Tuesday, September 26, 2017

कब बनेगा शाकुम्भरी देवी श्राइन बोर्ड?

देश की 51 शक्तिपीठों में से एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के सहारानपुर जनपद की बेहट तहसील में शिवालिक पर्वत श्रृंखला में अवस्थित है।यह शक्तिपीठ हैं श्री माता शाकुम्भरी शक्तिपीठ।इस शक्तिपीठ की देश के हिंदुओं में बड़ी मान्यता है।यह प्रति वर्ष चैत्र एवं आश्विन माह में विशाल मेला लगता है और देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचकर माँ शाकंभरी के दर्शन कर धार्मिक लाभ उठाते है।शाकंभरी देवी ऐतिहासिक चाहमान वंश की कुलदेवी है।
मेले की व्यवस्था यद्यपि सहारनपुर जिला पंचायत परिषद देखती है लेकिन वह केवल तात्कालिक व्यवस्था होती है।मन्दिर पर श्रद्धालु लाखों की संख्या में चढ़ावा चढ़ाते हैं लेकिन इस धन का मेला परिसर में स्थाई परिसंपत्ति निर्माण में अभी तक नाममात्र का अंश भी कभी व्यय नही किया गया है।आज भी चढ़ावे का एक बड़ा हिस्सा रानी जसमौर के खजाने में जाता है और इस प्रकार श्रद्धालुओं द्वारा दिया गया दान मंदिर के विकास,श्रद्धालुओं हेतु सुविधाओं के विकास,सौंदर्यीकरण आदि में कभी खर्च नही हो पाता है, न ही इस धन से मंदिर एवं मेले में अतिरिक्त सुविधाएं जुटाने के लिए आय के अतिरिक्त स्रौत के सृजन के लिए ही कोई उपयोग हो पाता है।
बरसात के समय आज भी मन्दिर प्रबन्धन असहाय नजर आता है।वर्षा के समय शाकुम्भरी खोल में अचानक भारी मात्रा में पानी आ जाने के कारण जिला पंचायत परिषद और मेला प्रबंधन द्वारा की गई सारी व्यवस्थाएं धरी की धरी रह जाती हैं और श्रद्धालुओं तथा मेले में व्यापार करने आये लोगों को बड़ी भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।मेला प्रबन्धन द्वारा व्यापारियों को छप्पर तिरपाल से बनी अस्थायी दुकानें किराए पर आवंटित की हुई है, जो पानी के तेज बहाव के सामने क्षणभर भी नही ठहर पाती हैं।और पानी का तेज बहाव उनमें रखे सारे सामान को अपने साथ बहाकर ले जाता है जिससे व्यापारियों को भारी आर्थिक हानि उठानी पड़ती है । जिसके एवज में उंन्हे मेला प्रबन्धन की और से किसी प्रकार की कोई भरपाई भी नही की जाती है। यात्री एवं भारी वाहन तक पानी की तेज धार में बह जाते हैं।आज तक इस आवर्ती समस्या का कोई स्थायी समाधान खोजने की जहमत न तो मेला प्रबन्धन ने उठाई और न ही जिला पंचायत परिषद सहारनपुर ने।
       सहारनपुर जनपद को विश्व के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने में शाकुम्भरी शक्तिपीठ का विकास एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।यह क्षेत्र हरियाणा, हिमाचल,उत्तराखंड तीन राज्यों से केवल चंद किलोमीटर की भौगोलिक दूरी पर स्थित है।पंजाब एवं जम्मू कश्मीर यहाँ से कुछ सौ किलोमीटर स्थित है।
कटरा (जम्मू) स्थित विश्व प्रसिद्द वैष्णों देवी शक्तिपीठ के भी यह तीर्थ समीपस्थ तीर्थो में से एक है।
