एक जंगल में एक कंगारू रहता था.उसका एक छोटा बच्चा था जिसे वह अपनी पेट में बनी धानी( थैली ) में रखता था. एक दिन जब उन दोनों को भूख लगी तो वह भोजन की तलाश में निकला. वह भोजन खोज ही रहा था कि उसके बच्चे को शैतानी सूझी और वह धीरे से धानी से कब बाहर निकल गया कंगारू को पता ही नही चला.
Wednesday, July 30, 2014
Saturday, April 26, 2014
इन्द्रप्रस्थ राज्य के विश्वविद्यालय
वर्तमान में इन्द्रप्रस्थ राज्य में निम्नलिखित 18 विश्वविद्यालय कार्यरत है:
दिल्ली
1 गुरु गोविन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय
2 दिल्ली विश्वविद्यालय
3 जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
4 डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय
5 दिल्ली प्रोद्योगिक विश्वविद्यालय
6 इंदिरा गांधी नेशनल ओपन विश्वविद्यालय
7 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय
8 दक्षेश विश्वविद्यालय
मेरठ
9 चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय
10 सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय
11 स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय
12 शोभित विश्वविद्यालय
गौतमबुद्धनगर (ग्रेटर नॉएडा)
13 गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय
14 शारदा विश्वविद्यालय
15 एमिटी विश्वविद्यालय
16 महामाया प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय
सहारनपुर
17 ग्लोकल विश्वविद्यालय
मुरादाबाद
18 तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय
Tuesday, April 1, 2014
लोकतंत्र के पाए बनेंगे तभी मिलेगी खुशहाली की चारपाई...!
भारत दुनिया का सबसे प्राचीन गणतंत्र है.वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होना अपने आप में आधुनिक सभ्य दुनिया में गर्व से सीना चौड़ा करने के लिए एक बड़ी वजह है हमारे लिए.
लेकिन इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमारा स्थान कहाँ है , यह हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए. देश के स्वातंत्र्य संघर्ष में हमारा योगदान सर्वविदित है.हम लड़ने में लगे रहे, भारत निर्माण के पहले दिन से हम देश के दुश्मनों के साथ लगातार युद्दरत रहे है.शक,पहलव,हूण,कुषाण,अरब,तुर्क,और मुगलों से लेकर अंग्रेजो तक देश के हर दुश्मन से हमने लोहा लिया,अपनी प्राणाहुति देकर राष्ट्र रक्षा का वृत्त निभाया.सतत संघर्षशील रहने के कारण लडाकुपन और व्यवस्था के विरुद्ध सैद्धांतिक विद्रोह हमारी रगों में खून बनकर दौड़ने लगा है.
देश हमारे पूर्वजों के असंख्य बलिदानों के फलस्वरूप 1947 में आज़ाद हो गया लेकिन हमारी लड़ाकू प्रवृत्ति आज भी यथावत बनी हुई है.आज देश में हमारी अपनी चुनी हुई सरकारे हैं लेकिन सत्ता के विरुद्ध संघर्ष की हमारी प्रवृत्ती आज भी यथावत बनी हुई और इसका घातक परिणाम यह है कि विकास की दौड़ से हमारा समाज आज भी वंचित है.
* समाज को व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता है.
* Motivation जरुरी है. हमें किसी ने motivate नहीं किया.
* हमारे आस-पास के धूर्त लोगो हमारे समाज का मनोबल गिराया.
नकारात्मकता को बढ़ावा दिया गया, उतने पैर पसारो जितनी चादर, कहकर हमारे अन्दर की संभावनाओ को नष्ट कर दिया गया..हमारी जोखिम क्षमता को कभी बढ़ावा नहीं मिला,
कभी किसी ने यह कहकर मनोबल नहीं बढाया कि खुलकर पैर पसारो, चादर छोटी है तो क्या..बड़ी का इंतजाम कर लेंगे.
* हमारे समाज को चोर कहकर बदनाम किया जाता रहा.बदनाम करने वाले वही लोग थे जिनका स्वयम का अतीत देशद्रोही का रहा है..
देश के दुश्मनों से लड़ने के कारण हम शिक्षा से दूर चले गए.
मै कहता हूँ कि मुझे गर्व है कि मेरे पूर्वज चोर थे, क्योंकि उन्होंने देश के शत्रुओं को लूटा और बाद में उनके चमचो को.
