राष्ट्रवाद के साथ साम्यवादी वर्ग-संघर्ष
--------------------------सुनील सत्यम
इसकी शुरुआत से ही साम्यवाद की संजीवनी कथित 'वर्ग-संघर्ष" रहा है यानि साम्यवादियों को स्वयं को जीवित रखने के लिए कोई स्थाई शत्रु चाहिए।संघर्ष में ही शत्रुता भी निहित होती है।इसलिए सुविधा और स्वभावनुसार साम्यवादी शत्रु भी चुन ही लेते हैं।भारत और विश्व साम्यवाद में एक प्रमुख अंतर यह रहा है कि जहाँ 1917 की रुसी क्रांति के समय वैश्विक साम्यवाद ने पूंजीवाद को साम्यवाद ने अपने वर्ग संघर्ष का केंद्र माना वहीँ दूसरी और भारत में खुद मार्क्स के अनुसार वर्ग संघर्ष के लिए कभी परिस्थितियां अनुकूल नहीं रही और यही कारण रहा कि वर्ग संघर्ष के लिए वैश्विक साम्यवाद के विपरीत भारतीय साम्यवादियों को एक स्थायी शत्रु नहीं मिला। इन्होंने समय समय पर वर्ग संघर्ष को भी अलग अलग दिशा में मोड़ दिया। 1934 में ब्रिटिश भारत सरकार ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया तो इन्होंने 1939 में साम्राज्यवाद के प्रति वर्ग संघर्ष माना और कांग्रेस के साथ हो लिए।
आज़ादी के तत्काल बाद आज़ाद भारत की सरकार साम्यवादी वर्ग संघर्ष के निशाने पर आ गई और साम्यवादियों ने तेलंगाना में विद्रोह कर दिया जो 1948 तक चलता रहा।
प्रारम्भ से ही भारतीय साम्यवाद की निष्ठाएँ वैदेशिक नेतृत्व के प्रति रही है क्योंकि इसकी नीतियां भारतीय पोलित ब्यूरो से नहीं वरन कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से संचालित रही है।1954 में चीन के साम्यवादी चंगुल में फंस जाने के बाद भारतीय साम्यवादी इस मँझदार में फंस गए कि वह रुसी साम्यवाद से संचालित हो या चीनी माओवाद से। और यह असमंजस भारत में साम्यवादी आंदोलन के विघटन का कारण बना। उनकी परराष्ट्रनिष्ठा चीन के भारत पर 1962 के आक्रमण के समय साबित भी हो गई जब अनेक कामरेड चीनी आक्रमण के समय चीन के साथ खड़े नजर आये और उन्हें "दिल्ली दूर-बीजिंग पास" नज़र आया।
ज्यों ज्यों देश में संघ का प्रभाव बढ़ता गया त्यों त्यों साम्यवादियों ने अपने वर्ग संघर्ष की दुनाली संघियों की और घुमा दी।खासकर केरल,पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में साम्यवादी गुरिल्ले संघ के अनेक स्वयंसेवकों की जान ले चुके है।
9 फरवरी 2016 के JNU विद्रोह ने यह भी साबित कर दिया कि भारत में साम्यवाद आज " आतंकवाद की बौद्धिक संतान" के रूप में जवान हो चुका है। क्योंकि भारत में आतंक के समस्त रूपों यथा- माओवाद पाकिस्तानी आतंकवाद, सभी के साथ साम्यवादी संलयन हो चुका है।
आज भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में जबकि आतंकवाद के साथ ही असली वर्ग-संघर्ष है, साम्यवादी कामरेड राष्ट्रवाद के प्रति वर्ग-संघर्ष कर रहे है। यह स्वाभाविक ही है क्योंकि राष्ट्र और संस्कृति राष्ट्रवाद के अंगभूत घटक है जबकि साम्यवादियों के लिए यह अफीम है।
Monday, February 29, 2016
राष्ट्रवाद के साथ साम्यवादी वर्ग-संघर्ष
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