वहाबियत सऊदी अरब में पनपी और शीघ्र ही इस विचारधारा ने सारे सऊदी अरब और अनेक मुस्लिम देशों में अपनी पकड़ बना ली।वहाबियत/सलाफी या अहले हदीस इस्लाम पंथ को समझने के लिए इस्लाम के वैचारिक धरातल को समझना पड़ेगा।
इस्लामी विचार, कानून और सिद्धांतों के प्रमुखतः चार तत्व हैं।
कुरान, हदीश, इजमा एवं कयास
इन चारों के आधार पर ही किसी मसले को इस्लामी दृष्टिकोण से समझा जा सकता है।
इनमें कुरान को आकाशीय पुस्तक माना जाता है।ऐसा माना जाता है कि उसका कोई लेखक नही है, वरन वह अलग अलग अवधियों में आकाश से पैगम्बर मुहम्मद को प्राप्त हुई थी।इस्लामी विचारों का सार कुरान में दिया गया है।इसके अतिरिक्त मुहम्मद साहब द्वारा विभिन्न विषयों पर कही गई बातों को हदीश कहा गया है।हदीश से भी दुनियावी मसलों को इस्लामी दृष्टिकोण से समझने में मदद मिलती है।इन दोनों के अलावा कुछ ऐसे विषय है जिन पर कुरान अथवा हदीस के माध्यम से कोई प्रकाश नही पड़ता है तो उन विषयों पर इस्लामी उलेमा अपने ज्ञान के आधार पर मंथन-विश्लेषण करके, एक आमराय बनाने का प्रयास करते है। इसे "इजमा" कहा जाता है।सामयिक विषयों के बारे में उलेमा अथवा इस्लाम के जानकार कयास (अनुमान) लगाकर कोई मत बनाते हैं।
इस प्रकार प्राचीन से आधुनिकतम मुद्दे पर इस्लामी दृष्टिकोण को कुछ कोशिशों के बाद समझना ज्यादा कठिन नही है।
लेकिन सऊदी अरब में उत्पन्न वहाबी/सलाफी/अहले हदीश विचार धारा इस बात की प्रबल समर्थक है कि असली इस्लाम वही है जो पैगम्बर के समय में अस्तित्व में था।अतः कुरान और हदीस के अलावा इजमा एवं कयास का कोई अर्थ नही है। सल्फी पंथ के अनुसार यह इस्लाम की विचारधारा को गुमराह करती है।इस प्रकार इजमा एवं कयास जो कि बुद्धिजीविता की उपज है,का अहले हदीस समर्थन नही करता है।
अपने ब्लॉग इस्लामिक लीक्स में डॉ मुहम्मद उमैर सलाफी लिखते है कि देवबंदी विचारक जमील अहमद नजीरी,मुफ़्ती रशीद अहमद लुधियानवी, अनवर खुर्शीद देवबंदी,अमीन ओंकारवी,मुफ़्ती रशीद अहमद गंगोही खुद के इजमो को कई बार रद्द कर चुके है,उल्टे सल्फियत पर इजमा न मानने का आरोप लगाते हैं।
अहले हदीस एक इस्लामी पंथ है जो सूफियत में विश्वास नहीं करता है। इन्हें सलफ़ी/वहाबी भी कहा जाता हैं।यह पूरे विश्व में कट्टरता एवं आतंकवाद का ब्रांड अम्बेडकर बना हुआ है। अहले हदीस पैगम्बर मुहम्मद के समय के इस्लाम पर ही यकीन करता है।इस्लाम में पैगंबर की मौत के बाद इजमा और कयास के आधार पर हुए परिवर्तनों, सूफीवाद, दरगाह, पूजा एवं आधुनिक परिवर्तनों को अहले हदीस गैर-इस्लामी एवं हराम मानता है।
सलफ का अर्थ है शुरुआत के पहले 300 वर्ष का इस्लाम। सलफ़ी सुन्नी उर्फ़ अहले हदीस ज़यादातर सऊदी अरब और क़तर में हैं। ये किसी इमाम की तक़लीद नही करते हैं। पूरे विश्व के मुसलमानो में कट्टरपंथ फ़ैलाने का काम इसी वहाबी/सलाफी/अहले हदीस विचारधारा ने किया है। 1925 में अरब पर वहाबियों द्वारा क़ब्ज़े के बाद इसका नाम बदलकर सऊदी अरब कर दिया गया।अपने नियंत्रण के बाद वहाबियों ने सऊदी अरब में स्थित धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व की समस्त विरासतों को मूर्तिपूजा(शिर्क) की संज्ञा देकर नेस्तनाबूद कर दिया। जिसमे सैय्यदा फातिमा और उस्मान गनी की मज़ार भी शामिल है।
पाकिस्तान के मशहूर इस्लामिक चिंतक जावेद अहमद घामिडी के अनुसार मदरसाई पाठ्यक्रम का वर्तमान प्रारूप दुनिया में फैल रहे इस्लामी आतंकवाद का मूल कारण है।घामिडी के अनुसार मदरसाई पाठ्यक्रम का प्रारूप इस प्रकार है:
1- यदि दुनिया में कहीं शिर्क (मूर्तिपूजा),कुफ्र(इस्लाम को न मानना) अथवा इर्तबाद (इस्लाम को त्यागना) होगा तो उसकी सजा मौत है और यह सजा नाफ़िज़(सम्पन्न करने का) करने का हर मुसलमान को हक़ है।
2- गैर मुस्लिम सिर्फ महकूम (शासित) होने के लिए पैदा किये गए है।मुसलमानों के सिवाय किसी को हुकूमत करने का हक़ नही है।गैर-मुस्लिम हुकूमत नाजायज़ है।जब हमारे पास ताकत होगी ,हम उसको पलट देंगे।
गैर इस्लामी शासन अवैध है।
3- दुनिया में मुसलमानों की एक ही हुकूमत होनी चाहिए जिसे खिलाफत कहते हैं।अलग अलग हुकूमतों का कोई अर्थ नही है।
4- कौमी रियासतें (राष्ट्र-राज्य सरकारें) गैर इस्लामी हैं।दुनिया मे केवल ख़लीफ़ा के अंतर्गत शासन होना चाहिए।
भारत में सबसे पहले अहमद रज़ा खान बरेलवी वाहिबी खतरे को भांपा था उन्होंने देवबंदी आलिमों की गुस्ताखाना किताबों पर फतवे लगाये और आम मुसलमानों को इनके गलत अकीदे के बारे में अवगत कराया! भारत मे देवबंदी इस्लामी पंथ वहाबी विचारधारा का मुख्य प्रचारक प्रसारक है जो किसी मुस्लिम द्वारा हिन्दू उत्सवों में पूजा में शामिल होने,तिलक लगाने तक के खिलाफ तत्काल फतवा जारी कर देता है।इसका ताजा उदाहरण देवबन्द मदरसे द्वारा बनारस में मुस्लिम महिलाओं द्वारा श्रीराम की आरती उतारने,सहारनपुर में हाजी इकबाल द्वारा धन्वन्तरि पूजा पर हवन में भाग लेने और कांग्रेस नेता इमरान मसूद द्वारा गुरुद्वारे में मत्था टेकने को गैर इस्लामी घोषित करके इन्हें इस्लाम से खारिज कर दिया गया।इतना ही नही महिलाओं द्वारा आइब्रो बनाने तक का गैर-इस्लामी बताकर देवबन्द मदरसे ने फतवा जारी कर दिया।यह सब इसकी सलाफी/अहले हदीसी विचारधारा का द्योतक है।यद्यपि देवबन्द मदरसे का देश की आज़ादी की लड़ाई में उल्लेखनीय योगदान रहा है।इसका प्रमुख कारण था कि उस समय वहाबियत ने अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का आह्वान किया हुआ था जिसके अनुपालन में दारुल उलूम देवबंद ने आज़ादी की लड़ाई में भाग लेकर कांग्रेस को समर्थन दिया था।लेकिन आज देवबंदी विचार वहाबियत के साथ खड़ा है।दुनिया के अनेक आतंकी संगठन देवबंदी विचारधारा को मानने वाले हैं।हालांकि यह जरूरी नही है कि वे सब भारत के देवबन्द मदरसे से जुड़े हों।यद्यपि ओपिनियन पोस्ट के पत्रकार अजय विद्युत को दिए गए अपने एक साक्षात्कार में जमीयत उलेमा ए हिन्द के मौलाना महमूद मदनी ने देवबन्द मदरसे पर लगे आरोपों को खारिज किया है।हक्कनिया मदरसा पाकिस्तान से जुड़े एवं अल कायदा के संस्थापक समीउल हक देवबंदी के बारे में उन्होंने खंडन किया कि मौलाना समीउल हक देवबंद में एक दिन भी नहीं पढ़ा है। लेकिन हैं देवबंदी विचारधारा का यह सही है। पाकिस्तान के अकोड़ा,खटक में देवबंदी विचारधारा का एक बड़ा मदरसा है ।समीउल हक़ उसी का प्रमुख हैं।
मदनी ने यह भी कहा कि भारत के देवबंद मदरसे के मौलाना फजलुर्रहमान हैं। वह हमेशा शांति की बात करते हैं और पाकिस्तान में रहते हुए आतंकवाद का डटकर विरोध करते हैं। उनपर चार बार आत्मघाती हमले हो चुके हैं। मदनी ने कहा कि आज आतंकवाद के चलते स्थिति यह है कि "दुनिया के किसी भी कोने में कोई मुसलमान को देखेगा तो फौरन उसके दिमाग में आएगा कि ‘ओह, मुसलमान आ गया। अब जरा बच के रहो।"
तमाम तर्को के बावजूद देवबन्द मदरसे द्वारा आये दिन दिए जाने वाले अतार्किक एवं अधुनिकता के विरुद्ध फतवे इस बात का संकेत हैं कि वाहिबी विचारधारा एवं रूढ़िवादी इस्लाम को ही समर्थन करते है।भारत एक ऐसा देश है जिसकी विचारधारा "वसुधैव कुटुम्बकम" का आदर्श रखती है।ऐसे में देश में आतंक की जननी विचारधारा वहाबियत का किसी भी इस्लामी फिरके द्वारा समर्थन राष्ट्रीय एकता और अखंडता के विरुद्ध है। इसका स्थाई समाधान अत्यंत आवश्यक है।
16 अक्टूबर 2017 को खानपुर मदरसा के मौलाना असद से इस्लाम के आंतरिक विभाजन को लेकर मेरी बेबाक बातचीत हुई थी।वार्ता के क्रम में मौलाना ने बड़ी साफगोई से मेरे हर सवाल का जबाब दिया था।ईमानदारी उनके हर लफ्ज़ से साफ झलक रही थी।
मौलाना ने बताया था कि इस्लाम संतरे की तरह है जो बाहर से तो एक दिखाई देता है लेकिन अंदर से 73 फिरकों में तकसीम है।
मेरे अहले-हदीस ( वहाबी/सल्फी पंथ) से जुड़े सवाल के जबाब में मौलाना ने बताया कि आम मोमिन अमन पसन्द है। आतंकवाद की जड़ अहले-हदीस पंथ है।उन्होंने बताया कि अहले-हदीस अल्लाह और कुरान के अलावा न तो प्यारे नबी को और न ही शरीयत को अहमियत देता है।उन्होंने बताया कि यदि किसी अन्य फिरके का मोमिन अहले-हदीस मस्जिद में चला जाता है तो उसके वापस चले जाने के बाद वहाबी लोग पूरी मस्ज़िद को पाक करने के लिए धोते हैं।
मेरे इस सवाल के जबाब में मौलाना निरुत्तर थे कि इस्लाम के बारे में बन रही इस आम छवि को बदलने के लिए आप कोई मुहिम क्यों नही चलाते हैं?
बड़ा सवाल यह है कि यदि सबकुछ ठीक है तो मुस्लिम उलेमा समाज के बीच जाकर वह स्थिति बदलने को तैयार क्यों नही हो पा रहे हैं जो किसी आम आदमी द्वारा एक दाढ़ी वाले मुस्लिम को देखकर सन्देह उत्पन्न होने का कारण है।
सऊदी अरब के युवा प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान से जरूर कुछ उम्मीद जमी है क्योंकि उन्होंने कट्टरवाद के खिलाफ कुछ कदम उठाने की घोषणा की है।
Monday, November 6, 2017
सलाफी: आतंकवाद का ब्रांड अम्बेसडर
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