* जो चोर बन सकता है वह ज्यादा होशियार होता है. क और बनने में नोकरी और बिजनेस में कैरियर बनाने से ज्यादा मेहनत करनी पडती है, क्योंकि चोरी भी करनी है और खुद को पुलिस से भी बचाना है एन्कौन्टर का खतरा हमेशा अलग से..फिर हमें इतनी मेहनत करने की जरूरत क्या है..इससे कम मेहनत में तो SDM बना जा सकता है..
*आज हमारे पास रोल माडल की कमी नहीं है. विजय विधूड़ी,अरविन्द पोसवाल, पूजा अवाना जैसे उदहारण है जिनसे समाज के बच्चे प्रेरणा ले सकते है.
* भारत एक लोकतान्त्रिक देश है.आज हमे शाशन/सत्ता के साथ टकराने की नहीं बल्कि उसमे घुस जाने की जरूरत है,टकराव की आदत अब हमे छोडनी होगी.
अब समय आ गया है कि हम लोकतांत्रिक प्रतिष्ठानों में अपनी भागीदारी/ हिस्सेदारी प्राप्त करने के लिए संघर्ष करे..
* संघर्ष मैदान में नहीं मकान में करना है.यह संघर्ष हमारी युवा पीढ़ी को करना है. उसे मकान में जी जान से पढ़ाई में मेहनत करनी होगी.
* जरूरत अपनी अगली पीढियों को खेती से निकालने की है. एक तो खेत अब रहे नहीं. खेती से ही विकास होना होता तो देश में सबसे अमीर किसान ही होते. इसलिए खेती से बाहर आओ, आय के वैकल्पिक साधन अपनाओ..जो बच्चा जिस लायक है उसे उसी काम में लगाओ, दूकान खुलवाओ, कोई और काम करवाओ लेकिन खेती के भरोसे मत रहने दो.
* लोकतंत्र के चार स्तम्भ माने जाते हैं- कार्यपालिका,न्यायपालिका,विधायिका और प्रेस..
इन चारो में हम कहाँ खड़े है ?
*
हमारे समाज का हर आदमी MP/MLA का ख्वाब पालता है वह भले ही इसके योग्य है या नहीं.समाज जिम्मेदार बने और तय करे कि वास्तव में समाज का नेतृत्व करने लायक वास्तव में कौन है.किसी को MP/MLA बना देने मात्र से वह समाज का नेता नहीं हो जाता है.. जो लोग संसद/विधान सभा में समाज के मुद्दे नहीं उठा सकते/ सवाल नहीं पूछ सकते/क्षेत्र को सरकारी योजनाओ का लाभ नहीं दिला सकते/सरकारी संसाधनों का समाज हित में प्रयोग नहीं करवा सकते उनसे तो अच्छा है किसीअन्य समाज का कोई योग्य व्यक्ति जीत जाए.
* अब तक हमने जिनको समाज का जनप्रतिनिधि बनाया उनके काम का आकलन सडक/खड़ंजे/नाली बनवाने और नलके लगवाने से नहीं किया जा सकता है..यह काम तो एक अंगूठा छाप जनप्रतिनिधि भी करा देगा, नही कराएगा तो निधि वापस हो जायेगी.
*हमे देखना चाहिए कि उन्होंने क्षेत्र में कितने सरकारी कालेज बनवाये,मेडिकल कालेज, विश्वविद्यालय बनवाये? शिक्षा सुविधाओं का विकास कराया, क्षेत्र की समस्याओं से सदन को ठीक से अवगत कराया ? क्षेत्र में कोई बड़ी सरकारी परियोजना प्रारंभ करवाई? सदन में कोई रचनात्मक विधेयक पेश किया?
* हमें कुछ लोगों ने अपने हित साधने के लिए गलत जानकारी दी कि जिनकी विभिन्न राजनितिक दल हमारी अनदेखी करते है..ऐसा करके वे लोग अपनी अयोग्यता
को ही छुपाते है..इस देश में वाजपेयी,गुजराल,देवगौड़ा कितने है? वे प्रधानमंत्री बनते है अपनी नेत्रत्व क्षमता से,
हमारे लोग वास्तव में उस स्तर के नहीं है इसलिए समाज को गुमराह करते है.
*कार्यपालिका लोकतंत्र का एक स्तम्भ है, इसके अतिरिक्त 3 महत्वपूर्ण स्तम्भ और है..जिन पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया..जबकि इनमे अपनी भागीदारी बढ़ाना कहीं अधिक आसान है..
प्रेस में जाना आसान है- हम उस पर ध्यान केन्द्रित करे..
न्यायपालिका में जाना भी आसान है, उस पर ध्यान केन्द्रित करना होगा.
विधायिका का महत्वपूर्ण अंग सिविल सेवाएं है.इसमें जाना भी बहुत कठिन नहीं है.
मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब हमारे पास लोकतंत्र के ये चार पाए होंगे तो हम इतने योग्य भी होंगे के कार्यपालिका में हम अपना हिस्सा खुद ले लेंगे और देश / प्रदेश में हमारे मंत्री/मुख्यमंत्री/प्रधानमन्त्री भी होंगे..
जसाला परिवार का उदाहरणः हमारे सामने है..न्यायपालिका में उच्च स्थान तक पहुंचे..उनकी बदौलत इस परिवार को कितनी बढ़त है इसका हर कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता है.
इसलिए संकल्प ले कि हम लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों में अपनी हिस्सेदारी बढाने के लिए जी जान से लगेंगे,अपने बच्चो को लगायेंगे.और सत्ता में अपनी भागीदारी लेकर रहेंगे.यही एक रास्ता है..
लेकिन इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमारा स्थान कहाँ है , यह हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए. देश के स्वातंत्र्य संघर्ष में हमारा योगदान सर्वविदित है.हम लड़ने में लगे रहे, भारत निर्माण के पहले दिन से हम देश के दुश्मनों के साथ लगातार युद्दरत रहे है.शक,पहलव,हूण,कुषाण,अरब,तुर्क,और मुगलों से लेकर अंग्रेजो तक देश के हर दुश्मन से हमने लोहा लिया,अपनी प्राणाहुति देकर राष्ट्र रक्षा का वृत्त निभाया.सतत संघर्षशील रहने के कारण लडाकुपन और व्यवस्था के विरुद्ध सैद्धांतिक विद्रोह हमारी रगों में खून बनकर दौड़ने लगा है.
देश हमारे पूर्वजों के असंख्य बलिदानों के फलस्वरूप 1947 में आज़ाद हो गया लेकिन हमारी लड़ाकू प्रवृत्ति आज भी यथावत बनी हुई है.आज देश में हमारी अपनी चुनी हुई सरकारे हैं लेकिन सत्ता के विरुद्ध संघर्ष की हमारी प्रवृत्ती आज भी यथावत बनी हुई और इसका घातक परिणाम यह है कि विकास की दौड़ से हमारा समाज आज भी वंचित है.
* समाज को व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता है.
* Motivation जरुरी है. हमें किसी ने motivate नहीं किया.
* हमारे आस-पास के धूर्त लोगो हमारे समाज का मनोबल गिराया.
नकारात्मकता को बढ़ावा दिया गया, उतने पैर पसारो जितनी चादर, कहकर हमारे अन्दर की संभावनाओ को नष्ट कर दिया गया..हमारी जोखिम क्षमता को कभी बढ़ावा नहीं मिला,
कभी किसी ने यह कहकर मनोबल नहीं बढाया कि खुलकर पैर पसारो, चादर छोटी है तो क्या..बड़ी का इंतजाम कर लेंगे.
* हमारे समाज को चोर कहकर बदनाम किया जाता रहा.बदनाम करने वाले वही लोग थे जिनका स्वयम का अतीत देशद्रोही का रहा है..
देश के दुश्मनों से लड़ने के कारण हम शिक्षा से दूर चले गए.
मै कहता हूँ कि मुझे गर्व है कि मेरे पूर्वज चोर थे, क्योंकि उन्होंने देश के शत्रुओं को लूटा और बाद में उनके चमचो को.
* जो चोर बन सकता है वह ज्यादा होशियार होता है. क और बनने में नोकरी और बिजनेस में कैरियर बनाने से ज्यादा मेहनत करनी पडती है, क्योंकि चोरी भी करनी है और खुद को पुलिस से भी बचाना है एन्कौन्टर का खतरा हमेशा अलग से..फिर हमें इतनी मेहनत करने की जरूरत क्या है..इससे कम मेहनत में तो SDM बना जा सकता है..
*आज हमारे पास रोल माडल की कमी नहीं है. विजय विधूड़ी,अरविन्द पोसवाल, पूजा अवाना जैसे उदहारण है जिनसे समाज के बच्चे प्रेरणा ले सकते है.
* भारत एक लोकतान्त्रिक देश है.आज हमे शाशन/सत्ता के साथ टकराने की नहीं बल्कि उसमे घुस जाने की जरूरत है,टकराव की आदत अब हमे छोडनी होगी.
अब समय आ गया है कि हम लोकतांत्रिक प्रतिष्ठानों में अपनी भागीदारी/ हिस्सेदारी प्राप्त करने के लिए संघर्ष करे..
