कश्मीर मांगे अज़ादी,
केरल मांगे आज़ादी,
बंगाल मांगे आज़ादी..
आखिर इस आज़ादी के क्या मायने है, जो देशद्रोही उमर खालिद और कश्मीरी अलगाववादियों तथा माओवादियों एवम् नक्सल छात्र संगठन DSU के कार्यकर्ताओं के साथ कम्यूनिस्ट पार्टी नेता एवम् JNU छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को चाहिए..?
दर असल पूरे राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भारत का कम्युनिस्ट आंदोलन दिशाभ्रम का शिकार रहा।दरअसल वह भारत के बजाय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के ज्यादा करीब रहा और यही कारण रहा कि कम्युनिस्ट भारतीयता के कभी भी करीब नहीं आ पाये। भारतीय संस्कृति उन्हें अफीम ही लगती रही।उन्होंने तमाम नशे किये लेकिन अफीम के नशे से वह हमेशा दूरी बनाये रखे। शशस्त्र क्रांति दबे छुपे हमेशा कम्युनिस्टों के अजेंडे में बनी रही।उनका पोलित ब्यूरो हमेशा ही गोपनीयता में विश्वास रखता रहा और यह भी एक बड़ा कारण बना कि कम्युनिस्ट कभी आम जनता के ज्यादा करीब नहीं आ पाये। 1935 के भारत सरकार अधिनियम में भारत में संघ शाशन की कल्पना की गई।भारतीय स्वतंत्रता के नेताओं ने आज़ाद भारत की कल्पना "Union of States" के रूप में की और संविधान में भी भारत का यही स्वरूप स्वीकार किया गया है। लेकिन कम्युनिस्ट ऐसा नहीं चाहते थे। उन्होंने कैबिनेट मिशन 1946 के सकमक्ष भी भारत को " Fedration of Independet States" बनाने का प्रस्ताव दिया था अर्थात कम्युनिस्ट प्रान्तों की आज़ादी के पक्षधर थे और वह संयुक्त राज्यो के संघ के बजाय भारत को स्वतंत्र राज्यों का एक ढीला ढाला संघ बनाना चाहते थे जैसा कि आज का सोवियत फेडरेशन है जैमे शामिल रूस, कज़ाकस्तान आदि स्वतन्त्र देश है।
कम्युनिस्टों ने 1947 में भी यह स्वीकार नहीं किया कि देश को आज़ादी मिल गई है वरन उन्होंने तेलंगाना में आज़ाद भारत सरकार के खिलाफ 1948 में शशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया।
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