Wednesday, November 8, 2017

सिंध:अभिव्यक्ति एवं लोकतंत्र पर हमला

पंजाब,सिंध,गुजरात,मराठा....यह पंक्तियां गाते हुए मैं और आप बड़े हुए है।हमने कभी सोचा नही था कि जब होश संभालेंगे तो हमें पता चलेगा कि सिंध अब भारत का अंग नही है! जो सिंध भौगोलिक रूप से अब हमारा हिस्सा नही है, उसने आज भी सिन्धियत को नही भुलाया है।सिंध का वर्णन हमारे राष्ट्रगान में क्यों है? क्योंकि सिंध,एक संस्कृति है,एक कौम है जो भारत से अलग होकर भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है।
इतिहास विडंबनाओं से भरपूर है।जहां पाकिस्तान एक कौम रहित,संस्कृति एवं राष्ट्रीयता रहित राज्य है वहीं,वहीं सिंध एवं बलूचिस्तान राज्य, रहित राष्ट्रीयता है।राष्ट्रीयता और कौम कभी मरती नही हैं। इसके अनेक उदाहरणों का इतिहास साक्षी रहा है।इजरायल वर्षों तक एक राज्य रहित राष्ट्रीयता के रूप में दुनियाभर में भटकता रहा। जिसने यहूदी राष्ट्रीयता और कौम के सतत संघर्ष से अंततः अपना आकार ग्रहण कर ही लिया।1948 में इजरायल एक सम्प्रभु राज्य के रूप में अस्तित्व में आ ही गया।
सिंध की दुश्वारियों की दास्तान 1937 से शुरू होती है।1937 तक सिंध,बम्बई राज्य का हिस्सा था।भारत सरकार अधिनियम 1935 के अंतर्गत सिंध को 1937 में बम्बई से अलग कर दिया।यह कांग्रेस की ऐसी ऐतिहासिक भूल है जिसने 1937 में ही सिंध की नियति को तय कर दिया।संयुक्त बम्बई हिन्दू बाहुल्य राज्य था लेकिन सिंध के अलग राज्य बनने के बाद सिंध में मुस्लिमों की बहुलता हो गई। माउंटबेटन की 3 जून योजना में भारत या पाकिस्तान के साथ रहने का चुनाव करने के लिए सिंध की विधानसभा को निर्णय लेना था।सिंध विधानसभा में मुस्लिम सदस्यों का बहुमत था जिन्होंने पाकिस्तान में मिलने का निर्णय लिया। 1945 में हुए क्षेत्रीय निर्वाचन के परिणाम जिन्हाह के लिए दुखद थे,वह सिंध में लीग की सरकार बनाने में खुद को असहाय पा रहे थे।जबकि जनवरी 1946 में पटेल ने कराची में यह काम लगभग कर दिखाया था। 1945 में किए गए क्षेत्रीय निर्वाचन के परिणाम पटेल के लिए बहुत प्रोत्साहक थे। जिन्हाह सिन्धु विधानमंडल में अपना बहुमत सिद्ध करने में असमर्थ रहे थे। 60 सदस्यों के सदन में लीग ने 27 एवं कांग्रेस ने 22 सीटें जीती थी। शेष 11 सीटों के उपयोग से पटेल को एक गैर लीग मंत्रिमंडल बनाने का अवसर मिल गया। वह लगभग जीत ही गए थे। ऐसे महत्वपूर्ण समय में मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर जिन्नाह के मसीहा के रूप में आकर पटेल के काम में अड़ंगा लगाया। शिमला समझौते में वैवल की तरह परिणामों की परवाह किए बिना, पटेल के राजनीतिक सुयोजन को रद्द करके आजाद  ने पाकिस्तान निर्माण का मार्ग साफ कर दिया।(सरदार... बी कृष्णा,पृष्ठ 189)
सिंध के  एक नामी राजनीतिज्ञ अल्लाह बख्श ने जिन्नाह के साथ एक सौदा तय करने का प्लान बनाया था। पटेल ने मुंबई से डोर खींची तो सभी है देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि "अल्लाह बख्श ने समझौते से अपने हाथ खींच लिए"।  "हैरान परेशान" जिन्नाह के अनुमान से "वह कांग्रेस पार्टी के हाथों में था"। स्टैनली वॉलपोर्ट का कहना है कि "जिन्नाह के लिए इससे कड़वी दवाई नहीं हो सकती थी" उन्होंने सिंध को स्वतंत्र देखने के लिए बहुत देर तक बहुत कड़ी मेहनत की थी। सरदार ने बिल्कुल उसी समय जिन्ना के होठों के बिल्कुल करीब से लड्डू छीन लिया, जबकि वह उसकी मिठास का मजा लेने ही वाले थे। ( स्टैनली वॉलपर्ट, जिन्नाह ऑफ पाकिस्तान, पृष्ठ 164)
सिंध के दो अन्य महत्वपूर्ण मुसलमान नेता थे- जी एम सय्यद और गुलाम हुसैन हिदायतुल्ला, दोनों जिन्ना से ज्यादा पटेल के करीब थे। जिन्ना के विद्रोह में सय्यद ने लीग हाई कमांड के हस्तक्षेप बिना "सिंधी पाकिस्तान के निर्माण के लिए स्वनिर्धारण की मांग की थी।" (आयशा जलाल  द सोल स्पोक्समेन, जिन्ना, द मुस्लिम लीग एंड डिमांड फॉर पाकिस्तान, पृष्ठ 165)
हिदायतुल्ला भी जिन्ना की पहुंच से बाहर थे। जब जिन्हाह उनके घर मेहमान बनकर रहने के लिए आए तो वह घर से किसी दौरे के बहाने बाहर चले गए। इससे पहले 1936 में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम गठबंधन करके जिन्ना की अवज्ञा की थी। 1946 में उन्होंने पटेल से यह वादा किया था कि "यदि उन्हें प्रमुख बनाया गया तो वह न केवल कांग्रेस की नियुक्ति स्वीकार करेंगे, बल्कि पाकिस्तान को कराची में ही दफना देने में सहायता करेंगे।इससे जिन्ना को केवल मुस्लिम पाकिस्तान बनाने का मौका नहीं मिलता। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में मौलाना आजाद जिन्नाह की मंजूरी के बिना सिंध लीग के अध्यक्ष एम एच गजधर के साथ हुई प्रारंभिक वार्ता के आधार पर लीग के साथ एक गठबंधन करने के इच्छुक थे।
वास्तव में सिंध विधानसभा द्वारा लिए गए पाकिस्तान में विलय के निर्णय को सिंध की जनता ने कभी स्वीकार नही किया।सिंधी जनमानस जनमत संग्रह के पक्ष में था लेकिन उसकी भावनाओं की परवाह किये बिना सिंध का पाकिस्तान में विलय कर दिया गया। संस्कृति,राष्ट्रीयता और भाषाई रूप से सिंध भारत से ऐतिहासिक जुड़ाव का अनुभव करता है।सिंधी समुदाय सिंधी स्वतंत्रता के लिए आज भी संघर्षरत है।जिये सिंध आंदोलन सिंध स्वतंत्रता का उतना ही पुराना आंदोलन है जितना कि पाकिस्तान।सिंध में अल्पसंख्यक समुदाय नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त है।सरेआम गैर-मुस्लिम लड़कियों का उदाहरण और उनका जबरन धर्मान्तरण वहां आम घटना है।सिंध के हिंदुओं में 80% से अधिक आबादी दलित और गरीब है जिसको कोई मानवाधिकार एवं सुरक्षा उपलब्ध नही है।
सिन्धुदेश में स्वतन्त्रता आंदोलन इस समय उफान पर है। पाकिस्तान अत्याचार के कारण विरोधी लोगों में बेहद आक्रोश है। वर्ष 2012 में स्वतन्त्रता सेनानी बशीर खार कुरैशी छह अप्रैल को अचानक बीमार पड़ने के बाद  अस्पताल से जीवित वापस नही लौटे।अनुमान है कि उनकी चिकित्सीय हत्या की गई। इससे महाज के समर्थकों में आक्रोश है। कुरैशी जिये सिंध कौमी महाज यानी जिये सिंध राष्ट्रीय मोर्चा के अध्यक्ष थे। और सिंध प्रांत की आज़ादी के लिए अहिंसक संघर्ष कर रहे थे।पाकिस्तानके डॉक्टर उनकी मौत का कारण ह्रदयाघात बताते रहे लेकिन पोस्ट मार्टरम की रिपोर्ट सार्वजनिक नही की गई।
कुरैशी की चिकित्सीय हत्या के बाद कराची के सिंधी बहुल इलाकों, हैदारबाद, नवादशाह, लरकाना, शिकारपुर और घोटकी सहित प्रांत के छोटे बड़े शहरों में व्यापारिक एवं सामान्य जीवन ठप्प रहा।
पुलिस ने बंद के दौरान सिंध के कई शहरों में प्रदर्शनकारियों पर भीषण गोलीबारी की गई। कई शहरों में आगजनी की घटनाएं हुई।
सिंध कौमी महाज की स्थापना वर्ष 1972 में सिंध को पाकिस्तान से आज़ादी दिलाकर सिंधुदेश की स्थापना के उद्देश्य से की गई थी। इस संगठन का  सिंध के ग्रामीण इलाकों और विश्वविद्यालों में व्यापक असर है।
सिंध पाकिस्तान का सबसे धनी प्रांत है और देश के राजस्व का 70 प्रतिशत सिंध से हासिल होता है।लेकिन सिंधियों के संसाधनों की लूट पंजाबी सत्ताधीशों द्वारा कर ली जाती है जिसपर सिंधियों का कोई अधिकार नहीं है।ऐसे ही अनेक कारणों ने जिये सिंध कौमी महाज की स्थापना की परिस्थितियां निर्मित की।कौमी महज का पाकिस्तानी सेना और पंजाब प्रांत पर आरोप है कि वे सिंधियों के मानवाधिकारों का हनन कर रहे हैं। पाकिस्तान जिये सिंध कौमी महाज आंदोलन के पीछे भारत के होने का आरोप मढ़ता रहा है जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। वास्तव में चिकित्सीय हत्या से कुछ दिन पूर्व ही बशीर खान कुरैशी के नेतृत्व में सिंध की आजादी के लिए कराची में एक बड़ी रैली निकाली गई थी, जिसमें हज़ारों लोगों ने पाकिस्तान विरोधी और सिंध की आजादी के लिए नारे लगाए गए थे।जिसके कारण पाकिस्तान में बौखलाहट पैदा हो गई थी।
जनवरी 2017 में सिंध में पाकिस्तान और चीन के खिलाफ उग्र प्रदर्शन हुए।
प्रदर्शनकारी पाकिस्तान चीन की सहायता से करोड़ों डॉलर की लागत से बन रहे पाक-चीन आर्थिक कॉरिडोर का विरोध कर रहे है। उनका आरोप है कि इस योजना को लागू करने के लिए पाकिस्तिान मानवाधिकार का उल्लंघन कर रहा है। इस कॉरिडोर के रास्ते में आने वाले लाखों बाशिंदे को पाकिस्तान की सेना बहुत ही अमानवीय तरीके से दूसरी जगह जाने को मजबूर कर रही है।
पाकिस्तान-चीन आर्थिक कॉरिडोर का निर्माण आर्थिक से अधिक कूटनीतिक जरूरतों से करवाया जा रहा है।इस मार्ग से चीन के लिए खाड़ी देशों के साथ-साथ यूरोप से व्यापार करना आसान हो जाएगा। लेकिन पाकिस्तान के सिंध और बलूचिस्तान प्रांत के निवासियों का कहना है कि इसके लिए उन्हें अमानवीय तरीके से बेघर किया जा रहा है।
सितम्बर 2017 में भी जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ के बाहर व्यापक प्रदर्शन हुए।
बलूच नेशनल मूवमेंट (बीएनएम) और जिये सिंध कौमी मवूमेंट (जेएसक्यूएम) के प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तानी सेना के बर्बर कार्रवाई, लोगों को लापता किए जाने, नागरिकों की हत्या और प्रताड़ना के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किए।
जेएसक्यूएम नॉर्थ अमेरिका के सारंग अंसारी ने सिंध में राजनीतिक असंतोष की आवाज को दबाने की 'पाकिस्तान की सरकारी नीति' की कड़ी आलोचना की जिसका नतीजा बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने, हत्याओं, हिन्दू लड़कियों का इस्लाम में जबरन धर्मांतरण और सूफी धर्मस्थलों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के इबादत स्थलों को जानबूझकर निशाना बनाने वाली बर्बर जातीय हिंसा के रूप में सामने आ रहा है।
अंसारी ने संयुक्त राष्ट्र से मांग की कि पाकिस्तान को राष्ट्रवादी संगठनों के खिलाफ सिंध और बलूचिस्तान में आतंकी जेहादी संगठनों का इस्तेमाल करने से तत्काल रोका जाए.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव को सौंपे गए संयुक्त ज्ञापन में बीएनएम और जेएसक्यूएम ने दुनिया से आग्रह किया कि वह बलूचिस्तान और सिंध में निर्दोष नागरिकों के खिलाफ किए जा रहे ‘युद्ध अपराधों’ के लिए पाकिस्तान के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करे।
जिये सिंध मुत्ताहिदा महाज, सिन्धियत और सिंधी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है जिसके अधिकांश नेता या तो गुमशुदा हैं अथवा जेलों में है। जो बच्चे हैं वह निर्वासन में रहकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।जिये सिंध मुत्ताहिदा महाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष शफी मुहम्मद बुरफत निर्वासन में हैं जिनकी पार्टी को पाकिस्तान ने प्रतिबंधित किया हुआ है।पाकिस्तान ने जिये सिंध पार्टी के फेसबुक एवं अन्य सोशल मीडिया एकाउंटस को ब्लॉक करके अभिव्यक्ति को स्वतंत्रता को कुचल दिया है।पाकिस्तान ने सिंधी अभियक्ति पर बर्बरता का ताला जड़ दिया है।
भारत में राष्ट्रद्रोही तत्व आये दिन "भारत तेरे टुकड़े होंगे-इंशा अल्लाह" नारे लगाकर भी कहते हैं कि देश मे अभिव्यक्ति की आज़दी नही है।ऐसे लोगों को एक दो कैंडल मार्च सिंधियों की अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थन में भी निकालने चाहिए।दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते सिंधियों के मानवाधिकारों के दमन के विरुद्ध न केवल वैश्विक मंच पर आवाज़ उठानी चाहिए वरन उंन्हे नैतिक समर्थन भी प्रदान किया जाना चाहिए।सिंध पाकिस्तान की सबसे कमजोर कड़ी साबित हो सकता है।इसमें दूसरा बांग्लादेश बनने की सारी परिस्थितियाँ मौजूद है,कमी है तो केवल इंद्राई रणनीति की।

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