* संघर्ष मैदान में नहीं मकान में करना है.यह संघर्ष हमारी युवा पीढ़ी को करना है. उसे मकान में जी जान से पढ़ाई में मेहनत करनी होगी.
* जरूरत अपनी अगली पीढियों को खेती से निकालने की है. एक तो खेत अब रहे नहीं. खेती से ही विकास होना होता तो देश में सबसे अमीर किसान ही होते. इसलिए खेती से बाहर आओ, आय के वैकल्पिक साधन अपनाओ..जो बच्चा जिस लायक है उसे उसी काम में लगाओ, दूकान खुलवाओ, कोई और काम करवाओ लेकिन खेती के भरोसे मत रहने दो.
* लोकतंत्र के चार स्तम्भ माने जाते हैं- कार्यपालिका,न्यायपालिका,विधायिका और प्रेस..
इन चारो में हम कहाँ खड़े है ?
*
हमारे समाज का हर आदमी MP/MLA का ख्वाब पालता है वह भले ही इसके योग्य है या नहीं.समाज जिम्मेदार बने और तय करे कि वास्तव में समाज का नेतृत्व करने लायक वास्तव में कौन है.किसी को MP/MLA बना देने मात्र से वह समाज का नेता नहीं हो जाता है.. जो लोग संसद/विधान सभा में समाज के मुद्दे नहीं उठा सकते/ सवाल नहीं पूछ सकते/क्षेत्र को सरकारी योजनाओ का लाभ नहीं दिला सकते/सरकारी संसाधनों का समाज हित में प्रयोग नहीं करवा सकते उनसे तो अच्छा है किसीअन्य समाज का कोई योग्य व्यक्ति जीत जाए.
* अब तक हमने जिनको समाज का जनप्रतिनिधि बनाया उनके काम का आकलन सडक/खड़ंजे/नाली बनवाने और नलके लगवाने से नहीं किया जा सकता है..यह काम तो एक अंगूठा छाप जनप्रतिनिधि भी करा देगा, नही कराएगा तो निधि वापस हो जायेगी.
*हमे देखना चाहिए कि उन्होंने क्षेत्र में कितने सरकारी कालेज बनवाये,मेडिकल कालेज, विश्वविद्यालय बनवाये? शिक्षा सुविधाओं का विकास कराया, क्षेत्र की समस्याओं से सदन को ठीक से अवगत कराया ? क्षेत्र में कोई बड़ी सरकारी परियोजना प्रारंभ करवाई? सदन में कोई रचनात्मक विधेयक पेश किया?
* हमें कुछ लोगों ने अपने हित साधने के लिए गलत जानकारी दी कि जिनकी विभिन्न राजनितिक दल हमारी अनदेखी करते है..ऐसा करके वे लोग अपनी अयोग्यता
को ही छुपाते है..इस देश में वाजपेयी,गुजराल,देवगौड़ा कितने है? वे प्रधानमंत्री बनते है अपनी नेत्रत्व क्षमता से,
हमारे लोग वास्तव में उस स्तर के नहीं है इसलिए समाज को गुमराह करते है.
*कार्यपालिका लोकतंत्र का एक स्तम्भ है, इसके अतिरिक्त 3 महत्वपूर्ण स्तम्भ और है..जिन पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया..जबकि इनमे अपनी भागीदारी बढ़ाना कहीं अधिक आसान है..
प्रेस में जाना आसान है- हम उस पर ध्यान केन्द्रित करे..
न्यायपालिका में जाना भी आसान है, उस पर ध्यान केन्द्रित करना होगा.
विधायिका का महत्वपूर्ण अंग सिविल सेवाएं है.इसमें जाना भी बहुत कठिन नहीं है.
मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब हमारे पास लोकतंत्र के ये चार पाए होंगे तो हम इतने योग्य भी होंगे के कार्यपालिका में हम अपना हिस्सा खुद ले लेंगे और देश / प्रदेश में हमारे मंत्री/मुख्यमंत्री/प्रधानमन्त्री भी होंगे..
जसाला परिवार का उदाहरणः हमारे सामने है..न्यायपालिका में उच्च स्थान तक पहुंचे..उनकी बदौलत इस परिवार को कितनी बढ़त है इसका हर कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता है.
इसलिए संकल्प ले कि हम लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों में अपनी हिस्सेदारी बढाने के लिए जी जान से लगेंगे,अपने बच्चो को लगायेंगे.और सत्ता में अपनी भागीदारी लेकर रहेंगे.यही एक रास्ता है..
Friday, March 21, 2014
लिख दो इतिहास-पटल पर !
