Thursday, November 2, 2017

अल्पसंख्यक


अल्पसंख्यक समुदाय किसी भी देश में कल्याणकारी योजनाओं के लिए एक लक्षित समूह होता है। राष्ट्र की मुख्यधारा से अल्पसंख्यक समुदाय स्वयं को अलग-थलग न समझे इसिलए उनको विकास योजनाओं में लक्षित समूहों में प्रमुखता दी जाती है। भारत गणराज्य ने स्वयं को एक पंथनिरपेक्ष राज्य के रूप में अंगीकृत किया है। इसका केवल और केवल एक ही अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है।  न तो राज्य किसी धर्म विशेष को प्रश्रय देगा और न ही किसी धर्म पर कोई अनुचित प्रतिबन्ध लगाएगा।
हिन्दू भारत का सबसे बड़ा बहुसंख्यक समाज है तो मुस्लिम देश का दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक वर्ग है।देश की कुल जनसंख्या का लगभग 14.5% मुस्लिम है। इन्ड़ोनेशिया के बाद विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी भारत में निवास करती है।संयुक्त राष्ट्र की एक परिभाषा के अनुसार जो वर्ग या समुदाय किसी जनसँख्या समूह का 3% या उससे कम हो,वह अल्पसंख्यक वर्ग होता है।इस परिभाषा को यदि मानक माना जाए तो देश मे बौद्ध,सिख,जैन ,फ़ारसी,शिया,अहमदिया, कादियानी और ईसाई ही अल्पसंख्यक हैं।
  इस्लाम, वैश्विक भ्रातत्ववाद में विश्वास करता है।अतः वैश्विक स्तर पर बहुसंख्यक होने के नाते तो वह किसी भी प्रकार से कहीं अल्पसंख्यक नही है।भारतीय संविधान में धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यक समुदायों को मान्यता दी गई है। इस आधार पर यहाँ मुस्लिम,सिख,इसाई, बौद्ध,पारसी एवं जैन धार्मिक अल्पसंख्यक हैं तो नेपाली,भूटानी,अवधी, कोंकणी, भोजपुरी,डोगरी,गूजरी एवं मैथिलि आदि प्रमुख भाषाई अल्पसंख्यक समुदाय हैं। वैश्विक स्तर पर बहुसंख्यक होते हुए भी मुस्लिम भारत में अल्पसंख्यक हैं और अल्पसंख्यक होते हुए भी हिन्दू यहाँ बहुसंख्यक के रूप में हैं।भारत के अनेक राज्यों एवं विकास के लिए मान्यता प्राप्त अन्य इकाई यथा जिला एवं विकास खण्डों में भी स्थित में अंतर है।2011 की जनगणना के मुताबिक हिन्दू आठ राज्यों लक्ष्यद्वीप (2.5 फीसद), मिजोरम (2.7 फीसद), नगालैंड (8.75 फीसद), मेघालय (11.53 फीसद), जम्मू कश्मीर (28.44 फीसद), अरुणाचल प्रदेश (29 फीसद), मणिपुर (31.39 फीसद), और पंजाब में ( 38.40 फीसद)अल्पसंख्य हैं। जनसँख्या के सन 2011 के इन आंकड़ों के बावजूद हिंदुओं को इन आठ राज्यों में अल्पसंख्यक घोषित नही किया गया है। और इन राज्यों में अल्पसंख्यकों को मिलने वाले लाभ बहुसंख्यक ले रहें हैं।
इन राज्यों मे न तो केन्द्र ने और न ही राज्यो सरकारों ने कानून के मुताबिक हिन्दुओँ को अल्पसंख्यक समुदाय अधिसूचित किया है। इसी कारण से इन राज्यों में हिन्दू संविधान के अनुच्छेद 25 और 30 के तहत अल्पसंख्यक वर्ग को मिलने वाले संवैधानिक लाभ से वंचित हैं।अतः स्पष्ट है कि इसीलिये 1993 की समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित करने की अधिसूचना न सिर्फ भेदभाव वाली बल्कि अतार्किक और संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करने वाली है।

