Friday, November 17, 2017

जाति समाजिक-आर्थिक संरचना का हिस्सा

हिन्दू धर्म में जाति समाजिक-आर्थिक संरचना का हिस्सा है।यह वर्ण व्यवस्था का उपउत्पाद है।
  सर्वप्रथम, ऋग्वेद के दसवें मण्डल में वर्ण व्यवस्था का वर्णन मिलता है।वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म था।शास्त्रों में कर्मणा वर्ण व्यवस्था को ही प्राथमिकता दी गई है।इसीलिए क्षत्रिय होते हुए भी विश्वामित्र श्रेष्ठ ब्राह्मण हुए।ऐसे अनेक उदाहरण है।कालांतर में वर्ण के अंदर जातियों का विकास हुआ।जातियों को उतपत्ति का सामान्य आधार व्यवसाय था।किसी एक वर्ण के अंतर्गत अलग अलग आर्थिक क्रियाएं सम्पादित करने वालों का उनके कार्य के आधार पर जाति में परिवर्तन हो गया ।जैसे तेल का कार्य करने वाले व्यवसायी तेली कहलाने लगे।उदाहरण और भी बहुत से हैं लेकिन इससे स्पष्ठ है कि जाति केवल हमारी सामाजिक एवं आर्थिक संरचना का अंग रही है।राजनीतिक संरचना से इसका कोई संबंध नही था।मण्डल आयोग के बाद देश के राजनीतिक परिदृश्य में जाति का इस्तेमाल किया जाने लगा।शातिर लोगों ने अपने व्यक्तिगत हितों को साधने के लिए भोले भाले लोगों का मानसिक शोषण किया।उंन्हे जाति विशेष के सामाजिक आर्थिक विकास से कोई लेना देना न था और न है।
जातीय राजनीति करने वाले इन कथित कथित जाति सरदारों की पोल उस समय खुल जाति है जब इनके व्यक्तिगत हित, जातीय हितों से टकराने लगते हैं।हितों के टकराव की स्थिति में इन कथित जाति विशेष के जातिय सरदारों ने न केवल अपनी ही जाति के उम्मीदवारों के सामने चुनाव लड़ा, वरन अपनी ही जाति में वैकल्पिक नेतृत्व को उभरने से रोकने के लिए तमाम हथकंडे अपनाने में संकोच नही किया।गुर्जर, जाट, राजपूत, सहित अन्य सभी जातियों में ऐसे अनेक उदाहरणों की भरमार है जब कथित बड़े जातिय नेताओं ने हितों के टकराव की स्थिति में जाति तो छोड़ ही दीजिये अपने पारिवारिक सदस्यों के सामने ही आने बेटे या बेटी को चुनाव लड़वा दिया।परिणाम स्वरूप दोनों को ही हार का मुंह देखना पड़ा।सन 2017 के विधान सभा में कैराना विधान सभा में एक ही जाती व परिवार के दो उम्मीदवार चुनाव लड़े और दोनों हार गए।कथित बडे नेता गली मोहल्ले स्तर के स्वजातीय छिटभैये नेताओं के उदय को भी अपने एकछत्र साम्राज्य के लिए खतरे की घण्टी के रूप में देखते है और उनका बेहयाई की सीमा तक विरोध करके अपने अंदर के खोखलेपन और डर को उजागर कर देते हैं।इस मामले में हमारे सामने केवल एक उदाहरण आता है जो इसका अपवाद है।सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव।मुलायम सिंह यादव को अपनी योग्यता पर इतना अधिक आत्मविश्वास है कि वह कभी इस बात से नही डरे कि कोई यादव नेता उनकी राजनीति समाप्त कर सकता है।इसी आत्मविश्वास के चलते मुलायम सिंह यादव ने अदने अदने से यादवों को ग्राम प्रधान स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर के नेता तक स्थापित कर दिया।
उपरोक्त विश्लेषण से मेरा मानना है कि भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जाति राजनीतिक संरचना का केवल एक घटक हो सकती है,मुख्य अवयव नही।यह जाती तय नही कर सकती है कि किसी क्षेत्र विशेष से एमपी कौन होगा या एमएलए कौन होगा? क्योंकि जातियां तो एक सर्वमान्य उम्मीदवार तक तय नही कर सकती है।एक छुटभैया नेता का भी यह सपना होता है और ऐसा होना भी चाहिए कि उसे चुनाव लड़ने का मौका मिले! लेकिन उम्मीदवारी भी व्यक्तिगत होती है,जातीय नही।इसका स्पष्ट अभिप्राय है कि जाति विशेष के नाम पर राजनीति का चलन "लोकतांत्रिक मक्कारी" से ज्यादा कुछ नही है। यह लोकतांत्रिक मक्कारी हिन्दू समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
व्यक्ति ने जिस जाति समाज मे जन्म लिया है,उसे उसके सामाजिक-आर्थिक विकास के उपक्रम की चिंता करनी चाहिए।हमें अनिवार्यतः यह चिंता करनी चाहिए कि मेरी जाति में शिक्षा एवं संस्कारों का प्रसार कैसे हो? हमारे बच्चे कैसे कठोर परिश्रमी बनके प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर सकें?    हमारी चिंता का यह भी विषय होना चाहिए कि कैसे मेरी जाति से कुरीतियों का विनाश हो?
   नेतृत्व क्षमता,योग्यता और कौशल के बल पर निखरती है,न कि जाति विशेष के सर्वमत समर्थन से। मुझे आज तक समझ नही आया कि हिंदुस्तान में नेहरू/गांधी,शास्त्री,देसाई,वाजपेयी,देवेगौड़ा, गुजराल अथवा मोदियों को जनसँख्या कितनी है जिसके बल पर ये प्रधानमंत्री बन सके? इसी में यह भी छुपा है कि निसन्देश जाति, राजनीतिक संरचना का हिस्सा नही है।
     देश में GURJAR एक ऐसा समुदाय है जिससे कुर्मी, जाट,अहीर,एवं राजपूत जातियां निकट रूप से सम्बंधित है, G=Gurjar,UR=Kurmi, J=Jat,A=Ahir, R=Rajput से मिलकर एक शब्द बना है ।इन जातियों की आज भी एक सांझी सांस्कृतिक विरासत है।उक्त जातियों के अधिकांश गौत्र उभयनिष्ठ है।जाति व्यवस्था अपने आप में गंभीर एवं वृहद् अनुसंधान का विषय है। यह दुर्भाग्य का विषय है कि अपनी राजनितिक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हमने समाज को विभाजित करने वाली प्रवृत्तियों को ही उभारा है। विभिन्न जातियों की उत्पत्ति पर अनुसंधान कार्यों को बढ़ावा देकर उन साझे आधारों को खोजने का कोई प्रयास नहीं किया गया जिनके द्वारा विभिन्न जातियों के बीच की दूरी मिटाकर उनका एकीकरण संभव हो पाता। सभी जातियों के क्षुद्र स्वार्थी लोग जातीय श्रेष्ठता के खोकले दावे करते है। खासकर गुर्जर,जाट और राजपूतों के अधिकांश गोत्र सामान हैं- जैसे तोमर,चौहान,पंवार,राठी,भाटी आदि। लेकिन फिर भी इन जातियों में आपस में भी अंतरजातीय विवाह अमान्य है। कुछ युवक युवतियों द्वारा आपस में शादियाँ कर लेने पर खोकले सम्मान के नाम पर बेरहमी से उन्हें 'मान हत्या' की भेंट चढ़ा दिया गया।
पिछले दिनों एक मामूली सी बात को दलित उत्पीड़न का नाम देकर सहारनपुर  को नफरत की आग में झोंकने का काम किया गया ।जबकि असलियत यह है कि उस प्रकरण में मरने वाले सभी लोग दलित थे।शुरुआत एक राजपूत युवक की कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा हत्या से शुरू हुआ था।जेहाद कार्यप्रणाली का यह भी एक अभिन्न अंग बन गया है कि हिन्दू समाज को जातियों में विभाजित करने पर कार्य किया जाए।जेहादी रणनीति के तहत दलितों को उत्पीड़ित के रूप में प्रचारित किया जाए।दलितों को हिन्दू समाज के उच्च वर्गों के द्वारा अत्यधिक उत्पीड़न की थ्योरी प्रचारित करके उनका प्रयोग दलित-मुस्लिम गठजोड़ के रूप में हो।इस कार्य के लिए विधिवत रूप से सलाफी/अहले हदिशि अलमिशफू एवं नाशित जेहादी इकाइयां कार्यरत हैं।राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि सलाफी जिहाद के खतरों को भांपकर हिन्दू समाज के व्यापक सामाजिक एकीकरण पर कार्य हो।इस कार्य के लिए जिम्मेदार सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए।
देश के चहुँ ओर शत्रु आँख गडाए हुवे है। हम आपसी झगड़ों में ही मशगूल हैं।आज की आवश्यकता है की समाज का एकीकरण करने वाली प्रवृत्तियों को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय एकता को मजबूती प्रदान की जाये।
  आज सरदार पटेल नही है जिन्होंने 560 से ज्यादा रियासतों का एकीकरण करके आधुनिक भारत का निर्माण किया था। पटेल का वंशज,अनुयायी,समर्थक कुछ भी कहिये, होने के नाते क्या यह हमारा प्रथम दायित्व नही है कि हम हिन्दूसमाज  की 560 से अधिक जातियों का एकीकरण करके ,सरदार पटेल के भारत को अधिक सुदृढ़ और एकीकृत करने में खुद को खपा दे और तिलांजलि दे दे अपने निहित स्वार्थों की,अनावृत कर दे क्षुद्र जातीय राजनीति करने वालों को!

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