लिख दो इतिहास-पटल पर,
दीवानों तुम चल कर.
वीर शिवा तुम बनकर,
गहरे नीले नभ पर !
लिख दो तुम अंगड़ाई,
भारत भाग्य लड़ाई.
जयचंदों का पतन लिखो,
गद्दारों की विदाई..
झटक दो पड़ी धूल अकल पर..
लिख दो इतिहास...
सुनील सत्यम
दीवानों तुम चल कर.
वीर शिवा तुम बनकर,
गहरे नीले नभ पर !
लिख दो तुम अंगड़ाई,
भारत भाग्य लड़ाई.
जयचंदों का पतन लिखो,
गद्दारों की विदाई..
झटक दो पड़ी धूल अकल पर..
लिख दो इतिहास...
सुनील सत्यम
Wednesday, January 23, 2013
मोहरे.
तलाश ही लेते हैं,
शकुनि हर युग में मोहरे.
हर युग में चलेगी,
कपट-क्रीडा और मान-दंड दोहरे.
विदुर न कभी सफल होंगे
.जब तक रहेंगे दुर्योधन छिछोरे.
जारी रहेगी महाभारत,
जब तक न होंगे कृष्णा के दौरें.
१८ दिन लड़ाकुओं का शोर,
बाद में पश्चाताफ के कोहरे
.मोहरे तो मोहरे होते है,
असली दोषी है शकुनि घिनोरे.
Saturday, December 29, 2012
कब होंगे हम इंसान..
वैज्ञानिक कहते है
हम बन्दर, चिम्पैज़ी, गुरिल्ले की
संतान हैं.
वो कहते है ,
कभी हमारी एक पूंछ होती थी.
पूँछ गायब हो गई ..
इन्सान होना एक प्रक्रिया है
यह प्रक्रिया हजारो साल से
अनवरत जारी है..
हम लगातार कोशिश कर रहे है
इन्सान बनने की.
हर बार हमारी कोशिश
चढ़ जाती है
हमारी लापरवाही की भेंट.
गलियों में घूमते बेख़ौफ़ भेडियों
ने हर बार हमारी उम्मीदों
पर हाथ साफ़ किया है..
हमारी हर कोशिश
हो जाती है बेमतलब.
हम अपने को आज भी,
उसी चिम्पैंजी रूप में पाते है.
चारो तरफ कुत्ते, भेडिये,
और खूंखार जानवर..
दूर दूर तक जंगल सुनसान..
आखिर कब होंगे हम इंसान.?
अभी बहुत वक़्त लगेगा..
शायद १००/५००/१००० साल
या उससे भी ज्यादा..
आखिर कब तैयार होगी
मानवता की बगिया,
कब तक दामिनियां
दरिंदगी की शिकार होंगी..
कब होंगे हम इंसान..
आखिर कब..?
सुनील सत्यम
Tuesday, December 25, 2012
ये मौसम गुलाबी..
यहाँ हर जगह शरदोत्सव,
और ये मौसम गुलाबी..
उधर हड्डियों में गलन .
और उसकी तकदीर में खराबी.
यहाँ "अंगूरी" की आग,
वहां उसके फूटे भाग..
यहाँ देर तक अलाव होगा,
उसे चले जाना है आज रात ही,
सुबह उसका जलाव होगा..
Sunday, December 23, 2012
लखनवी गुलाबी ठण्ड
लखनवी गुलाबी ठण्ड..
गोमती नगर में हमारा होस्टल.
छुट्टियाँ और मै..
सिर्फ मै और दो चार मित्र
बाकी सब चम्पत..
श्यामलाल की बेड टी,
नाश्ता, खाना..
शाम को बेडमिन्टन कोर्ट
पर पसीना..
ठंडक गुलाबी से हिसाबी होने लगी..
कपडे गीले..चलो अब चाय पीले..
ठंडक गुलाबी नहीं है..
Monday, August 6, 2012
किसानों के लिए मासिक वेतन निर्धारित होना चाहिए.!!
खेत खलिहान और किसान की दशा सुधारने में सरकारी खेती, आमूलचूल परिवर्तन ला सकती है. इससे देश में उत्पादन की गुणवत्ता एवं गुणात्मकता भी बढ़ेगी. किसी फसल का अधिक्य होने पर उसके विनाश से भी बचा जा सकेगा.हर वर्ष देश में खरबों रुपये का खाद्यान्न भण्डारण के आभाव में नष्ट हो जाता है..