   इस शक्तिपीठ को विश्व धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर स्थान दिलाने के लिए आवश्यक है कि सरकार इसका अधिग्रहण करके इसके इसके प्रबंधन, विकास एवं सौंदर्यीकरण के लिए श्री माता वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर श्री माता शाकुम्भरी देवी श्राइन बोर्ड का गठन कर।जिसका अध्यक्ष राज्यपाल या मुख्यमंत्री हो तथा प्रशासक के रुप मे सरकार किसी पेशेवर की नियुक्ति करे जो प्रबंधन अथवा प्रशासन से जुड़ा व्यक्ति अथवा अधिकारी हो सकता है।इस शक्तिपीठ की 10 किमी की परिधि में सहंसरा ठाकुर, माँ रक्तदंतिका, प्रसिद्द जलकुंडी आदि प्रमुख धार्मिक स्थल है।क्षेत्र के विकास के लिए भूगर्भवेत्ता, पर्यावरणविद,अर्चिटेक्ट, पर्यटन विशेषज्ञ, डेकोरेटर, भूगोलविद, आदि को मिलाकर एक टीम का गठन होना चाहिए जो इस क्षेत्र की विभिन्न पेचीदगियों को ध्यान में रखकर इसके विकास की समग्र योजना श्राइन बोर्ड एवं सरकार के समक्ष रखे।यहां रोपवे शक्तिपीठ को सहंसरा ठाकुर एवं जलकुंडी को जोड़ सकता है जिससे इस क्षेत्र की खूबसूरती के साथ साथ बोर्ड की अतिरिक्त आय भी होगी।बोर्ड यहां मेले के लिए स्थाई परिसंपत्तियों के रूप में दुकानें एवं कॉम्प्लेक्स एवं होटल,धर्मशाला वाहनों के लिए पार्किंग, चिकित्सालय आदि का भी निर्माण कर सकता है,और इससे सृजित आय से मन्दिर की व्यवस्था,प्रसाद,कर्मचारियों का वेतन,सौंदर्यीकरण, प्रचार प्रसार आदि कार्य कर सकता है।भैरव मंदिर के पास प्रसाद काम्प्लेक्स बनाकर मन्दिर के पास बनी दुकान स्थानांतरित की जा सकती है जिससे मन्दिर के पास से अतिक्रमण भी हटेगा और श्रद्धालुओं को गमन हेतु सुगमता होगी, सौंदर्यीकरण भी बढ़ेगा। भैरव मंदिर को शाकुम्भरी द्वार से पुल द्वारा जोड़ा जा सकता है।यहां से एक पुल सहंसरा ठाकुर मार्ग को जोड़ते हुए शनराचार्य आश्रम के पास से मन्दिर तक मार्ग सुगम कर सकता है।ऐसा होने से अचानक जल आ जाने से भी कोई नुकसान नही होगा और जल का अबाधित प्रवाह भी हो सकेगा।मुख्य मंदिर के ऊपर स्थित पंचवटी आश्रम तक सुगम पहुंच के लिए मार्ग निर्माण एवं पंचवटी का सौंदर्यीकरण करने से श्रद्धालुओं को धार्मिक पर्यटन का बेहतर लाभ हो सकेगा।बोर्ड के गठन से सरकार इस क्षेत्र के लोगों का स्थानीय स्तर पर ही रोजगार उपलब्ध करा सकती है।मंदिर के विकास से अन्य सहायक क्षेत्रों का विकास होगा जो क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का विविधीकरण करेगी अर्थात लोगों के पास गैर-कृषि क्षेत्र में तो आय के अतिरिक्त साधन जुटेंगे ही बल्कि क्षेत्र में पर्यटन का भी विकास होगा।हिमालय की खूबसूरती का आर्थिक लाभ हमे पर्यटन केंद्र के विकास एवं उससे आय के रूप में मिलेगा। वैष्णों माता के दर्शन को जाने वाले श्रद्धालु भी अपनी तीर्थ यात्रा में शाकुम्भरी माता की यात्रा को जोड़ सकेंगे।
(प्रस्तुत लेख में लेखक की निजिराय व्यक्त की गई है)

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