देखते ही देखते गांव देहात के जोहड़/तालाब विलुप्त हो गए ।
ठीक वैसे ही जैसे जीव जंतुओं की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं।आखिर कहां गए ये तालाब ? कौन है जो अगस्त्यमुनि के समुद्री पी जाने की भांति देश के तालाबों को न केवल पी गया बल्कि उन्हें समूल नष्ट कर दिया?
हर गांव के तालाबों पर कुछ लालची लोगों की प्रारम्भ से ही नजर रही है।
हथछोया का उदाहरण लेते हैं जहां
विशाल डाब्बर पर शुरू से ही लोगों की गिद्द दृष्टि रही है। शोक-समंदर इस लालच की पूर्ति का एक बड़ा माध्यम बना। यह स्थिति सिर्फ हथछोया की नहीं है वरन ग्रामीण जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। शोक समंदर एक जलीय कुकुरमुत्ता है जो दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ता है। यदि हम शोक-समंदर को "जलीय दानव" की संज्ञा दे तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। हथछोया मे इस जलीय दानव का सबसे पहले प्रवेश गुल्ही मे किसी शातिर "भू-भक्षक" ने कराया। देखते ही देखते इस दानव ने सम्पूर्ण गुल्ही का भक्षण कर लिया । इस की एक खास विशेषता यह है कि यह जल की समस्त ऑक्सिजन को ग्रस जाता है और जलीय जीवन का खात्मा कर देता है। इसका जो भी हिस्सा जल की एक विशेष मात्रा से ऊपर रह जाता है वह तेजी से सूख जाता है और तालाब के भराव का सबसे सुलभ और सस्ता साधन है। गुल्ही के बाद देववाला और विशाल डाब्बर इस "जलीय दानव" के शिकार बने। पशुओं के गोबर और घरेलू कूड़े के साथ मिलकर यह तालाबों के भराव के लिए बेहतरीन उपाय है। इसी विधि से गाँव के सभी तालाबों का शिकार किया गया।
गाँव की जैव-विविधता पर भी इस भू-भक्षण का विपरीत प्रभाव पड़ा। गाँव मे मुर्गाबी, बत्तख,नाकू आदि अनेक जलीय जीव बहुतायत मे पाये जाते थे जो अब सिर्फ चिड़िया घरों मे ही देखने को मिलते है। सिंघाड़े की खेती से भी गाँव के बहुत से कश्यप परिवार एक अच्छी ख़ासी धन राशि कमाते थे जो अब बिलकुल समाप्त हो गया। वर्षाकाल के बाद भभूल के फूल ( सफ़ेद रंग के कमल के समान फूल) गाँव की शोभा को चार चंद लगाया करते थे , जो अब देखने को नहीं मिलते है। हम लोग अक्सर "भभूल के फूल" से हार बनाकर पहना करते थे।कल जहां खुशियो और आबादी के भभूल खिला करते थे, आज वहाँ शोक-समंदर के "बर्बादी के फूल" गाँव के दुर्भाग्य पर अपनी कुटिल मुस्कान बिखेर रहे है।
गाँव के विशाल तालाब एक और जहां इसके भूमिगत जल के प्रमुख साधन थे, वहीं दूसरी और ये पशुपालन के भी बड़े प्रेरक कारक थे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार सदियों से पशुपालन रहा है। हरा चारा और प्रचुर जल पशुपालन के प्रमुख अवयव है। तालाबों के विनाश के कारण गाँव मे पशुपालन पर भी विपरीत असर पड़ा है। रोजाना शाम के समय तालाबों मे पशुओं के झुंडों का नहाना एक आम दृश्य हुआ करता था। लोग अपने पशुओं को पानी पिलाने और नहलाने के लिए इन तालाबों मे उतारा करते थे। लेकिन अब जब गाँव मे तालाब लगभग नष्ट हो गए है, पशुपालन के लिए जल उपलब्धता समाप्त प्राय हो गई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर तालाबों का अतिक्रमण इतनी आसानी से कैसे हो गया जबकि ये समाज की साझा संपत्ति थे?
मेरा मत है कि 1990 के दशक में देश मे पंचायत राज अधिनियम की स्थापना के साथ ही तालाबों की मौत की पटकथा भी लिख दी गई।इस अधिनियम के द्वारा ग्राम पंचायतों के चुनाव प्रारम्भ हुए जिससे ग्राम सभाएं भी घटिया एवं स्वार्थी राजनीति का केंद्र बन गई।गाँवो में पार्टीबाजी शुरू हो गई ।ग्राम प्रधान पद के वर्तमान एवं सम्भावित सभी प्रत्याशियों ने अपने समर्थकों को खुश करने के लिए सरकारी भूमि, गौचरान भूमि एवं तालाबों के अतिक्रमण के समय न केवल मौन साध लिया वरन उनको इस कार्य के लिए उकसाया भी।ग्राम प्रधान, ग्राम सचिव और ग्राम पटवारी सरकारी भूमि एवं तालाबों के संरक्षक होते है लेकिन इन तीनों की मिलीभगत से तालाब की भूमि बंदरबांट की भेंट चढ़ गई! तालाबों का अतिक्रमण करते समय दबंग डरे नही और शेष समाज ने अकर्मण्यता की चादर ओढ़ ली जिसका दुष्परिणाम जोहड़ों/तालाबों के विलुप्तीकरण के रूप में सामने आया।कुछ लोगों के स्वार्थों की कीमत सम्पूर्ण समाज चुका रहा है।
ग्राम प्रधान,ग्राम सचिव और ग्राम पटवारी ही वह शक्तियां हैं जो अगस्त्यमुनि से भी शक्तिशाली सिद्ध हुई हैं।ये न केवल तालाबों का पानी पी गए वरन उनकी समस्त भूमि भी निगल गए।इन्ही की जिम्मेदारी तय करके कार्यवाही होगी तो शायद मेरे वो तालाब मुझे लौटाए जा सकें।
Tuesday, December 26, 2017
मुझे मेरे तालाब लौटा दो..!
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