किसान:गन्ने से आबद भी बर्बाद भी।
@सुनील सत्यम
गन्ना : क्या चूक गई शक्ति ?
देश की 52 % से अधिक आबादी कृषि पर आधारित है.अधिकांश किसान कम पढ़ा लिखा है. उसके लिए राजनीती का अर्थ सिर्फ कोई भी चुनाव लड़ लेना है. राजनितिक एवं आर्थिक दांवपेंच उसकी समझ से बाहर हैं. गन्ना राजनीती से बहुतों ने अपनी राजनीती चमकाई है..चौधरी चरण सिंह से लेकर अब उनके पोते जयंत तक...गन्ने पर अवसर आते ही राजनीती करते रहे है..लाखों किसानों का अरबो रूपया चालाक मिल मालिकों की तिजोरिया दिन दुनी रत चोगुनी गति से भर रहा है..गरीब किसान ऋण के मकडजाल में फास्ता चला जा रहा है क्योंकि उसने अपनी जमा पूंजी तो गन्ने की उत्पादन लागत में खर्च कर दी. अब अपनी रोजमर्रा की जरूरते पूरी करने के लिए वह ग्रामीण साहूकार के चंगुल में फसता जा रहा है..यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है की 1991-92 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश श्री कल्याण सिंह ने किसान क्रेडिट कार्ड की शुरुआत करके किसानों को साहूकारों के चंगुल से निकालने का कम किया था..लेकिन अब स्थिति पुनः ऐसी बन रही है कि किसानों को अपनी दैनिक जरूरतों, बिमारी के ईलाज और बच्चों की शादी तक के लिए ग्रामीण साहूकारों से 10% प्रतिशत प्रति माह तक की दर से ऋण लेना पड रहा है..क्योंकि किसान क्रेडिट कार्ड पर वह पहले ही ऋण लेकर उसे कृषि उत्पादन में खर्च कर दिया है..
पहले गन्ने पर नेता राजनीती करके अपना जनाधार बढ़ाते थे लेकिन अब चीनी उद्योगपति इसी गन्ने पर राजनीती करके अपनी सम्पदा बढ़ाने में लगे है.गन्ने के सरकारी मूल्य पर खरीदने के बाद भी चीनी उद्योग को किसी भी प्रकार से हानि नहीं है..लेकिन घाटा दिखाकर चीनी मिल मालिक एक तीर से कई निशाने लगाने में कामयाब हो गए है जिसकी कीमत गरीब किसान चुका रहा है.घाटे का रोना रोकर मिल मालिकों ने गन्ना भुगतान बंद कर दिया और उस पैसे का शेयर मार्किट एवं कमोडिटी मार्किट में निवेश करके कई गुना मुनाफा कमाया..मिल मालिक भुगतान में देरी के लिए तो क्या ब्याज चुकाएगा, किसान को इसकी एवज में अपनी जरूरते पूरी करने के लिए लिए जा रहे ऋण पर बैंक दर से कहीं अधिक ब्याज और चुकाना पढ़ रहा है..यानि किसानों का भुगतान रोककर मिल मालिक अप्रत्यक्ष तूप से मुनाफाखोरी में लिफ्त है.
दूसरी और घाटे का राग अलाप कर एवं सम्भवतः कुछ अधिकारीयों एवं राजनेताओं के साथ अनैतिक सिंडिकेट का निर्माण करके, चीनी मिल मालिकों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए दी जाने वाली लेवी चीनी दे भी छुटकारा पा लिया.इस सबके बावजूद भी मिल मालिक गन्ना भुगतान के लिए अभी राजी नहीं है.
सरकार को एक गन्ना नीति घोषित करनी चाहिए जिसके अनुसार-
1. किसानों को गन्ना बिक्री के अधिकतम 7 दिन के अन्दर भुगतान अनिवार्य रूप दे किया जाना चाहिए. यदि इससे अधिक देरी होती है तो मिल मालिक को खुले बाज़ार की दर से किसानों को ब्याज भुगतान करना चाहिए.
2.सरकार को गन्ना किसानों को उत्पादन लागत सहायता उपलब्ध करनी चाहिए..यह 0% की दर पर होनी चाहिए.
3.अनिवार्य गन्ना फसल बीमा में गन्ना भुगतान में होने वाले विलम्ब के विरुद्ध भी कवच किसानों को मिलना चाहिए.
4. सरकार गन्ना उत्पादन के लिए क्षेत्रफल कोटा भी निर्धारित करे ताकि गन्ना उत्पादन अधिक्य के कारन मूल्य गिरावट के प्रभावों से बचा जा सके.
इसके अतिरिक्त किसानों के स्वयं भी गन्ना फसल उत्पादन से बाहर निकलना चाहिए ताकि गन्ना मिल मालिकों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके.
@ सुनील सत्यम
Friday, September 29, 2017
किसान:गन्ने से आबाद भी, बर्बाद भी
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment