Sunday, November 26, 2017

इस्लाम की इस्लाम के खिलाफ जेहाद

इसके प्रारम्भ से आज तक इस्लाम जिहाद के बल पर फला फूला।हमें भारतीय इतिहास में भी ऐसे अनेक दृष्टान्त मिलते है जब अपने राजनीतिक व उपनिवेशिक लाभ के लिए मुस्लिम शासकों/सुधारकों द्वारा जेहाद का नारा दिया गया।
खानवा के युद्ध में वर्ष 1528 में बाबर ने भारतीय राजाओं के खिलाफ जेहाद की घोषणा करके विजयोपरांत"गाजी" की पदवी धारण की।बाद में 19वीं सदी में सैय्यद अहमद रायबरेलवी ने अंग्रेज एवं पंजाब के सिख शासकों के खिलाफ जिहाद छेड़ी।
भारत में इस्लाम का प्रचार:
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शाहजहाँ और औरंगजेब जैसे कट्टर मुगल शासकों की तलवार के बल पर भारत मे धर्मान्तरण की प्रक्रिया बड़ी तेज गति से चली।जिसके परिणामस्वरूप हजारों की संख्या में दलित एवं पिछड़े लोगों ने भय एवं लालच के कारण इस्लाम पन्थ को अपना लिए। इसके अतिरिक्त इस्लामी शासकों के पीछे पीछे सूफी संत इस्लाम पंथ के प्रचार के लिए पहुंचे।सूफियों ने हिन्दू, बौद्ध, ईसाइयत के साथ समन्वय करते हुए उनसे अनेक बातें ग्रहण की।जैसे हिन्दू धर्म से योग,प्राणायाम, कीर्तन-संगीत (समा) जैन धर्म से उपवास, फना आदि ग्रहण करके एक मिश्रित सांस्कृतिक वातावरण तैयार किया।इसी को गंगा जमुनी तहजीब नाम दिया गया।सूफियों ने लालच,फरेब, सेवा, तांत्रिक विद्या, भय आदि अनेक विधियों द्वारा हिंदुओं का इस्लाम में धर्मान्तरण किया। इस धर्मान्तरण को एक विशेषता यह थी कि इस्लाम में परिवर्तित लोगों में धार्मिक कट्टरता के लिए कोई जगह नही थी।सूफियों की दरगाह/ खानकाह श्रद्धा का केंद्र बनकर उभरी जहां सुन्नी एवं शिया मुस्लिमों के साथ साथ हिन्दू भी बड़ी संख्या में आज भी जाते हैं।इन दरगाहों पर जाकर मुस्लिम सजदा करते हैं, मन्नते मांगते हैं, चादर-प्रसाद भी चढ़ाते हैं। यह सब हिन्दू संस्कृति का इस्लाम पर प्रभाव है जो सूफ़ियत के मार्ग से प्रविष्ट हुआ है।सूफी दरगाहों पर संगीत (समा) की महफ़िलें सजती हैं।जिनमें अल्लाह की प्रार्थना के लिए कव्वालियां गाई जाती है।कव्वाली विधा का जनक अमीर खुशरो को माना जाता है।वह चिश्ती सूफी निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।

सल्फी प्रमेय
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सऊदी अरब में 18 वी सदी में अब्दुल वहाब ने एक नई इस्लामी विचारधारा को जन्म दिया।इस विचारधारा ने उन समस्त परिवर्तनों को कुफ्र एवं शिर्क (मूर्ति पूजा) घोषित कर दिया जो इस्लाम में पहले तीन खलीफों के समय के बाद प्रचलित हुई।अब्दुल वहाब ने कुरान एवं हदीश के अलावा इज्मा एवं कयास को भी गैर-इस्लामी एवं दंडनीय घोषित कर दिया।इसका अर्थ था इस्लाम में धार्मिक नवाचारों एवं प्रगतिशीलता के द्वार हमेशा के लिए बंद कर देना।
19 वीं सदी में वहाबियत का आधुनिक एवं अत्यंत रूढ़िवादी एवं अधिक असहिष्णु संस्करण सल्फियत/अहले हदीश के रूप में सामने आया।सल्फियत ने अकलियत को भी गैर-इस्लामी घोषित कर दिया।अर्थात इस्लाम के बारे में क्या,क्यों,कब, कहाँ और कैसे सवाल पूछना भी कुफ्र है।इसकी सजा केवल मौत है।
सल्फी अकलियत को गैर-इस्लामी घोषित करके ही कट्टर मोमिनों को मुजाहिदीन बना सकते हैं।सल्फी की राष्ट्र-राज्य सत्ताओं को गैर-इस्लामी एवं कुफ्र घोषित करके सम्पूर्ण विश्व में केवल "एक खलीफा का शासन" स्थापना की प्रमेय, सऊदी अरब को आतंकवादी विचारधारा सल्फियत में राजनीतिक-धार्मिक निवेश करने को प्रेरित करती है।
सल्फी विचारधारा को सऊदी अरब इस लालच में प्रायोजित कर रहा है कि यदि कभी सल्फी जेहादी दुनिया को दारुल-इस्लाम में बदलकर खलीफा का शासन स्थापित करने में कामयाब हो पाए तो उसे इस्लाम का मूल स्थान होने के कारण स्वाभाविक रूप से खलीफा पद हासिल हो सकता है।
अपनी विचारधारा को आतंक के बल पर प्रसारित करने के लिए सल्फियत ने व्यावसायिक रूप से एक व्यवस्थित जिहाद छेड़ी है।इस जिहाद को तीन इकाइयों के द्वारा संपादित किया जा रहा है।
अलमिशफू ( स्लीपर सेल), नाशित (राजनीतिक कार्यकर्ता) एवं जेहादी ( आत्मघाती दस्ते)

जेहाद किसके खिलाफ ?
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सल्फी प्रमेय के लिए धार्मिक रूप से कट्टर मोमिन तैयार करना जरुरी है।यह तभी सम्भव है जब मुस्लिमों को हर प्रकार से उनकी जड़ों से काटकर उन्हें आम स्थानीय समाज से अलगाव की राह पर लाया जाये।लेकिन यह एक ऐसा मार्ग है जिसने गैर-मुस्लिमों (काफिरों) के साथ किये जाने वाली जेहाद की तोप का मुंह खुद उदारवादी आधुनिक इस्लाम के विरुद्ध मोड़ दिया।सल्फियत के लिए इस्लाम के भीतर ही पर्याप्त रूप से काफ़िर मौजूद हैं।जिनके विरुद्ध जेहाद जरूरी समझा जा रहा है।सूफीवादी, बरेलवी, शिया, अहमदिया, कादियानी उदार किस्म के मुस्लिम है।खुद इज्मा एवं कयास में विश्वास रखने वाला आम मुस्लिम भी सल्फी इस्लाम के लिए काफिर है, जिसके लिए मौत मुकर्रर करना जेहादी के लिए जरूरी है। 24 नवम्बर 2017 को मिश्र के सिनाई प्रायद्वीप में सूफी मस्जिद पर सेल्फियों ने हमला किया ।इस हमले में 235 नमाजी उस समय मारे गए जब वे नमाज पढ़ रहे थे।
यहां दो बातें महत्वपूर्ण एवं बिल्कुल स्पष्ट हैं:
1- सल्फी जेहाद इस्लाम के उदार पंथों जिनमे सूफी भी हैं, के खिलाफ है।
2- इस्लाम खतरे में है और उसे यह खतरा हिंदुओं या ईसाइयों से नही बल्कि खुद इस्लाम से ही है।
असहिष्णुता का अतिवादी संस्करण सल्फियत/वहाबी/अहले हदीश हमेशा "इस्लाम खतरे में" का नारा लगाता रहा है जिसके निहितार्थ अब दुनिया के सामने प्रकट हो रहे हैं।यानि सल्फी इस्लाम मुसलमानों को खतरा दिखाकर अपना कट्टरवादी एजेंडा चलाता रहा है।वह खुद को ,इस्लाम के सबसे घातक शत्रु के रुपवमे तैयार करता रहा है।

इस्लामी देशों में जंग क्यों?
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सल्फी/अहले हदिशी इस्लाम के अनुयायी अपने मदरसों एवं मस्जिदों के पाठ्यक्रम में जहर घोलकर मासूम बच्चों को पिलाते हैं।उनके पाठ्यक्रम का जरूरी अंश है कि " राष्ट्र-राज्य" सरकारें गैर-इस्लामी एवं कुफ्र हैं।पूरी दुनिया मे खलीफा की हुकूमत कायम करनेबके लिए जब भी हमारे पास ताकत होगी तो हम उन गैर-इस्लामी हुकूमतों को उखाड़ फेंकेंगे। इस्लाम बाहुल्य देशों में उन गैर-इस्लामी हुकूमतों को उखाड़कर खलीफा के शासन की स्थापना के लिए जंग जारी है।जिसमें मुस्लिमों द्वारा,मुस्लिमों के लिये, मुस्लिमों के खिलाफ़ जेहाद जारी है। मिश्र में 2011 में मुस्लिम ब्रदरहुड द्वारा ऐसी सरकार को उखाड़ फेंका गया था।जिसके बाद लगातार खून खराबा चालू है।

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