Monday, February 29, 2016

जड़ों को पानी

बजट आते रहे है और भी आते रहेंगे।वर्ष 2016-2017 का बजट आज़ादी के बाद के भारत में अनोखा है।इसकी तुलना यदि की जा सकती है तो वह आज़ाद भारत का पहला बजट ही हो सकता है जिसमे अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र को महत्व दिया गया था।
एक पेड़ को यदि हम फलते-फूलते देखना चाहते है तो हमें उसकी जड़ों को सीचना होता है न कि शाखाओं और तनों को। अर्थव्यवस्था भी एक पेड़ की भांति है जिसकी जड़ कृषि,तना उधोग और शाखाएं सेवा क्षेत्र है।
देश की सरकारे लोक लुभावने बजट लाती रही हैं।लेकिन अर्थव्यवस्था की जड़ो को सीचने की परवाह किसी ने नहीं की।
वर्ष 2016 के बजट में कृषि,मजदूर और गांव तथा गरीब पर दृष्टिपात किया गया है।यही वर्ग है जिसकी सम्पन्नता पर बाकि गतिविधियां निर्भर करती है।किसान,मजदूर और गरीब लोग अपनी आय का आधे से अधिक बाजार में खरीद करने में लगाते है।इस वर्ग की क्रय क्षमता बढ़ने का अर्थ है छोटे मझोले शहरों के बाजारों में रौनक।जो अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने वाले कारक है।गन्ना भुगतान की समस्या ने छोटे,मझोले शहरों की अर्थव्यवस्था की जान निकाल कर रख दी है।देश का किसान,मजदूर,गरीब यदि खुशहाल नहीं है तो अर्थव्यवस्था का इंजन चोक हो जाना लाजिमी है।आज अर्थव्यवस्था उपभोक्ता उत्पादों के इर्दगिर्द ज्यादा संचालित है।यदि ग्राहक ही नहीं होगा तो धनचक्र शुरू ही नहीं हो सकता।
मेरे जैसे नौकरी पेशा लोगों के लिए बजट जरूर निराश करने वाला है।लेकिन यदि अपने क्षुद्र स्वार्थो के आधार पर ही विश्लेषण किया जाये तो यह राष्ट्रीय हितों की अनदेखी होगी।यदि रेस्टॉरेंट में 500 रुपये खर्च करके मेरी जेब से 0.5% की दर से ₹  2.5 किसान कल्याण सेस के रूप में देश के विकास को गति देने के लिए चले जाये तो यह प्रलाप का विषय बिलकुल नहीं है।₹ 500 रेस्टोरेंट में खर्च करने वाला आदमी स्वेच्छा से ₹10 या अधिक तो सर्विस बॉय को टिप दे देता है और ₹20 या अधिक की जूठन थाली में छोड़ देता है।ऐसे में देश के अन्नदाता के कल्याण के लिए 0.5% सेस रूपी योगदान बहुत कम है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि अब हम गांव की और निरंतर देखते रहेंगे।

राष्ट्रवाद के साथ साम्यवादी वर्ग-संघर्ष

राष्ट्रवाद के साथ साम्यवादी वर्ग-संघर्ष
--------------------------सुनील सत्यम
इसकी शुरुआत से ही साम्यवाद की संजीवनी कथित 'वर्ग-संघर्ष" रहा है यानि साम्यवादियों को स्वयं को जीवित रखने के लिए कोई स्थाई शत्रु चाहिए।संघर्ष में ही शत्रुता भी निहित होती है।इसलिए सुविधा और स्वभावनुसार साम्यवादी शत्रु भी चुन ही लेते हैं।भारत और विश्व साम्यवाद में एक प्रमुख अंतर यह रहा है कि जहाँ 1917 की रुसी क्रांति के समय वैश्विक साम्यवाद ने पूंजीवाद को साम्यवाद ने अपने वर्ग संघर्ष का केंद्र माना वहीँ दूसरी और भारत में खुद मार्क्स के अनुसार वर्ग संघर्ष के लिए कभी परिस्थितियां अनुकूल नहीं रही और यही कारण रहा कि वर्ग संघर्ष के लिए वैश्विक साम्यवाद के विपरीत भारतीय साम्यवादियों को एक स्थायी शत्रु नहीं मिला। इन्होंने समय समय पर वर्ग संघर्ष को भी अलग अलग दिशा में मोड़ दिया। 1934 में ब्रिटिश भारत सरकार ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया तो इन्होंने 1939 में साम्राज्यवाद के प्रति वर्ग संघर्ष माना और कांग्रेस के साथ हो लिए।
आज़ादी के तत्काल बाद आज़ाद भारत की सरकार साम्यवादी वर्ग संघर्ष के निशाने पर आ गई और साम्यवादियों ने तेलंगाना में विद्रोह कर दिया जो 1948 तक चलता रहा।
प्रारम्भ से ही भारतीय साम्यवाद की निष्ठाएँ वैदेशिक नेतृत्व के प्रति रही है क्योंकि इसकी नीतियां भारतीय पोलित ब्यूरो से नहीं वरन कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से संचालित रही है।1954 में चीन के साम्यवादी चंगुल में फंस जाने के बाद भारतीय साम्यवादी इस मँझदार में फंस गए कि वह रुसी साम्यवाद से संचालित हो या चीनी माओवाद से। और यह असमंजस भारत में साम्यवादी आंदोलन के विघटन का कारण बना। उनकी परराष्ट्रनिष्ठा चीन के भारत पर 1962 के आक्रमण के समय साबित भी हो गई जब अनेक कामरेड चीनी आक्रमण के समय चीन के साथ खड़े नजर आये और उन्हें "दिल्ली दूर-बीजिंग पास" नज़र आया।
ज्यों ज्यों देश में संघ का प्रभाव बढ़ता गया त्यों त्यों साम्यवादियों ने अपने वर्ग संघर्ष की दुनाली संघियों की और घुमा दी।खासकर केरल,पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में साम्यवादी गुरिल्ले संघ के अनेक स्वयंसेवकों की जान ले चुके है।
9 फरवरी 2016 के JNU विद्रोह ने यह भी साबित कर दिया कि भारत में साम्यवाद आज " आतंकवाद की बौद्धिक संतान" के रूप में जवान हो चुका है। क्योंकि भारत में आतंक के समस्त रूपों यथा- माओवाद पाकिस्तानी आतंकवाद, सभी के साथ साम्यवादी संलयन हो चुका है।
आज भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में जबकि आतंकवाद के साथ ही असली वर्ग-संघर्ष है, साम्यवादी कामरेड राष्ट्रवाद के प्रति वर्ग-संघर्ष कर रहे है। यह स्वाभाविक ही है क्योंकि राष्ट्र और संस्कृति राष्ट्रवाद के अंगभूत घटक है जबकि साम्यवादियों के लिए यह अफीम है।

Wednesday, February 17, 2016

आज़ादी...!

कश्मीर मांगे अज़ादी,
केरल मांगे आज़ादी,
बंगाल मांगे आज़ादी..

आखिर इस आज़ादी के क्या मायने है, जो देशद्रोही उमर खालिद और कश्मीरी अलगाववादियों तथा माओवादियों एवम् नक्सल छात्र संगठन DSU के कार्यकर्ताओं के साथ कम्यूनिस्ट पार्टी नेता एवम् JNU छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को चाहिए..?
    दर असल पूरे राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भारत का कम्युनिस्ट आंदोलन दिशाभ्रम का शिकार रहा।दरअसल वह भारत के बजाय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के ज्यादा करीब रहा और यही कारण रहा कि कम्युनिस्ट भारतीयता के कभी भी करीब नहीं आ पाये। भारतीय संस्कृति उन्हें अफीम ही लगती रही।उन्होंने तमाम नशे किये लेकिन अफीम के नशे से वह हमेशा दूरी बनाये रखे। शशस्त्र क्रांति दबे छुपे हमेशा कम्युनिस्टों के अजेंडे में बनी रही।उनका पोलित ब्यूरो हमेशा ही गोपनीयता में विश्वास रखता रहा और यह भी एक बड़ा कारण बना कि कम्युनिस्ट कभी आम जनता के ज्यादा करीब नहीं आ पाये। 1935 के भारत सरकार अधिनियम में भारत में संघ शाशन की कल्पना की गई।भारतीय स्वतंत्रता के नेताओं ने आज़ाद भारत की कल्पना "Union of States" के रूप में की और संविधान में भी भारत का यही स्वरूप स्वीकार किया गया है। लेकिन कम्युनिस्ट ऐसा नहीं चाहते थे। उन्होंने कैबिनेट मिशन 1946 के सकमक्ष भी भारत को " Fedration of Independet States" बनाने का प्रस्ताव दिया था अर्थात कम्युनिस्ट प्रान्तों की आज़ादी के पक्षधर थे और वह संयुक्त राज्यो के संघ के बजाय भारत को स्वतंत्र राज्यों का एक ढीला ढाला संघ बनाना चाहते थे जैसा कि आज का सोवियत फेडरेशन है जैमे शामिल रूस, कज़ाकस्तान आदि स्वतन्त्र देश है।
कम्युनिस्टों ने 1947 में भी यह स्वीकार नहीं किया कि देश को आज़ादी मिल गई है वरन उन्होंने तेलंगाना में आज़ाद भारत सरकार के खिलाफ 1948 में शशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया।

Monday, January 18, 2016

सडविंद्र

कोख मेरी सूनी रह जाती,
दर्द बांझपन का सह जाती..
न दूध मेरा होता शर्मिंदा.
पैदा न तू जो जिंदा होता..

Tuesday, January 12, 2016

तेरी मुहब्बत में खाक हो जाऊँ..

देश मेरे,तेरी मुहब्बत में,गर मैं खाक हो जाऊ,
बिना काशी बिना काबा गए ही पाक हो जाऊँ..
चाहत जन्नत की न मुझे,न तख्तोंताज ही चाहूँ..
तेरी खातिर दोजख पर, मैं कुरबाँ लाख हो जाऊ..
बिना मंदिर,बिना मस्ज़िद गए ही पाक हो जाऊँ...
तू ही नबी मेरा,मेरा भगवान् भी तूही
राहे-क़ुरबानी में,
भगत बन जाऊं,कभी अशफाक हो जाऊँ..
बिना तीरथ,बिना कोई हज़ किये ही पाक हो जाऊँ..
मुझे जिन्दा जला देना या सूली चढ़ा देना..
शाने-वतन में गर, कभी गुस्ताख हो जाऊँ..
बिना रोजे,बिना उपवास, किए ही पाक हो जाऊँ..
# पठानकोट शहीदों को समर्पित
                         @सुनील सत्यम

अल्पसंख्यक कौन ?

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार जिस समुदाय की जनसँख्या कुल जनसँख्या का 3% या उससे कम हो उसे अल्पसंख्यक समुदाय माना जाना चाहिए।भारत में 3% जनसंख्या सिर्फ सिख,जैन,बौद्ध एवम् ईसाईयों की है।इस लिहाज से देश में सिर्फ यही समुदाय अल्पसंख्यक है।मुस्लिमों की जनसंख्या देश की कुल आबादी के लगभग 15% से अधिक है।इसलिए मुस्लिम समुदाय वास्तव में अल्पसंख्यक की श्रेणी में नहीं आता है!
     लेकिन देश में राजनितिक कारणों से मुस्लिम समुदाय को भी अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है।
वास्तव में भारतवर्ष के आकार को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर किसी समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा दे देना न्यायोचित नहीं है क्योंकि हर प्रदेश,हर जनपद और यहाँ तक कि ब्लाक एवं ग्राम स्तर तक समुदायों की जनसंख्या का वितरण एक जैसा नहीं है। विभिन्न समुदायों का विभिन्न क्षेत्रों में वितरण का पैटर्न एक जैसा नहीं है।इसलिए देश में विभिन्न समुदायों को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा न देकर क्षेत्रीय स्तर पर ही यह दर्जा दिया जाना चाहिए ताकि अल्पसंख्यकों को विकास की विभिन्न योजनाओं का वास्तविक लाभ मिल सके।उदाहरण के लिए जम्मू कश्मीर एवं नागालैंड जैसे प्रदेशों में हिन्दू अल्पसंख्यक है।देश के कई जनपदों जैसे उत्तर प्रदेश के रामपुर एवम् पश्चिमी बंगाल के माल्दा आदि जिलों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं।
       संपूर्ण भारतवर्ष में यही स्थिति है।अतः यह न्यायोचित होगा कि प्रदेश,जनपद एवम् ब्लाक स्तर पर विभिन्न समुदायों की जनसंख्या के हिसाब से अल्पसंख्यक दर्जा देने की शुरुआत होनी चाहिए। तभी हम सभी अल्पसंख्यकों को न्याय दे सकेंगे।
# सुनील सत्यम

Monday, January 4, 2016

सम-विषम के आगे भी रास्ता है..

दिल्ली आजकल मदारिगिरि के रास्ते पर है।मुख्यमंत्री केजरीवाल को किसी ने समझा दिया कि समविषम का मन्त्र उन्हें जनता का रहनुमा बना देगा और दिल्ली की आबोहवा को खुशनुमा।तपाक से बिना किसी दूरदर्शी नीति के दिल्ली की सड़को पर दौड़ने वाले वाहनों को समविषम वाहन संख्या की बेड़ी में जकड़ दिया गया।इस नियम के अनुसार दिल्ली की सड़कों पर सम दिनांक को सम संख्या की और विषम दिनांक को विषम संख्या की गाड़ियां ही सड़क पर दौड़ पाएंगी..
समविषम का विचार बुरा नहीं है।यह नया भी नहीं है क्योंकि दिल्ली में बढ़ते पर्यावरण प्रदुषण के चलते वर्ष 2000 से ही यह चर्चा में रहा है।हाँ इस पर निर्णय लेने का साहस तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित नहीं दिखा पाई।इस मायने में केजरीवाल की सराहना करनी होगी कि उन्होंने यह साहसिक कदम उठाया।
दिल्ली एवम् मुम्बई,कोलकाता तथा चेन्नई जैसे अन्य महानगरों में भी पर्यावरणीय प्रदूषण मर्मान्तक होता जा रहा है।भारत के अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरुरी है कि इस पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जाये।निसंदेह इन महानगरों की दुर्दशा के लिए यातायात के इलेक्ट्रॉनिक वाहन ही जिम्मेदार हैं।समविषम का फॉर्मूला महानगरों में वायु एवम् ध्वनि प्रदूषण रोकने का एक कारगर कदम तो है लेकिन एकमात्र करक नही है। इसके लिए हमें अन्य प्रभावी कदम भी उठाने होंगे ताकि महानगरो  में वाहनों की बढ़ती संख्या पर अंकुश लगाया जा सके।कुछ अन्य प्रभावी कदम है जिनके द्वारा दिल्ली जैसे महानगरों में वायु,ध्वनि और जल प्रदूषण पर प्रभावी अंकुश लगा सकते हैं। ये कदम हैं:-
* महानगरों में वाहन खरीदने वाले व्यक्तियों के पास स्वयं के पार्किंग स्थल होने की अनिवार्यता लागू की जाये।जिन लोगों के पास अपने घर में वाहन पार्क करने की जगह हो सिर्फ वही गाड़ी खरीद सके ऐसी व्यवस्था लागू करनी चाहिए।गाड़ी खरीदते समय अन्य जरूरी दस्तावेजों के साथ पार्किंग स्पेस प्रूफ भी अनिवार्य किया जाये।
दिल्ली जैसे महानगरों में जिन लोगों के पास चुपहिया वाहन है उनमे से 90% लोगों के पास अपना स्वयं का पार्किंग स्पेस नहीं है।ये लोग जब अपने घर पर होते है तो गाड़ियां सरकारी सड़कों अथवा गलियों में पार्क करते हैं।
# सरकारी सड़कों,गलियों और स्थानों पर गाड़ी पार्क करने के लिए मासिक पार्किंग चार्ज वसूल किया जाना चाहिए।MCD के पार्किंग स्थलों पर भी पार्किंग चार्ज में बढ़ोतरी की जानी चाहिए।
#कुछ खास एवम् भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जैसे कनॉट प्लेस,खान मार्किट,पहाड़गंज आदि में 'भीड़ शुल्क congestion charge' लागू करना चाहिए।
# SUV के स्थान पर स्थानीय लोगों के लिए ऑल्टो एवम् नैनो वर्जन जैसी छोटी गाड़ियों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
# इ-साइकिल (e-cycle)को प्रोत्साहन देना चाहिए।
#छात्रों के लिए मोटरसायकल एवम् कार के स्थान पर e-cycle की अनिवार्यता लागू हो। स्कूल कालेजों में छात्रों के मोटरसायकल एवम् कार लाने पर रोक लगाकर इ-साइकिल को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
# 20 किमी से ऑफिस आने वाले कर्मचारियों,अधिकारीयों के लिए भी इ-साइकिल की अनिवार्यता हो।
#दिल्ली में यमुना सफाई के लिए यमुना जे दोनों किनारों पर पाइप-कैनाल बनाकर उसमे मलजल डाला जाये जिसे निश्चित स्थान पर शुद्ध किये जाने हेतू प्लांट लगाये जाये।इसप्रकार शुध्द पानी को ही यमुना में डाला जाए।कोई भी सीवेज पाइप लाइन सीधे यमुना में न डाली जाये।
उपरोक्त उपायों द्वारा महानगरों के शुद्धिकरण के प्रभावी उपाय किए जा सकते है।
"अब स्वेच्छा नहीं, शक्ति ही उपाय है।"

# सुनील सत्यम

Wednesday, May 13, 2015

सम्बन्धों की कसौटी-2

मैंने जवाब दिया " तुम्हें"
यदि अभय सिर्फ मेरे मन मे उसके प्रति क्या ही ? यह जानना चाहता था तो उसका जवाब उस मिल जाना चाहिए था। लेकिन मेरा जवाब सुनने के बाद शायद उसका साहस बढ़ गया था या फिर उसे लगा की मै शायद हवा मे ही पिंकी के चुनाव लड़ने की बात कर रहा था।
"भाई साहब असल मे मेरे समर्थक चाहते है कि मै चुनाव लड़ूँ। उनका कहना है कि मै राजनीति करता हूँ तो चुनाव भी मुझे ही लड़ना चाहिए। लोग कह रहे है कि आप लोग तो सहारनपुर मे रहते हैं,और वैसे भी 2010 वाले चुनाव मे तेजपाल गुर्जर जिला पंचायत चुनाव लड़े थे। उन्हे गाँव से 2900 वोट पड़े थे फिर भी चुनाव नहीं जीत पाये, पिंकी भाभी के साथ तो ऐसी कोई बात नहीं है, तेजपाल गुर्जर ने बिजली घर के लिए जमीन देकर गाँव पर अहसान किया था,उसके बाद ही उसे 2900 वोट मिले और चुनाव हर गए।" अभी अब नेता की भांति मुझे चुनावी समीकरण समझाने लगे थे।
मुझे चुनावी समीकरण मत समझाओ अभय, वो मै तुमसे ज्यादा जानता हूँ। तुम्हारे सवाल का जवाब मैंने दे दिया था लेकिन अब तुम राजनीति कर रहे हो। जितनी तुम्हारी अब तक की राजनीति है उससे ज्यादा मैंने छात्र राजनीति की है। असली समीकरण यह नहीं है जो तुम मुझे समझा रहे हो।" मैंने कहा, अब मै समझ रहा था कि अभय सिर्फ राजनीति कर रहा था।
" मै पिछले तीन वर्षों से इस चुनाव के बारे मे सोच रहा हूँ , तुम्हारे और सभी मित्रों के सामने चर्चा करता रहा हूँ लेकिन तुमने एक बार भी मेरे सामने कभी यह चुनाव लड़ने कि इच्छा तक जाहिर नहीं की, अब अचानक यह चुनाव तुम्हारे लिए इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गया है ? कल तक तुम कैराना से विधान सभा का टिकट मांग रहे थे , आज जिला पंचायत ! तुम्हारा कोई राजनीतिक एजेंडा भी है या नहीं? मैंने एक साथ कई बाते कह डाली , अभय अगर मगर की स्थिति मे था।
" एक बड़े भाई की हैसियत सी अगर कहूँ तो तुम्हें यह चुनाव नहीं लड़ना चाहिए,क्योंकि यह चुनाव लड़कर यदि तुम हार गए तो तुम्हारी राजनीति यहीं खत्म हो जाएगी, जिंदगी मे कभी बड़े चुनाव की सोच भी नहीं पाओगे। और यदि तुम जीत भी गए तो बिक जाओगे ,फिर भी तुम राजनीतिक रूप से खत्म हो जाओगे। " यदि एक नेता की दृष्टि से कहूँ तो तुम्हें यह चुनाव लड़ना चाहिए ताकि तुम यहीं खत्म हो जाओ ! ताकि भविष्य मे हमारी तुम्हारी कोई प्रतिद्वंदीता ही न रहे ! लेकिन तुम्हें इस समय मेरा कोई सुझाव ठीक लगेगा नहीं क्योंकि तुमने मन बना लिया है कि तुम्हें हर हाल मे चुनाव लड़ना है।" मैंने कहा
"ठीक है यदि तुम्हें चुनाव लड़ना ही है तो अपनी तैयारी जारी रखो,हम भी जनसंपर्क जारी रखते है , तुम भी रखो, चुनाव मे अभी काफी समय है।" अब मैंने मन मे ठान लिया था कि अभय का राजनीतिक रूप से खत्म हो जाना ही ठीक है।
अभय मेरे साथ इसलिए था कि उसी इस बीच मुझसे अपने स्वार्थ पूरे करने थे। उसके मन मे था कि जिला पंचायत चुनाव मे अभी काफी समय है, इसलिए अभी मौन रहा जाए या अनमने ढंग से हाँ कहा जाए, जब चुनाव के लिए पर्चे दाखिल होंगे तब वह हाथ-पैर जोड़कर हमे चुनाव न लड़ने के लिए मना लेगा। लेकिन अभय कि यह रणनीति समय से पहले ही इसलिए असफल हो गई क्योंकि उसने कभी सपने मे भी यह नहीं सोचा होगा कि पिंकी के चुनाव के लिए एक वर्ष पहले से ही तैयारी शुरू कर दी जाएगी।
          "अभी चुनाव मे काफी समय है आप अपनी तैयारी करे, हम अपनी करते है, जब चुनाव आएगा तब देखा जाएगा, अभी पोस्टर लगवा देता हूँ," यह कहकर मैंने अभय को संकेत दे दिया की वह यदि चुनाव लड़ना चाहता है तो अपनी तैयारी करे, हमारी तरफ से उसे कोई हरी झंडी नहीं है।"
        अगले दिन मै सहारनपुर आ गया, पिताजी ने पोस्टर लगाने का एक रुपया प्रति पोस्टर के हिसाब से ठेका दे दिया। पूरे वार्ड मे पोस्टर लगते ही चर्चा शुरू हो गई कि पिंकी पँवार सत्यम जिला पंचायत का चुनाव लड़ रही है। इस चर्चा ने अभय को असहज कर दिया और उसने लोगों के बीच चर्चाओं मे अपना प्रचार शुरू कर दिया कि मै चुनाव लड़ूँगा कोई पिंकी शिंकी नहीं। पोस्टर लाग्ने के बाद कि चर्चाओं के उपरांत अभय ने खुद ही मुझसे और मेरे परिवार से दूरी बनानी शुरू कर दी। घर आना जाना बंद कर दिया, पिताजी के सामने मैंने यह चर्चा नहीं की कि अभय खुद चुनाव लड़ना चाह रहा है। पिताजी को किसी अन्य श्रौत से इस बारे मे जानकारी मिली तो उन्हे अत्यंत पीड़ा हुई, बिब्बी ने उस दिन खाना नहीं खाया जिस दिन उन्हे पता चला कि अभय खुद चुनाव लड़ना चाहता है दुख उसके चुनवा लड़ने को लेकर नहीं था बल्कि उन्हे सदमा इस बात से लगा कि अभय से पूछने के बाद पोस्टर छपवाए गए फिर भी उसने ऐसा क्यो किया कि वह अब खुद चुनाव लड़ना चाहता है?
अभय के विद्रोह का मूल कारण !
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 अभय के हमारे खिलाफ विद्रोह का मूल कारण मुझे समझ मे आता है। दर असल इस विद्रोह के पीछे मेरे द्वारा जावेद तोमर से चुनाव के लिए समर्थन मांगने हेतु किया गया फोन था। मैंने दिसंबर 2014 मे जावेद तोमर को फोन किया कि मेरी पत्नी चुनाव लड़ रही है और मैंने जावेद को समर्थन मांगने के लिए फोन किया है। जावेद ने एक साढ़े हुए नेता कि भांति मुझसे बात कि और कहा कि अभी चुनाव मे बहुत समय है अभी से कुछ कहना मुश्किल है।" मैंने कहा कि " लोकतन्त्र मुझे अधिकार देता है कि मै हर नागरिक से समर्थन मांगू, इसी तरह हर नागरिक को अधिकार है कि वह मुझे समर्थन दे या न दे। फिर भी जावेद भाई मैंने आपके सामने अपनी बात कहा दी है यदि कोई भी संभावना होगी तो आप इस पर गौर जरूर करना।"
 जावेद से हुई वार्ता के बारे मे पिताजी ने बिना किसी लग लपेट के, अभय के सामने चर्चा कर दी। बस इसी बात ने अभय को मेरे खिलाफ ला खड़ा कर दिया। उसनेइस विषय मे मेरे सामने अपनी नाराजगी भी प्रकट कर दी थी और मैंने उसके जवाब मे कहा भी था कि किसी व्यक्ति से समर्थन मांगने का अर्थ यह नहीं कि मै किसी अन्य के खिलाफ हो गया हूँ। मैंने उसे यह भी समझाया कि जावेद से न तो मेरी कोई दुश्मनी है और न ही हम एक दूसरे के कभी समर्थक या खिलाफ ही रहे है। चुनाव मे तो सबका सहयोग चाहिए।" मैंने यह भी कहा कि " जावेद से तुम्हारी दुश्मनी है, मेरी तो नहीं ! मेरे लिए यह संभव नहीं है कि मै अपने हर दोस्त के दोस्त को अपना दोस्त और हर दुश्मन को निजी दुश्मन मानूँ ! बल्कि मै तो तटस्थ रिश्तों मे विश्वाश करता हूँ ! मै न तो किसी के पेट मे रहने मे विश्वास करता हूँ और न ही किसी कि आंखो मे खटकने मे "
लेकिन अभय न तो इतने बड़े दिला वाला निकला कि मेरी बात को समझ सके और न ही उसने एक राजनेता के गुणों का ही परिचय दिया, बल्कि उसने छोटी मानसिकता वाले एक वार्ड सभासद जैसा प्रदर्शन किया जिसे एक अच्छी बात का सिर्फ इसलिए विरोध करना है कि उसका श्रेय किसी और को न मिल जाए !
          इस घटना के बाद अभय असुरक्षा की भावना का शिकार हो गया उसे यह लगने लगा कि जिला पंचायत चुनाव उसे खुद लड़ना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि उसकी राजनीति ही चौपट हो जाए ! लेकिन अभय की सोच गलत थी। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह था कि मैंने अभय को शामली भाजयुमों का जिलाध्यक्ष बनवाया था।
अभय को शामली भाजपा मे स्थापित करने कि रणनीति शामली जिला बनने के तुरंत बाद ही बनानी मैंने शुरू कर दी थी। इसकी शुरुवात मैंने रुपेन्द्र सैनी से बात करके कि थी। रुपेन्द्र सैनी सिसौली के रहने वाले है और संघ नेता श्री जयपाल सिंह जी के पुत्र है, मेरे जूनियर और पक्के मित्र है, मैंने उनसे बात करके भाजयुमों मुजफ्फरनगर के जिला उपाध्यक्ष पद पर अभय का मनोनयन करवाया था, ताकि शामली मे उसे जिला अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार के रूप मे स्थापित किया जा सके ।इस रणनीति को आगे बढ़ते हुए मैंने बाबू हुकुम सिंह जी से अपने छोटे भाई के रूप मे अभय का मुजफ्फरनगर मे परिचय करवाया था। 
 

Wednesday, March 18, 2015

किसान को किसान बनाकर क्यों रखना चाहते हैं सब ?

अन्नदाता, देवता, आदि न जाने कितने विशेषण किसानों को आज तक दिए गए है.किसान की तारीफ़ के कसीदे अन्य किसी भी वर्ग से ज्यादा पढ़े गए हैं इस देश में.
     संसद के अन्दर भी किसान को अन्नदाता और भाग्यविधाता न जाने क्या क्या तारीफ़ मिली है.
      मै खुद एक किसान का बेटा हूँ और खेती-किसानी के दुःख दर्द को खूब समझता हूँ. मेरी समझ में आज तक यह
नही आया कि आखिर क्यों किसान को सिर्फ किसान बनाकर रखने की सोची समझी साजिश देश में रची जाती रही है.
    देश के अर्थशास्त्री अच्छी प्रकार जानते है कि देश में सार्वाधिक प्रच्छन्न बेरोजगारी कृषि क्षेत्र में है, कृषि क्षेत्र सदा से ही श्रम-आधिक्य की समस्या से झूझता रहा है जिसे किसी ने भी कभी समस्या के तौर पर प्रस्तुत नही किया. आज देश में प्रतिव्यक्ति भूमि उपलब्धता की जो स्थिति है कृषि क्षेत्र में उसकी तुलना में कहीं अधिक या कहिये कि कल्पनातीत श्रम लगा हुआ है. किसी ने इस श्रम-अधिक्य का प्रबंध करने का आजादी के लगभग 67 वर्षो में कोई प्रयास नहीं किया है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के
नेतृत्व में जरुर कौशल विकास एक मुद्दा बना है..लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि क्या कौशल विकास एक आन्दोलन बन पायेगा ताकि कृषि में खपे हुए श्रमाधिक्य का कौशल विकास करके उसको किसानी के दलदल से निकाला जा सके ! किसानी और गरीबी भारत में एक ही समस्या (सिक्के) के दो पहलू है.
 यदि मै कहूँ कि " देश के अधिकांस किसान गरीब है ,लेकिन सभी गरीब किसान नही हैं" तो यह गलत नहीं होगा. जो किसान कथित रूप से अमीर है वह सिर्फ अपनी आसपास की आबादी से ही तुलनात्मक रूप से अधिक समृद्ध है न कि किसी शहरी अमीर के समकक्ष ! उपर से गरीबी रेखा देश के गरीब को मुँह पर करारा तमाचा है.जितने रुपये एक अमीर किसी रेस्तरां में खाना खाकर झूठन में छोड़ता है और बैरा को टिप देता है उतने में देश के निति नियंता उम्मीद करते है कि प्रत्येक भारतीय अमीरी रेखा के ऊपर आ जाये..यह आम भारतीय का मजाक नहीं तो क्या है..काबिले तारीफ़ यह है कि गरीबी रेखा के विषय में सभी राजनितिक दलों में कमाल की एकता है..
         "जब किसानी में गुजारा नही,आराम नही,सम्मान नही,भरपेट भोजन नही, बच्चों की उच्च एवं श्रेष्ठ शिक्षा की व्यवस्था नही तो मुझे या मेरे बच्चों को किसान क्यों होना चाहिए ?" यह सवाल आज प्रत्येक भारतीय किसान को खुद से पूछना चाहिए! किसानी से सिर्फ "भावनात्मक मूर्ख" बनकर चिपके रहना तो और भी बड़ी मूर्खता होगी.
         देश के पास औद्योगिक नीति,वाणिज्य नीति, आधारभूत सुविधा नीति, पर्यावरण नीति आदि सब है.लेकिन किसान नीति के नामपर सिर्फ चार बेवकूफी भरी पंक्तिया है--- कृषि विकास दर का 4% वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य (परन्तु कैसे ? कुछ दिशा नहीं) आदि ।
देश में कृषि उत्पादकता चिंताजनक रूप से काफी कम है.देश की जनसँख्या का लगभग 52% हिस्सा कृषि कार्यों में लगा है जिसका देश के कुल उत्पादन में 15% से भी कम हिस्सा है . फिर सवाल यह कि सालभर हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी मात्र इतने उत्पादन के लिए आखिर 52% लोग अपना शरीर और दिमाग खेती में क्यों खपाए?
आंकड़े देखें तो स्थिति और भी अधिक दयनीय है..
कृषि कार्यों में लगी जनसँख्या (सम्पूर्ण जनसँख्या का  52%) का देश के सकल घरेलू उत्पाद में कुल योगदान 2012-13 में कुल 14.1% रहा है जबकि उद्योग और सेवा क्षेत्र में लगी सेष 48% जनसंख्या का योगदन 85.9% .
जो किसान नहीं उन सब की स्थित आज किसानों से कहीं ज्यादा बेहतर है.

शेष अगले अंक में !
@ सुनील सत्यम



Thursday, March 12, 2015

कौन समझता है किसान का दर्द ?

किसान सिर्फ एक मुद्दा है चुनाव के दौरान कुछ भोले और अनपढ़ लोगों को चिकनी चुपड़ी बाते कहकर उनका वोट हासिल करने का। इस देश मे यह सबसे बड़ा प्रहसन है कि किसान वर्ग से चुनकर संसद और विधान मंडलों मे चुनकर पहुँचने वाले इस वर्ग के लोग भी अपने मुद्दों और दर्द को भूलकर बेगानी तान पर दुंदुभि बजाते है।
1965-66 के दौर से शुरू हुई हरित क्रान्ति ने पंजाब,हरियाणा,पश्चिमी उत्तर प्रदेश,तटीय महाराष्ट्र,आंध्र एवं तटीय तमिलनाडु के क्षेत्रों की तस्वीर बदलकर रख दी। हालांकि इसका एक पश्च-प्रभाव क्षेत्रीय असमानताओं के रूप मे देखने को मिला।
देश के पूर्व राष्ट्रपति महामहिम ए॰पी॰जे॰ अबुल कलाम जी ने द्वितीय हरित क्रान्ति का आह्वान किया था और साथ ही इसके लिए मूलमंत्र भी दिया था लेकिन आज तक उस पर अमल नहीं हो पाया है।
आज देश का किसान दोहरी समस्या से जूझ रहा है- एक तो प्रथम हरित क्रान्ति के क्षेत्रो मे ठहराव की स्थिति और दूसरे अब तक प्रथम हरित क्रान्ति के लाभों से देश के एक बड़े हिस्से के किसानो का वंचित रहना। दोनों समस्याएँ अलग अलग रणनीतिक हल चाहती हैं। प्रथम हरित क्रान्ति का क्षेत्र " किसानो का कब्रिस्तान" बनता जा रहा है। विदर्भ,पंजाब और अब पश्चिम उत्तर प्रदेश किसानो द्वारा आए दिन आत्महत्या की घटनाओं के साक्षी बनते जा रहे है। दरअसल इस क्षेत्र मे कृषि उत्पादन लागते इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है की इसने किसान के लाभ को शून्य या कई मामलो मे ऋणात्मक स्थिति मे पहुंचा दिया है। कृषि आगत लागते कृषि तकनीकी के अध्यतन न हो पाने के कारण बढ़ती जा रही है। कम पढ़ा लिखा होने के कारण किसान नई तकनीकी को अपनाने के लिए तैयार नहीं है, वह कोई जोखिम भी नहीं उठाना चाहता है। कृषि विश्वविध्यालय डिग्री वितरण के केंद्र मात्र बनकर रह गए है। " लैब टु लैंड" कार्यक्रम पूरी तरह विफल रहा है। कृषि विश्वविध्यालयों द्वारा की जाने वाले शौध विश्वविध्यालयों की चहरदीवारी मे ही दम तोड़ रहे है।

Wednesday, July 30, 2014

कंगारू की कहानी

एक जंगल में एक कंगारू रहता था.उसका एक छोटा बच्चा था जिसे वह अपनी पेट में बनी धानी( थैली ) में रखता था. एक दिन जब उन दोनों को भूख लगी तो वह भोजन की तलाश में निकला. वह भोजन खोज ही रहा था कि उसके बच्चे को शैतानी सूझी और वह धीरे से धानी से कब बाहर निकल गया कंगारू को पता ही नही चला.

Saturday, April 26, 2014

इन्द्रप्रस्थ राज्य के विश्वविद्यालय


वर्तमान में इन्द्रप्रस्थ राज्य में निम्नलिखित 18 विश्वविद्यालय कार्यरत है:
     
दिल्ली
1 गुरु गोविन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय
2 दिल्ली विश्वविद्यालय
3 जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
4 डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय
5 दिल्ली प्रोद्योगिक विश्वविद्यालय
6 इंदिरा गांधी नेशनल ओपन विश्वविद्यालय
7 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय
8 दक्षेश विश्वविद्यालय

मेरठ
9 चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय
10 सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रोद्योगिकी        विश्वविद्यालय
11 स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय
12 शोभित विश्वविद्यालय

 गौतमबुद्धनगर (ग्रेटर नॉएडा)
13 गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय
14 शारदा विश्वविद्यालय
15 एमिटी विश्वविद्यालय
16 महामाया प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय

सहारनपुर
17 ग्लोकल विश्वविद्यालय

मुरादाबाद
18 तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय

Tuesday, April 1, 2014

लोकतंत्र के पाए बनेंगे तभी मिलेगी खुशहाली की चारपाई...!

भारत दुनिया का सबसे प्राचीन गणतंत्र है.वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होना अपने आप में आधुनिक सभ्य दुनिया में गर्व से सीना चौड़ा करने के लिए एक बड़ी वजह है हमारे लिए.
   लेकिन इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमारा स्थान कहाँ है , यह हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए. देश के स्वातंत्र्य संघर्ष में हमारा योगदान सर्वविदित है.हम लड़ने में लगे रहे, भारत निर्माण के पहले दिन से हम देश के दुश्मनों के साथ लगातार युद्दरत रहे है.शक,पहलव,हूण,कुषाण,अरब,तुर्क,और मुगलों से लेकर अंग्रेजो तक देश के हर दुश्मन से हमने लोहा लिया,अपनी प्राणाहुति देकर राष्ट्र रक्षा का वृत्त निभाया.सतत संघर्षशील रहने के कारण लडाकुपन और व्यवस्था के विरुद्ध सैद्धांतिक विद्रोह हमारी रगों में खून बनकर दौड़ने लगा है.
देश हमारे पूर्वजों के असंख्य बलिदानों के फलस्वरूप 1947 में आज़ाद हो गया लेकिन हमारी लड़ाकू प्रवृत्ति आज भी यथावत बनी हुई है.आज देश में हमारी अपनी चुनी हुई सरकारे हैं लेकिन सत्ता के विरुद्ध संघर्ष की हमारी प्रवृत्ती आज भी यथावत बनी हुई और इसका घातक परिणाम यह है कि विकास की दौड़ से हमारा समाज आज भी वंचित है.

* समाज को व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता है.
* Motivation जरुरी है. हमें किसी ने motivate नहीं किया.
* हमारे आस-पास के धूर्त लोगो हमारे समाज का मनोबल गिराया.
नकारात्मकता को बढ़ावा दिया गया, उतने पैर पसारो जितनी चादर, कहकर हमारे अन्दर की संभावनाओ को नष्ट कर दिया गया..हमारी जोखिम क्षमता को कभी बढ़ावा नहीं मिला,
कभी किसी ने यह कहकर मनोबल नहीं बढाया कि खुलकर पैर  पसारो, चादर छोटी है तो क्या..बड़ी का इंतजाम कर लेंगे.
* हमारे समाज को चोर कहकर बदनाम किया जाता रहा.बदनाम करने वाले वही लोग थे जिनका स्वयम का अतीत देशद्रोही का रहा है..
देश के दुश्मनों से लड़ने के कारण हम शिक्षा से दूर चले गए.
मै कहता हूँ कि मुझे गर्व है कि मेरे पूर्वज चोर थे, क्योंकि उन्होंने देश के शत्रुओं को लूटा और बाद में उनके चमचो को.
* जो चोर बन सकता है वह ज्यादा होशियार होता है. क और बनने में नोकरी और बिजनेस में कैरियर बनाने से ज्यादा मेहनत करनी पडती है, क्योंकि चोरी भी करनी है और खुद को पुलिस से भी बचाना है  एन्कौन्टर का खतरा हमेशा अलग से..फिर हमें इतनी मेहनत करने की जरूरत क्या है..इससे कम मेहनत में तो SDM बना जा सकता है..
*आज हमारे पास रोल माडल की कमी नहीं है. विजय विधूड़ी,अरविन्द पोसवाल, पूजा अवाना जैसे उदहारण है जिनसे समाज के बच्चे प्रेरणा ले सकते है.

* भारत एक लोकतान्त्रिक देश है.आज हमे शाशन/सत्ता के साथ टकराने की नहीं बल्कि उसमे घुस जाने की जरूरत है,टकराव की आदत अब हमे छोडनी होगी.
अब समय आ गया है कि हम लोकतांत्रिक प्रतिष्ठानों में अपनी भागीदारी/ हिस्सेदारी प्राप्त करने के लिए संघर्ष करे..
* संघर्ष मैदान में नहीं मकान में करना है.यह संघर्ष हमारी युवा पीढ़ी को करना है. उसे मकान में जी जान से पढ़ाई में मेहनत करनी होगी.
* जरूरत अपनी अगली पीढियों को खेती से निकालने की है. एक तो खेत अब रहे नहीं. खेती से ही विकास होना होता तो देश में सबसे अमीर किसान ही होते. इसलिए खेती से बाहर आओ, आय के वैकल्पिक साधन अपनाओ..जो बच्चा जिस लायक है उसे उसी काम में लगाओ, दूकान खुलवाओ, कोई और काम करवाओ लेकिन खेती के भरोसे मत रहने दो.