इस खेती में सरकार देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार फसल मानचित्र तैयार कराये और देश की आवश्यकता के हिसाब से किसी फसल के उत्पादन के लिए कुल भौगोलिक क्षेत्रफल निर्धारित कर दे. सरकार देश के किसानो को सब्सिडी के बजाय मुफ्त में बीज-खाद-पानी दे. किसी फसल की क्षेत्र विशेष में प्रचलित उत्पादन दर को मानक मान कर उत्पादन के लिए लक्ष्य निर्धारित किया जाए. उससे अधिक उत्पादन होने पर किसानो के लिए बोनस की भी व्यवस्था होनी चाहिए ताकि किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.
किसान को उसकी भूमि का बाजार की प्रचलित कीमतों पर वार्षिक या मासिक आधार पर किराया दिया जाये. और किसानों के लिए मासिक वेतन निर्धारित होना चाहिए. क्योंकि इस व्यवस्था में किसान को सरकारी कर्मचारी के रूप में रखा जायेगा.
सरकारी खेती में किसान अपने लिए या बाजार के लिए उत्पादन न करके सरकार के लिए उत्पादन करेगा. फसल कटाई के बाद किसानों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार रियायती दरों पर फसल देकर शेष फसल सरकार अपनी आवश्यकताओं के लिए प्राप्त कर ले.
यदि हम इस व्यवस्था को अपना ले तो आत्महत्या के लिए मजबूर किसानों को तो रहत मिलेगी ही साथ में मंदी जैसी आपात स्थितियों से बचा जा सकेगा. किसान एवं ग्रामीण गरीब की दशा भी सुधरेगी..इसके माध्यम से हम भूख के अभिशाप और कुपोषण जैसी स्थितियों से भी बच सकेंगे. यह एक नयी अर्थव्यवस्था की और एक सार्थक कदम भी होगा..
एक प्रकार से यह ग्रामार्थाशास्त्र की शुरुआत होगी. सरकारी खेती का क्रियान्वयन ग्राम पंचायतों के माध्यम से होना चाहिए. पंचायतों को प्रति वर्ष फसल विशेष के लिए सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य मिले. वेतन, बोनस एवं भूमि का मासिक/वार्षिक किराया भी पंचायतों के द्वारा ही सीधे किसानों को प्रदान किया जाना चाहिए.
कुंवर सुनील सत्यम.
इस खेती में सरकार देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार फसल मानचित्र तैयार कराये और देश की आवश्यकता के हिसाब से किसी फसल के उत्पादन के लिए कुल भौगोलिक क्षेत्रफल निर्धारित कर दे. सरकार देश के किसानो को सब्सिडी के बजाय मुफ्त में बीज-खाद-पानी दे. किसी फसल की क्षेत्र विशेष में प्रचलित उत्पादन दर को मानक मान कर उत्पादन के लिए लक्ष्य निर्धारित किया जाए. उससे अधिक उत्पादन होने पर किसानो के लिए बोनस की भी व्यवस्था होनी चाहिए ताकि किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.
किसान को उसकी भूमि का बाजार की प्रचलित कीमतों पर वार्षिक या मासिक आधार पर किराया दिया जाये. और किसानों के लिए मासिक वेतन निर्धारित होना चाहिए. क्योंकि इस व्यवस्था में किसान को सरकारी कर्मचारी के रूप में रखा जायेगा.
सरकारी खेती में किसान अपने लिए या बाजार के लिए उत्पादन न करके सरकार के लिए उत्पादन करेगा. फसल कटाई के बाद किसानों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार रियायती दरों पर फसल देकर शेष फसल सरकार अपनी आवश्यकताओं के लिए प्राप्त कर ले.
यदि हम इस व्यवस्था को अपना ले तो आत्महत्या के लिए मजबूर किसानों को तो रहत मिलेगी ही साथ में मंदी जैसी आपात स्थितियों से बचा जा सकेगा. किसान एवं ग्रामीण गरीब की दशा भी सुधरेगी..इसके माध्यम से हम भूख के अभिशाप और कुपोषण जैसी स्थितियों से भी बच सकेंगे. यह एक नयी अर्थव्यवस्था की और एक सार्थक कदम भी होगा..
एक प्रकार से यह ग्रामार्थाशास्त्र की शुरुआत होगी. सरकारी खेती का क्रियान्वयन ग्राम पंचायतों के माध्यम से होना चाहिए. पंचायतों को प्रति वर्ष फसल विशेष के लिए सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य मिले. वेतन, बोनस एवं भूमि का मासिक/वार्षिक किराया भी पंचायतों के द्वारा ही सीधे किसानों को प्रदान किया जाना चाहिए.
कुंवर सुनील सत्यम.
