भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार प्रदान किये गए हैं.मौलिक अधिकार व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार हैं जो उन्हें किसी भेदभाव के बने प्रदान करने की संविधान के अनुच्छेद ३२ के द्वारा गारंटी प्रदान की गई है.इसके अतिरिक्त कोई व्यक्ति अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद २२६ के तहत है कोर्ट में भी अर्जी दे सकता है. आये दिन हम समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़ते भी रहते है की फला व्यक्ति ने रित दायर की..यह सब जानकारी आप तक पहुँचाना मेरा मकसद नहीं है क्योंकि यह सर्व विदित है. मई सिर्फ यह सवाल उठाना चाहता हूँ की जब संविधान ने अनुच्छेद ३२ के तहत यह व्यवस्था की है की अगर किसी दुसरे व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा हो तो कोई अन्य व्यक्ति भी उसके अधिकारों की रक्षा की सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा सकता है तो क्या यह जरूरी नहीं है की लोगो के कर्त्तव्य पालन को भी अब संविधानिक प्रावधानों के जरिये अनिवार्य क्यों न बनाया जाये ? समस्याए यही से पैदा होती है क्योंकि हम सिर्फ अधिकारों के प्रति जागरूक है..कर्तव्यों से हमारा कोई लेना देना नहीं है.
इस बात का सन्दर्भ मैंने अनावश्यक ही नहीं लिया है.भारतीय संविधान में बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति को व्यस्क मताधिकार प्रदान किया गया है, जो अधिकार भी है एवम कर्तव्य भी.प्रत्येक भर्ती का यह परम कर्तव्य है की वह भारत गणराज्य को एक लोकतान्त्रिक सरकार चुन कर दे.
मतदान के दिन को हम अवकाश पर्व के रूप में मानाने के आदि हो गए हैं..अपने आप को बुद्धिजीवी कहलाने वाले व्यक्ति इस दिन ताश खेलकर या फिर कुछ जरूरी कम करके अपना समय व्यतीत करते है..शराब की चाहत वाले और कुछ ऐसे लोग जिन्हें अपने मत की कीमत ही मालूम नहीं होती १००-२०० रूपये में अपना मत बेच देते हैं.उन्हें इस बात से कोई लेना देना नहीं की उनके मत से कोई कलमाड़ी जीतेगा या कोई ए राजा ? कथित बुद्धिजीवी फिर या तो चुनाव समीक्षा करते हुवे मीडिया माध्यमों में नजर आते हैं या उनमे से कुछ परिवर्तन की बड़ी बड़ी बाते करते है...अथवा फिर कुछ सुधारक आंदोलनों के माध्यम से हाय तौबा मचाते है.
अधिकारों का दूसरा पहलु कर्त्तव्य ही होता है फिर यह कैसे संभव है की अधिकार तो अनिवार्य बना दिए जाये और कर्तव्यों को विवेक पर छोड़ दिया जाये. प्रत्येक व्यक्ति सरकार से अपने सभी अधिकारों की सुरक्षा चाहता है.
कोई भी चुनाव सुधार बेमानी ही रहेगा अगर वोट % 50 के आस- पास ही बना रहा.अनिवार्य मतदान का कानून चुनाव सुधार की आवश्यक शर्त है. अगर हमें अधिकार चाहिए तो हमें अपने कर्तव्यों का भी कड़ी से पालन करना होगा.कर्तव्य पालन नहीं तो अधिकारों में कटौती जरुरी है.अगर कोई व्यक्ति मतदान न करे तो उसके राशन कार्ड जैसे अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है..या कोई दूसरा उपाय खोजा जा सकता है..
हमारे देश में कोई अच्छी बात तभी अच्छी होती है जब उसे कोई शक्तिमान या सत्त्ताधारी दल का कद्दावर नेता कहे.
नरेन्द्र मोदी ने अनिवार्य मतदान की बात की थी लेकिन उसे अनसुना कर दिया गया था.यही बात अगर राहुल गाँधी या सोनिया गाँधी ने कही होती तो उनकी तारीफ में कसीदे पढ़े जाते.. आवश्यक है की हर सही बात को सही और गलत को गलत कहने का साहस जुटाएं हम. चुनाव सुधारों की बात करते समय तार्किकता और व्यवहारिकता को ध्यान में रखने की जरूरत है..बाते और भी है चलती रहेगी..
कुंवर सत्यम,
दिल्ली विश्व विद्यालय, दिल्ली.
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