* लोकतंत्र के चार स्तम्भ माने जाते हैं- कार्यपालिका,न्यायपालिका,विधायिका और प्रेस..
इन चारो में हम कहाँ खड़े है ?
*
हमारे समाज का हर आदमी MP/MLA का ख्वाब पालता है वह भले ही इसके योग्य है या नहीं.समाज जिम्मेदार बने और तय करे कि वास्तव में समाज का नेतृत्व करने लायक वास्तव में कौन है.किसी को MP/MLA बना देने मात्र से वह समाज का नेता नहीं हो जाता है.. जो लोग संसद/विधान सभा में समाज के मुद्दे नहीं उठा सकते/ सवाल नहीं पूछ सकते/क्षेत्र को सरकारी योजनाओ का लाभ नहीं दिला सकते/सरकारी संसाधनों का समाज हित में प्रयोग नहीं करवा सकते उनसे तो अच्छा है किसीअन्य समाज का कोई योग्य व्यक्ति जीत जाए.
* अब तक हमने जिनको समाज का जनप्रतिनिधि बनाया उनके काम का आकलन सडक/खड़ंजे/नाली बनवाने और नलके लगवाने से नहीं किया जा सकता है..यह काम तो एक अंगूठा छाप जनप्रतिनिधि भी करा देगा, नही कराएगा तो निधि वापस हो जायेगी.
*हमे देखना चाहिए कि उन्होंने क्षेत्र में कितने सरकारी कालेज बनवाये,मेडिकल कालेज, विश्वविद्यालय बनवाये? शिक्षा सुविधाओं का विकास कराया, क्षेत्र की समस्याओं से सदन को ठीक से अवगत कराया ? क्षेत्र में कोई बड़ी सरकारी परियोजना प्रारंभ करवाई? सदन में कोई रचनात्मक विधेयक पेश किया?

* हमें कुछ लोगों ने अपने हित साधने के लिए गलत जानकारी दी कि जिनकी विभिन्न राजनितिक दल हमारी अनदेखी करते है..ऐसा करके वे लोग अपनी अयोग्यता
को ही छुपाते है..इस देश में वाजपेयी,गुजराल,देवगौड़ा कितने है? वे प्रधानमंत्री बनते है अपनी नेत्रत्व  क्षमता से,
हमारे लोग वास्तव में उस स्तर के नहीं है इसलिए समाज को गुमराह करते है.

*कार्यपालिका लोकतंत्र का एक स्तम्भ है, इसके अतिरिक्त 3 महत्वपूर्ण स्तम्भ और है..जिन पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया..जबकि इनमे अपनी भागीदारी बढ़ाना कहीं अधिक आसान है..
प्रेस में जाना आसान है- हम उस पर ध्यान केन्द्रित करे..
न्यायपालिका में जाना भी आसान है, उस पर ध्यान केन्द्रित करना होगा.
विधायिका का महत्वपूर्ण अंग सिविल सेवाएं है.इसमें जाना भी बहुत कठिन नहीं है.
मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब हमारे पास लोकतंत्र के ये चार पाए होंगे तो हम इतने योग्य भी होंगे के कार्यपालिका में हम अपना हिस्सा खुद ले लेंगे और देश / प्रदेश में हमारे मंत्री/मुख्यमंत्री/प्रधानमन्त्री भी होंगे..
जसाला परिवार का उदाहरणः हमारे सामने है..न्यायपालिका में उच्च स्थान तक पहुंचे..उनकी बदौलत इस परिवार को कितनी बढ़त है इसका हर कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता है.

इसलिए संकल्प ले कि हम लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों में अपनी हिस्सेदारी बढाने के लिए जी जान से लगेंगे,अपने बच्चो को लगायेंगे.और सत्ता में अपनी भागीदारी लेकर रहेंगे.यही एक रास्ता है..

Friday, March 21, 2014

लिख दो इतिहास-पटल पर !

लिख दो इतिहास-पटल पर,
दीवानों तुम चल कर.
वीर शिवा तुम बनकर,
गहरे नीले नभ पर !

लिख दो तुम अंगड़ाई,
भारत भाग्य लड़ाई.
जयचंदों का पतन लिखो,
गद्दारों की विदाई..
झटक दो पड़ी धूल अकल पर..

लिख दो इतिहास...

सुनील सत्यम

Wednesday, January 23, 2013

मोहरे.


तलाश ही लेते हैं,
शकुनि हर युग में मोहरे.
हर युग में चलेगी,
कपट-क्रीडा और मान-दंड दोहरे.
विदुर न कभी सफल होंगे
.जब तक रहेंगे दुर्योधन छिछोरे.
जारी रहेगी महाभारत,
जब तक न होंगे कृष्णा के दौरें.
१८ दिन लड़ाकुओं का शोर,
बाद में पश्चाताफ के कोहरे
.मोहरे तो मोहरे होते है,
असली दोषी है शकुनि घिनोरे.

Saturday, December 29, 2012

कब होंगे हम इंसान..


वैज्ञानिक कहते है
हम बन्दर, चिम्पैज़ी, गुरिल्ले की
संतान हैं.
वो कहते है ,
कभी हमारी एक पूंछ होती थी.
पूँछ गायब हो गई ..
इन्सान होना एक प्रक्रिया है
यह प्रक्रिया हजारो साल से
 अनवरत जारी है..
हम लगातार कोशिश कर रहे है
 इन्सान बनने की.

हर बार हमारी कोशिश
चढ़ जाती है
हमारी लापरवाही की भेंट.
गलियों में घूमते बेख़ौफ़ भेडियों
ने हर बार हमारी उम्मीदों
पर हाथ साफ़ किया है..
हमारी हर कोशिश
हो जाती है बेमतलब.
हम अपने को आज भी,
 उसी चिम्पैंजी रूप में पाते है.
चारो तरफ कुत्ते, भेडिये,
और खूंखार जानवर..

दूर दूर तक जंगल सुनसान..
आखिर कब होंगे हम इंसान.?
अभी बहुत वक़्त लगेगा..
शायद १००/५००/१००० साल
या उससे भी ज्यादा..
आखिर कब तैयार होगी
 मानवता की बगिया,
कब तक दामिनियां
दरिंदगी की शिकार होंगी..
कब होंगे हम इंसान..
आखिर कब..?

सुनील सत्यम


Tuesday, December 25, 2012

ये मौसम गुलाबी..


यहाँ हर जगह शरदोत्सव,
और ये मौसम गुलाबी..
उधर हड्डियों में गलन  .
और उसकी तकदीर में खराबी.
यहाँ "अंगूरी" की आग,
वहां उसके फूटे भाग..
यहाँ देर तक अलाव होगा,
उसे चले जाना है आज रात ही,
सुबह उसका जलाव होगा..

Sunday, December 23, 2012

लखनवी गुलाबी ठण्ड


लखनवी गुलाबी ठण्ड..
गोमती नगर में हमारा होस्टल.
छुट्टियाँ और मै..
सिर्फ मै और दो चार मित्र
बाकी सब चम्पत..
श्यामलाल की बेड टी,
नाश्ता, खाना..
शाम को बेडमिन्टन कोर्ट
पर पसीना..
ठंडक गुलाबी से हिसाबी होने लगी..
कपडे गीले..चलो अब चाय पीले..
ठंडक गुलाबी नहीं है..