1992 में देश राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 पारित किया गया जो 17 मई 1993 में जम्मू कश्मीर के अतिरिक्त सम्पूर्ण भारत में लागू हुआ। । इस कानून के अनुसार केन्द्र सरकार अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान कर उन्हे अल्पसंख्यक घोषित करेगी । केन्द्र ने कानून की धारा 2(सी) की शक्तियों का प्रयोग करके 23 अक्टूबर 1993 को पांच समुदायों मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक समुदाय घोषित किया। 2014 में इसमें जैन भी शामिल कर दिये गये। लेकिन वोट बैंक राजनीति के कारण 8 राज्यों में अल्पसंख्यक होने के बावजूद हिंदुओं को उन प्रदेशों में अल्पसंख्यक का दर्जा नही दिया गया। बहुसंख्यक होने के बावजूद अल्पसंख्यक योजनाओं का लाभ इन राज्यों में बहुसंख्यक ही ले रहे हैं। यह स्थिति सामाजिक न्याय की अवधारणा के विरुद्ध है।
इसके अतिरिक्त देश के अनेक जिले एवं विकास खंड भी ऐसे हैं, जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। उदहारण के रूप में उत्तरप्रदेश के 75 जिलों में कई जिलों जैसे मुरादाबाद एवं रामपुर आदि में मुस्लिम बहुसंख्यक एवं अन्य धर्मावलंबी जैसे हिन्दू एवं सिख आदि अल्पसंख्यक हैं। भारत में आर्थिक नियोजन में अनेक योजनाएं लागू की गई है। जैसे जनजातीय क्षेत्र विकास योजना एवं पिछड़ा क्षेत्र विकास योजना आदि।किसी भी क्षेत्र को इन योजनाओं का लाभ तभी मिल सकता है जब सम्बंधित क्षेत्र की जनसँख्या का एक निर्धारित प्रतिशत जनजातीय आबादी हो। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में हाल ही तक आंबेडकर ग्राम योजना लागू रही है। जिसका आधार भी योजनान्तर्गत शामिल किये जाने वाले गाँव में अनुसूचित आबादी का जनसँख्या प्रतिशत ही था। भारत में क्योंकि अनेक अल्पसंख्यक वर्ग विभिन्न संख्या में एवं विभिन्न क्षेत्रों में निवास करते है। अतः यदि हमें सही मायनों में अल्पसंख्यक समुदायों को विकास का अमृतपान कराना है तो आर्थिक नियोजन में जिला एवं विकास खंड पर अल्पसंख्य समुदायों की पहचान करके अल्पसंख्यक कल्याण योजनाएं लागू करनी होगी। जब भारत गणराज्य ने किसी भी धर्म को राज्य का धर्म मानने से इनकार किया है तो हम सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों का निर्धारण करके सामजिक न्याय की भावना की अवहेलना नहीं कर सकते हैं। हमने विकास के बहुस्तरीय नियोजन माडल को चुना है। केंद्र एवं राज्यों की अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं का क्रियान्वयन तार्किक आधार पर देश एवं प्रदेश में न्यायोचित तरीके से जनसँख्या के अनुपातिक रूप में चिन्हित किये गये अल्पसंख्यक वर्गों को लाभान्वित किया जाना चाहिए।अल्पसंख्यक पहचान में तार्किकता न होने के कारण इन योजनाओं के दुरुपयोग का एक उदाहरण देखिए। केन्द्र सरकार तकनीकी शिक्षा लेने वाले अल्पसंख्यक छात्रों को 20000 रुपये छात्रवृत्ति देती है। जम्मू कश्मीर में कथित अल्पसंख्यक मुसलमानों की जनसंख्या 68.30% होने के बावजूद फीसद हैं और सरकार 753 में से 717 छात्रवृत्तियां मुस्लिम छात्रों को देती है। क्योंकि वहां किसी भी हिन्दू समुदाय को अल्पसंख्यक नहीं अधिसूचित किया गया है।यह एक अमानवीय अनियमितता है जिसे दुरुस्त किया जाना जरूरी है।
अतः यह आवश्यक है कि अल्पसंख्यक वर्गों की पहचान भी उन्ही स्तरों पर होनी चाहिए। तभी वास्तव में हम सामाजिक न्याय का मार्ग तय कर पाएंगे।

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