Wednesday, September 27, 2017

यूपी का अन्ना हजारे

यूपी का अन्ना हजारे
-----–--------------------------सुनील सत्यम
             जब आप किसी बड़े संघर्ष के प्रारम्भ होने के साक्षी रहे हों तो उसका स्मरण मात्र आपको गौरवान्वित कर देता है। बात 26 फरवरी 1996 की है, देखते देखते 21 वां वर्ष शुरू हो रहा है।एक युवा अध्यापक मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश और संघर्ष की एक मशाल थामे मुज़फ्फरनगर शहर में प्रवेश करता है,मैं बी.एससी.द्वितीय वर्ष का छात्र था और अभाविप का पदाधिकारी।मै उस दिन डी ए वी कालेज मुज़फ्फरनगर के तत्कालीन प्राचार्य डॉ बी के त्यागी पर हुए जानलेवा हमले के विरोध में है प्रदर्शन को लीड कर रहा था।प्रदर्शन के बाद मेरी निगाह मास्टर विजय सिंह पर पड़ी,भ्रष्टाचार एवं भूमाफियाओं के खिलाफ उनके आंदोलन से मै भी प्रभावित हुए बिना नही रहा पाया।उनके साथ धरने पर बैठकर उन्हें अपना नैतिक समर्थन दिया।मैंने स्नातक पूरी की,कालेज और शहर दोनों छोड़ दिए।लंबे संघर्ष के बाद मैंने सफलता पाई मगर मास्टर विजय सिंह जी वहीँ डटे रहे।
दिन,महीने,साल गुजरे और अब 21 वां वर्ष प्रारम्भ होने जा रहा है।संघर्ष अपनी मंजिल पर न पहुंचे,ऐसा नही हो सकता है।मास्टर जी आप सफल होंगे और बहुत जल्द होंगे।लोकतंत्र के सेनानी 20 वर्ष से धरनारत है,और चोर चुनावी तैयारी कर,लोकतंत्र के रखवाले बनने का षडयंत्र बुन रहे हैं।
यह धरना दुनिए के सबसे लंबे धरने के रूप में "लिम्का एवं गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड्स" में स्थान बना चुका है।

         
गर्व का विषय है यह नहीं है मास्टर विजय सिंह, दुनिया के सबसे लंबे धरने का रिकॉर्ड बना चुके हैं बल्कि शर्म का विषय यह है कि भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में यदि सत्य के साधक को समाज एवं राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दे मुद्दों को लेकर इतना लंबा संघर्ष करना पड़े कि उसका जीवन युवावस्था से कब प्रौढावस्था में प्रवेश कर जाए,यह पता ही न चल पाई! फिर लोकतन्त्र का अर्थ ही क्या?
मास्टर विजय सिंह के सामने सुरक्षित कैरियर था, एक अच्छी खासी सरकारी नौकरी थी जिसे छोड़कर वह भ्रष्टाचार, अत्याचार के विरुद्ध आक्रोश लेकर व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद से धरने पर बैठ गए।26 फरवरी 1996 को जब वह धरने पर बैठे उस समय उनके मन विश्वास रहा होगा कि उनका आंदोलन बहुत शीघ्र सकारात्मक परिणाम लाएगा। और उस समय के मुजफ्फरनगर और आज के शामली जनपद के चौसाना गांव में दबंगों द्वारा कब्जाई गई 4000 बीघे जमीन, जिस पर जन कल्याण के कई कार्य हो सकते थे, जिसका गरीबों में पुनर्वितरण हो सकता था, उस पर से उनके द्वारा शुरू किए गए आंदोलन के परिणामस्वरुप सरकारी तंत्र कब्जामुक्ति कराएगा। लेकिन अंततः परिणाम क्या हुआ? मास्टर विजय सिंह अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गए जो एक लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। किसी लोकतंत्र में, सामाजिक सरोकारों से जुड़े किसी विषय को लेकर दुनिया का सबसे लंबा धरना चले यह उस लोकतंत्र की स्वास्थ्य प्रक्रिया पर एक सवालिया निशान है। लोकतंत्र के रखवालों को विचार करना होगा कि उस देश का लोकतंत्र आखिर जा किधर रहा है? यह एक यक्ष प्रश्न है कि क्या सामाजिक सरोकारों, राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़े सवालों को लेकर आम आदमी के आंदोलन का कोई महत्व नहीं है ? क्या आंदोलन का अर्थ हजारों की संख्या में उमड़ी भीड़ और उसके द्वारा आराजकता और तोड़फोड़ करना होता है? क्या उन्हीं आंदोलनों का परिणाम सामने आता है ? क्या हरियाणा के जाट आंदोलन की तरह से अंदोलन किया जाता तो तब मास्टर विजय सिंह को न्याय मिलता? न्याय जिसकी अभिलाषा उनके मन में समाजिक सरोकारों को लेकर थी?

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