Wednesday, September 20, 2017

पंचायतों में सुधार की जरूरत

     90 के दशक में देश ने सत्ता के विकेन्द्रीकरण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया।देश की संसद ने पंचायत राज अधिनियम को पारित करके देश में त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था को अपनाया।उत्तर प्रदेश में भी इसी अधिनियम के तहत त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था प्रारम्भ हुई। सार्वत्रिक वयस्क मताधिकार के आधार पर जिला विकास समिति, क्षेत्र विकास समिति एवं ग्राम पंचायत स्तर पर जन प्रतिनिधि चुनकर जनता के हाथों में शक्ति का विकेन्द्रीकरण किया गया।पंचायतों के लिए विकास हेतु चुनिंदा विषय सुरक्षित किये गए जैसे पेयजल,स्वच्छता,सड़क आदि का निर्माण, रखरखाव एवं विकास।
   निश्चित रूप से पंचायती राज व्यवस्था से आमजन को लाभ हुआ।लोगों का राजनीतिक प्रशिक्षण हुआ और सत्ता में लोगों की भागीदारी में वृद्धि हुई।वर्षों से वंचित दलित,पिछड़े एवं महिलाओं की विकास कार्यों एवं पंचायतों में भागीदारी में वृद्धि हुई। यद्यपि यह एक अलग बात है कि अधिकांश मामलों में दलितों, पिछड़ों एवं महिलाओं को ढाल बनाकर पुरुष वर्ग ने ही पंचायतों पर वर्चस्व बनाये रखा, खासकर ग्राम पंचायत स्तर पर।

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