Sunday, September 10, 2017

जातीय राजनीति का सच

देश मे जातीय राजनीति का अपना महत्व और सफर रहा है।राष्ट्रीय राजनीति में जाति व्यवस्था एक बहुत बड़ा तत्व है जिसे नकारा नही जा सकता है।
आज़ादी के बाद नेहरू जी ने सत्ता विरासत की भांति प्राप्त कर ली थी।उन्हें 1946 में गठित अंतरिम सरकार का उपाध्यक्ष बनाया गया था।इस प्रकार वह 1947 में देश की आज़ादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री हुए।
   नेहरू जी ब्राह्मण थे और देश की कुल आबादी में ब्राह्मणों की जनसंख्या 5% से काफी कम है।अतः उन्होंने सोची समझी रणनीति के तहत देश की वर्णों के खत्म करने के लिए जातीय विघटन के बीज डालें। देश मे आश्चर्य जनक रूप से ब्राह्मण,वैश्य और शूद्र वर्ण तो आज भी यथावत हैं लेकिन क्षत्रिय वर्ण परिदृश्य से गायब है।यह अकारण नही है।नेहरू जी जानते थे कि उनकी सत्ता को यदि कोई वर्ण चुनौती दे सकता है तो वह क्षत्रिय ही था।ब्राह्मण वह स्वयं थे और इसलिए इस वर्ण के लिए सर्वस्वीकार्य नेता थे,वैश्य वर्ण से उन्हीने इसलिए खतरा महसूस नही किया क्योंकि यह वर्ण व्यावसायिक वृत्ति का रहा है जिसे व्यापार व्यवसाय के लिए एक शांतिपूर्ण व्यवस्था की आवश्यकता थी अतः वह किसी भी स्थाई सत्ता को समर्थन करता।शूद्र वर्ण से नेहरू जी ने कोई खतरा महसूस नही किया क्योंकि उन्हें इस वर्ण के राजनीति सामाजिक उत्थान के बारे में कल्पना नही थी।उन्हें कभी नही लगा कि शूद्र वर्ण कभी एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर सकता है।अतः नेहरू जी का ध्यान सिर्फ क्षत्रिय वर्ण पर केंद्रित रहा।इस वर्ण के प्रति वह सशंकित थे ।अतः उन्होंने इतिहास लेखन में उस धारा को बढ़ावा दिया जिसने क्षत्रिय वर्ण को विभिन्न जातीय समूहों में विभाजित करने का कार्य किया।यह आश्चर्यजनक सत्य है कि अकादमिक वर्ग के बीच विभिन्न जातियों की उत्पत्ति,उसके इतिहास पर तो शौध कार्य हुआ लेकिन देश के किसी भी विश्वविद्यालय में ऐसा कोई शौधकार्य प्रकाश में नही आ सका है जिसका उद्देश्य विभिन्न जातियों की एकता और उनकी समान उत्पत्ति का स्रौत रहा हो।इस प्रकार क्षत्रिय वर्ण को गुर्जर,राजपूत,यादव,जाट,कुर्मी,पटेल,लोध आदि में बांट दिया गया।यह आश्चर्यजनक है कि गुजरात जो गुर्जर जाति का केंद्र रहा है,वहां आज गुर्जर कुर्मी,पटेल,पाटीदार आदि जातीय समूहों में विभक्त है।महाराष्ट्र में शिवाजी भौंसले के वंशज मराठा बताए गए जबकि उत्तर प्रदेश में वही बैंसला गुर्जर है।इस प्रकार एक सोची समझी रणनीति के तहत क्षत्रिय वर्ण को समाप्त कर दिया गया।उसे विभिन्न जातीय समूहों में बांट दिया गया।कालांतर में इन जातियों, जो समान उत्पत्ति की हैं,में वैवाहिक संबंध भी पूर्णतः वर्जित हो गए।सोचने का विषय यह है कि अनेक जातियॉ एवं गौत्र होने के बावजूद ब्राह्मणों एवं वैश्यों में आज भी वैवाहिक संबंध वर्जित नही हैं जबकि गुर्जर,जाट,यादव,कुर्मी,पटेल,लोध, आदि में वैवाहिक संबंध सामान्यतः वर्जित हैं,जबकि ये सभी एक ही उत्पत्ति के हैं।उदाहरण के लिए गुर्जर,जाट,राजपूत (गुजारा) के 90% से अधिक गौत्र समान है।तंवर(तोमर), पंवार,चौहान आदि गौत्र गुर्जर,जाट,राजपूत तीनों जातियों में पाए जाते हैं।स्पष्ट है कि समान उत्पत्ति के होते हुए भी इन जातियों में वैवाहिक संबंध वर्जित हैं।
     एक प्रकार से नेहरू जी ने अंग्रेजों से विरासत में प्राप्त "फूट डालो,राज करो" की नीति को बखूबी आगे बढ़ाया।
     आज राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हैं।
  2014 के लोकसभा का चुनाव देश की राजनीति में एक "महान विभाजक" के रुप में याद किया जाएगा।तमाम दलों के विरोध के बावजूद मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा गठबंधन ने बहुमत हासिल किया।देश मे हिन्दू मतदाता पहली बार वोट बैंक के रुप में संगठित हुआ।
जारी...

No comments: