Thursday, March 12, 2015

कौन समझता है किसान का दर्द ?

किसान सिर्फ एक मुद्दा है चुनाव के दौरान कुछ भोले और अनपढ़ लोगों को चिकनी चुपड़ी बाते कहकर उनका वोट हासिल करने का। इस देश मे यह सबसे बड़ा प्रहसन है कि किसान वर्ग से चुनकर संसद और विधान मंडलों मे चुनकर पहुँचने वाले इस वर्ग के लोग भी अपने मुद्दों और दर्द को भूलकर बेगानी तान पर दुंदुभि बजाते है।
1965-66 के दौर से शुरू हुई हरित क्रान्ति ने पंजाब,हरियाणा,पश्चिमी उत्तर प्रदेश,तटीय महाराष्ट्र,आंध्र एवं तटीय तमिलनाडु के क्षेत्रों की तस्वीर बदलकर रख दी। हालांकि इसका एक पश्च-प्रभाव क्षेत्रीय असमानताओं के रूप मे देखने को मिला।
देश के पूर्व राष्ट्रपति महामहिम ए॰पी॰जे॰ अबुल कलाम जी ने द्वितीय हरित क्रान्ति का आह्वान किया था और साथ ही इसके लिए मूलमंत्र भी दिया था लेकिन आज तक उस पर अमल नहीं हो पाया है।
आज देश का किसान दोहरी समस्या से जूझ रहा है- एक तो प्रथम हरित क्रान्ति के क्षेत्रो मे ठहराव की स्थिति और दूसरे अब तक प्रथम हरित क्रान्ति के लाभों से देश के एक बड़े हिस्से के किसानो का वंचित रहना। दोनों समस्याएँ अलग अलग रणनीतिक हल चाहती हैं। प्रथम हरित क्रान्ति का क्षेत्र " किसानो का कब्रिस्तान" बनता जा रहा है। विदर्भ,पंजाब और अब पश्चिम उत्तर प्रदेश किसानो द्वारा आए दिन आत्महत्या की घटनाओं के साक्षी बनते जा रहे है। दरअसल इस क्षेत्र मे कृषि उत्पादन लागते इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है की इसने किसान के लाभ को शून्य या कई मामलो मे ऋणात्मक स्थिति मे पहुंचा दिया है। कृषि आगत लागते कृषि तकनीकी के अध्यतन न हो पाने के कारण बढ़ती जा रही है। कम पढ़ा लिखा होने के कारण किसान नई तकनीकी को अपनाने के लिए तैयार नहीं है, वह कोई जोखिम भी नहीं उठाना चाहता है। कृषि विश्वविध्यालय डिग्री वितरण के केंद्र मात्र बनकर रह गए है। " लैब टु लैंड" कार्यक्रम पूरी तरह विफल रहा है। कृषि विश्वविध्यालयों द्वारा की जाने वाले शौध विश्वविध्यालयों की चहरदीवारी मे ही दम तोड़ रहे है।

No comments: