंक मुश्यो कमांजी ने जोंगलेई प्रांत के बोर में तैनात भारतीय बटालियन के इन शांति सैनिकों को पुरस्कृत किया।
उन्होंने बोर में संयुक्त राष्ट्र नागरिक रक्षा केंद्र में शरण लेने के इच्छुक 25 हजार नागरिकों के लिए सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराने और क्षेत्र में गश्त लगाने में उनके योगदान की सराहना की। कमांजी ने कहा, 'मैं जोंगलेई में बहादुरी और पेशेवर तरीके से अपने कार्य को अंजाम देने के लिए भारतीय बटालियन का आभार व्यक्त करता हूं।'
दक्षिणी सूडान में भारतीय राजदूत श्रीकुमार मेनन भी पदक वितरण समारोह में शामिल हुए। उन्होंने शांति सैनिकों की प्रतिबद्धता और सेवा के लिए उनका आभार व्यक्त किया। मेनन ने कहा, 'भारत संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के उद्देश्यों के प्रति वचनबद्ध है। हम अंतरराष्ट्रीय शांति स्थापित करने में संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों का समर्थन करने को तैयार हैं।'
जोंगलेई के कार्यवाहक गवर्नर डॉ अगोट एलियर ने भी इस मौके पर भारतीय शांति सैनिकों की सराहना की। उन्होंने कहा, भारतीय बटालियन ने दक्षिणी सूडान में समुदाय की सुरक्षा और स्थानीय शांति प्रयासों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारतीय शांति सैनिकों ने अपने मूल कार्यों से इतर समुदाय को बहुत सी आवश्यक सेवाएं प्रदान कीं। इनमें स्थानीय निवासियों की चिकित्सा देखभाल और स्थानीय किसानों व पशुओं के उपचार में मदद भी शामिल है।

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