Friday, August 3, 2012
मै बलिदान से नहीं डरता , सरकार मुझे अस्पताल ले जाकर मार देना चाहती है
हम अभी कुछ भूले नहीं हैं. रामदेव वाले आन्दोलन की यादे अभी ताजी है..जब
जन आन्दोलन के सामने सरकार लगभग घुटने टेकने वाली थी..या कहे अगर बाबा का
आन्दोलन उनके छुपे राजनितिक अजेंडे के लिए नहीं होता..या कहे की वह वन मेन
आर्मी शो न होता..या कहे की बाबा अपने प्रवक्ता खुद ही न होते...बहुत सी
ऐसी बाते....न कहे तो...
कुल मिलाकर यदि उस रात कायरो की तरह महिलाओं के वस्त्र पहनकर बाबा रामदेव ने पीठ न दिखाई होती,,वो भागे नहीं होते तो तस्वीर कुछ और होती. उस समय पूरा देश दुखी था..एक आन्दोलन का बुरा अंत हुवा था..देश के चिंतको ने कहा था बाबा आखिर बाबा निकले , वहा आन्दोलन कारी नहीं है और बलिदान की उनकी सामर्थ्य नहीं है..वो डरपोक और कायर निकले..
टीम अन्ना ने बाबा से सबक लिया और इसने देश के सामने ऐसा ज़ाहिर किया की " हम आज़ादी की दूसरी लड़ाई लड़ रहे है,.." आन्दोलन का अंतिम चरण आते आते अरविन्द केज़ारिवाल इतने अधीर हो गए की अन्ना की जगह लेने के लिए उन्होंने अघोषित रूप से पूरा जोर लगा दिया..खुद को आन्दोलन का बड़ा नेता प्रस्तुत करने में वह सफल भी सिद्ध हुवे.
अरविन्द I R S है, दूरदृष्टि भी है, वे जानते थे की लोग बाबा की कायरता को भूले नहीं है. इसलिए उन्होंने जुलाई-अगस्त २०१२ के इस आन्दोलन में मंच से जनता की भावनाओं का खूब दोहन किया..और इस काम को अंजाम दिया सरकारी चिकित्सकों की इस राय ने कि अनशन के कारण अरविन्द की हालत बिगड़ रही है अतः उनको हॉस्पिटल में भारती करने कि जरुरत है.." इस बात का अरविन्द ने पूरा फायदा उठाने की कोशिश की और उन्होंने खुद को बलिदानी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की..उन्होंने मंच से जनता को बताया." आज तक जितने भी अनशनकारियों की मौत हुवी है वह अस्पताल जाकर ही हुवी है. और मै बलिदान से नहीं डरता , सरकार मुझे अस्पताल ले जाकर मार देना चाहती है, बलिदान और हत्या में फर्क होता है." इसप्रकार अरविन्द ने बिना किसी बलिदान के जनता को यह सन्देश दे दिया की वह बलिदान के लिए तैयार है..लेकिन सरकार उनकी हत्या करवाने की फ़िराक में है..
मुझे या मेरे जैसो को ऐतराज़ अरविन्द केज़रिवाल या टीम अन्ना द्वारा राजनितिक पार्टी के गठन को लेकर नहीं है...ऐतराज़ है तो इस बात पर की अपनी राजनितिक महावाकान्क्षाओं की पूर्ति के लिए उन्होंने जनता की भावनाओं का व्यापार किया. अरविन्द और किरण बेदी जैसे पूर्व प्रशाशकों ने यह बिना किसी पूर्व निर्धारित रणनीति के किया हो..इसमें मुझे पूरा संदेह है. इतिहास इस बात का भी गवाह है की जब जब जन आन्दोलनों का नेतृत्व उच्च वर्ग के हाथ में रहा है तब तब उन्होंने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए, आवश्यकता पड़ने पर आंदोलनों को गिरवी रख दिया था. अब रामदेव के पास फिर से हीरो बनने का मौका है...मैदान खाली है और खिलाडी केवल एक--बाबा रामदेव..देखते रहिये..
कुल मिलाकर यदि उस रात कायरो की तरह महिलाओं के वस्त्र पहनकर बाबा रामदेव ने पीठ न दिखाई होती,,वो भागे नहीं होते तो तस्वीर कुछ और होती. उस समय पूरा देश दुखी था..एक आन्दोलन का बुरा अंत हुवा था..देश के चिंतको ने कहा था बाबा आखिर बाबा निकले , वहा आन्दोलन कारी नहीं है और बलिदान की उनकी सामर्थ्य नहीं है..वो डरपोक और कायर निकले..