Monday, August 6, 2012

किसानों के लिए मासिक वेतन निर्धारित होना चाहिए.!!

खेत खलिहान और किसान की दशा सुधारने में सरकारी खेती, आमूलचूल परिवर्तन ला सकती है. इससे देश में उत्पादन की गुणवत्ता एवं गुणात्मकता भी बढ़ेगी. किसी फसल का अधिक्य होने पर उसके विनाश से भी बचा जा सकेगा.हर वर्ष देश में खरबों रुपये का खाद्यान्न भण्डारण के आभाव में नष्ट हो जाता है..
इस खेती में सरकार देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार फसल मानचित्र तैयार कराये और देश की आवश्यकता के हिसाब से किसी फसल के उत्पादन के लिए कुल भौगोलिक क्षेत्रफल निर्धारित कर दे.  सरकार देश के किसानो को सब्सिडी के बजाय मुफ्त में बीज-खाद-पानी दे. किसी फसल की क्षेत्र विशेष में प्रचलित उत्पादन दर को मानक मान कर उत्पादन के लिए लक्ष्य निर्धारित किया जाए. उससे अधिक उत्पादन होने पर किसानो के लिए बोनस की भी व्यवस्था होनी चाहिए ताकि किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.
किसान को उसकी भूमि का बाजार की प्रचलित कीमतों पर वार्षिक या मासिक आधार पर किराया दिया जाये. और किसानों के लिए मासिक वेतन निर्धारित होना चाहिए. क्योंकि इस व्यवस्था में किसान को सरकारी कर्मचारी के रूप में रखा जायेगा.
सरकारी खेती में किसान अपने लिए या बाजार के लिए उत्पादन न करके सरकार के लिए उत्पादन करेगा. फसल कटाई के बाद किसानों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार रियायती दरों पर फसल देकर शेष फसल सरकार अपनी आवश्यकताओं के लिए प्राप्त कर ले.
यदि हम इस व्यवस्था को अपना ले तो आत्महत्या के लिए मजबूर किसानों को तो रहत मिलेगी ही साथ में मंदी जैसी आपात स्थितियों से बचा जा सकेगा. किसान एवं ग्रामीण गरीब की दशा भी सुधरेगी..इसके माध्यम से हम भूख के अभिशाप और कुपोषण जैसी स्थितियों से भी बच सकेंगे. यह एक नयी अर्थव्यवस्था की और एक सार्थक कदम भी होगा..
एक प्रकार से यह ग्रामार्थाशास्त्र की शुरुआत होगी. सरकारी खेती का क्रियान्वयन ग्राम पंचायतों के माध्यम से होना चाहिए.  पंचायतों को प्रति वर्ष फसल विशेष के लिए सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य मिले. वेतन, बोनस एवं भूमि का मासिक/वार्षिक किराया भी पंचायतों के द्वारा ही सीधे किसानों को प्रदान किया जाना चाहिए.
                                               
                                                                                                                  कुंवर सुनील सत्यम.


Friday, August 3, 2012

मै बलिदान से नहीं डरता , सरकार मुझे अस्पताल ले जाकर मार देना चाहती है

हम अभी कुछ भूले नहीं हैं. रामदेव वाले आन्दोलन की यादे अभी ताजी है..जब जन आन्दोलन के सामने सरकार लगभग घुटने टेकने वाली थी..या कहे अगर बाबा का आन्दोलन उनके छुपे राजनितिक अजेंडे के लिए नहीं होता..या कहे की वह वन मेन आर्मी शो न होता..या कहे की बाबा अपने प्रवक्ता खुद ही न होते...बहुत सी ऐसी बाते....न कहे तो...

      कुल मिलाकर यदि उस रात कायरो की तरह महिलाओं के वस्त्र पहनकर बाबा रामदेव ने पीठ न दिखाई होती,,वो भागे नहीं होते तो तस्वीर कुछ और होती. उस समय पूरा देश दुखी था..एक आन्दोलन का बुरा अंत हुवा था..देश के चिंतको ने कहा था बाबा आखिर बाबा निकले , वहा आन्दोलन कारी नहीं है और बलिदान की उनकी सामर्थ्य नहीं है..वो डरपोक और कायर निकले..

    टीम अन्ना ने बाबा से सबक लिया और इसने देश के सामने ऐसा ज़ाहिर किया की " हम आज़ादी की दूसरी लड़ाई लड़ रहे है,.." आन्दोलन का अंतिम चरण आते आते अरविन्द केज़ारिवाल इतने अधीर हो गए की अन्ना की जगह लेने के लिए उन्होंने अघोषित रूप से पूरा जोर लगा दिया..खुद को आन्दोलन का बड़ा नेता प्रस्तुत करने में वह सफल भी सिद्ध हुवे.

  अरविन्द I R S है, दूरदृष्टि भी है, वे जानते थे की लोग बाबा की कायरता को भूले नहीं है. इसलिए उन्होंने जुलाई-अगस्त २०१२ के इस आन्दोलन में मंच से जनता की भावनाओं का खूब दोहन किया..और इस काम को अंजाम दिया सरकारी चिकित्सकों की इस राय ने कि अनशन के कारण अरविन्द की हालत बिगड़ रही है अतः उनको हॉस्पिटल में भारती करने कि जरुरत है.." इस बात का अरविन्द ने पूरा फायदा उठाने की कोशिश की और उन्होंने खुद को बलिदानी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की..उन्होंने मंच से जनता को बताया." आज तक जितने भी अनशनकारियों की मौत हुवी है वह अस्पताल जाकर ही हुवी है. और मै बलिदान से नहीं डरता , सरकार मुझे अस्पताल ले जाकर मार देना चाहती है, बलिदान और हत्या में फर्क होता है." इसप्रकार अरविन्द ने बिना किसी बलिदान के जनता को यह सन्देश दे दिया की वह बलिदान के लिए तैयार है..लेकिन सरकार उनकी हत्या करवाने की फ़िराक में है..

   मुझे या मेरे जैसो को ऐतराज़ अरविन्द केज़रिवाल या टीम अन्ना द्वारा राजनितिक पार्टी के गठन को लेकर नहीं है...ऐतराज़ है तो इस बात पर की अपनी राजनितिक महावाकान्क्षाओं की पूर्ति के लिए उन्होंने जनता की भावनाओं का व्यापार किया. अरविन्द और किरण बेदी जैसे पूर्व प्रशाशकों ने यह बिना किसी पूर्व निर्धारित रणनीति के किया हो..इसमें मुझे पूरा संदेह है. इतिहास इस बात का भी गवाह है की जब जब जन आन्दोलनों का नेतृत्व उच्च वर्ग के हाथ में रहा है तब तब उन्होंने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए, आवश्यकता पड़ने पर आंदोलनों को गिरवी रख दिया था. अब रामदेव के पास फिर से हीरो बनने का मौका है...मैदान खाली है और खिलाडी केवल एक--बाबा रामदेव..देखते रहिये..