बजट आते रहे है और भी आते रहेंगे।वर्ष 2016-2017 का बजट आज़ादी के बाद के भारत में अनोखा है।इसकी तुलना यदि की जा सकती है तो वह आज़ाद भारत का पहला बजट ही हो सकता है जिसमे अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र को महत्व दिया गया था।
एक पेड़ को यदि हम फलते-फूलते देखना चाहते है तो हमें उसकी जड़ों को सीचना होता है न कि शाखाओं और तनों को। अर्थव्यवस्था भी एक पेड़ की भांति है जिसकी जड़ कृषि,तना उधोग और शाखाएं सेवा क्षेत्र है।
देश की सरकारे लोक लुभावने बजट लाती रही हैं।लेकिन अर्थव्यवस्था की जड़ो को सीचने की परवाह किसी ने नहीं की।
वर्ष 2016 के बजट में कृषि,मजदूर और गांव तथा गरीब पर दृष्टिपात किया गया है।यही वर्ग है जिसकी सम्पन्नता पर बाकि गतिविधियां निर्भर करती है।किसान,मजदूर और गरीब लोग अपनी आय का आधे से अधिक बाजार में खरीद करने में लगाते है।इस वर्ग की क्रय क्षमता बढ़ने का अर्थ है छोटे मझोले शहरों के बाजारों में रौनक।जो अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने वाले कारक है।गन्ना भुगतान की समस्या ने छोटे,मझोले शहरों की अर्थव्यवस्था की जान निकाल कर रख दी है।देश का किसान,मजदूर,गरीब यदि खुशहाल नहीं है तो अर्थव्यवस्था का इंजन चोक हो जाना लाजिमी है।आज अर्थव्यवस्था उपभोक्ता उत्पादों के इर्दगिर्द ज्यादा संचालित है।यदि ग्राहक ही नहीं होगा तो धनचक्र शुरू ही नहीं हो सकता।
मेरे जैसे नौकरी पेशा लोगों के लिए बजट जरूर निराश करने वाला है।लेकिन यदि अपने क्षुद्र स्वार्थो के आधार पर ही विश्लेषण किया जाये तो यह राष्ट्रीय हितों की अनदेखी होगी।यदि रेस्टॉरेंट में 500 रुपये खर्च करके मेरी जेब से 0.5% की दर से ₹ 2.5 किसान कल्याण सेस के रूप में देश के विकास को गति देने के लिए चले जाये तो यह प्रलाप का विषय बिलकुल नहीं है।₹ 500 रेस्टोरेंट में खर्च करने वाला आदमी स्वेच्छा से ₹10 या अधिक तो सर्विस बॉय को टिप दे देता है और ₹20 या अधिक की जूठन थाली में छोड़ देता है।ऐसे में देश के अन्नदाता के कल्याण के लिए 0.5% सेस रूपी योगदान बहुत कम है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि अब हम गांव की और निरंतर देखते रहेंगे।
Monday, February 29, 2016
जड़ों को पानी
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment