Monday, September 4, 2017

रोटी का जीडीपी

अकादमिक अर्थशास्त्र के अनुसार विकास ,समृद्धि और जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की अपनी परिभाषाएँ हैं। इस अर्थशास्त्र मे विकास जीडीपी की वृद्धि दर से देखा जाता है न कि गरीब कि थाली मे रोटी से। समान्यतः हम जीडीपी वृद्धि दर कि बाते सुन सुन कर बड़े हुए हैं। देश मे जीडीपी वृद्धि को उपलब्धि और कमी को सरकारों की सफलता और असफलता के रूप मे पक्ष-विपक्ष द्वारा प्रचारित किया जाता है।
 यदि हम मोटी समझ के रूप मे समझे तो "वृद्धि" एक तात्कालिक प्रक्रिया है जबकि विकास एक सतत प्रक्रिया है। इसलिए जीडीपी वृद्धि को विकास का एक मात्र संकेतक नहीं माना जा सकता है जबकि सरकारें इसी को अपनी उपलब्धि के रूप मे प्रचारित किया जाता है।लेकिन जरूरतों का अर्थशास्त्र जीडीपी बढ्ने घटने से संचालित नही होता है। वृद्धि दर एक पाश्चात्य अवधारणा है जिसे भारतीय परिवेश मे हूबहू स्वीकार करना सच्चाई से मुंह चुराने जैसा है। आजकल मानव विकास सूचकांक को विकास एक प्रमुख संकेतक के रूप में वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं एवं संगठनों द्वारा स्वीकार किया जाने लगा है।
        संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा वर्ष 2010 से मानव विकास रिपोर्ट हेतु UNDP द्वारा HDI की गणना में नई प्रविधि का प्रयोग किया जा रहा है जिसके अंतर्गत 3 संकेतक शामिल हैं-
1. जीवन प्रत्याशा सूचकांक (LEI)
2. शिक्षा सूचकांक (EI)
3. आय सूचकांक (II)
जारी 

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