टीम अन्ना ने बाबा से सबक लिया और इसने देश के सामने ऐसा ज़ाहिर किया की " हम आज़ादी की दूसरी लड़ाई लड़ रहे है,.." आन्दोलन का अंतिम चरण आते आते अरविन्द केज़ारिवाल इतने अधीर हो गए की अन्ना की जगह लेने के लिए उन्होंने अघोषित रूप से पूरा जोर लगा दिया..खुद को आन्दोलन का बड़ा नेता प्रस्तुत करने में वह सफल भी सिद्ध हुवे.
अरविन्द I R S है, दूरदृष्टि भी है, वे जानते थे की लोग बाबा की कायरता को भूले नहीं है. इसलिए उन्होंने जुलाई-अगस्त २०१२ के इस आन्दोलन में मंच से जनता की भावनाओं का खूब दोहन किया..और इस काम को अंजाम दिया सरकारी चिकित्सकों की इस राय ने कि अनशन के कारण अरविन्द की हालत बिगड़ रही है अतः उनको हॉस्पिटल में भारती करने कि जरुरत है.." इस बात का अरविन्द ने पूरा फायदा उठाने की कोशिश की और उन्होंने खुद को बलिदानी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की..उन्होंने मंच से जनता को बताया." आज तक जितने भी अनशनकारियों की मौत हुवी है वह अस्पताल जाकर ही हुवी है. और मै बलिदान से नहीं डरता , सरकार मुझे अस्पताल ले जाकर मार देना चाहती है, बलिदान और हत्या में फर्क होता है." इसप्रकार अरविन्द ने बिना किसी बलिदान के जनता को यह सन्देश दे दिया की वह बलिदान के लिए तैयार है..लेकिन सरकार उनकी हत्या करवाने की फ़िराक में है..
मुझे या मेरे जैसो को ऐतराज़ अरविन्द केज़रिवाल या टीम अन्ना द्वारा राजनितिक पार्टी के गठन को लेकर नहीं है...ऐतराज़ है तो इस बात पर की अपनी राजनितिक महावाकान्क्षाओं की पूर्ति के लिए उन्होंने जनता की भावनाओं का व्यापार किया. अरविन्द और किरण बेदी जैसे पूर्व प्रशाशकों ने यह बिना किसी पूर्व निर्धारित रणनीति के किया हो..इसमें मुझे पूरा संदेह है. इतिहास इस बात का भी गवाह है की जब जब जन आन्दोलनों का नेतृत्व उच्च वर्ग के हाथ में रहा है तब तब उन्होंने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए, आवश्यकता पड़ने पर आंदोलनों को गिरवी रख दिया था. अब रामदेव के पास फिर से हीरो बनने का मौका है...मैदान खाली है और खिलाडी केवल एक--बाबा रामदेव..देखते रहिये..
Monday, July 2, 2012
आज मेघा ऐसे बरसो.
आज मेघा ऐसे बरसो.
याद रहे जो बरसों.
चलानी है आज मुझे,
वो कागज़ की कश्ती.
नहाना है बूंदों पे,
लोटा दो वो बचपन की मस्ती.
वो पानी में उछलना ,
वो कीचड़ में फिसलना,
वो देर से आना वापस घर को.
आज मेघा ऐसे गरजो,
याद रहे जो बरसों..
........कुंवर सत्यम.
याद रहे जो बरसों.
चलानी है आज मुझे,
वो कागज़ की कश्ती.
नहाना है बूंदों पे,
लोटा दो वो बचपन की मस्ती.
वो पानी में उछलना ,
वो कीचड़ में फिसलना,
वो देर से आना वापस घर को.
आज मेघा ऐसे गरजो,
याद रहे जो बरसों..
........कुंवर सत्यम.
Saturday, April 28, 2012
Friday, January 20, 2012
जातीय समीकरण और उत्तर प्रदेश चुनाव
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है. स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मीडिया की भूमिका आज के माहोल में और ज्यादा बढ़ गयी है..उत्तर प्रदेश सहित अन्य ५ राज्यों में चुनाव होने वाले है..लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव होते है चुनाव..यह देख कर दुःख होता है की चुनावी माहोल में धरातली मुद्दों को उभारने के बजाय मीडिया सिर्फ मसाला तलासती नजर आ रही है. उत्तर प्रदेश की हालत इतनी ख़राब दिख रही है की रचनात्मक एवं धरातली मुद्दे गौण हो गए है..विकास यहाँ मुद्दे के रूप में स्थापित नहीं हो पाया है. भ्रष्टाचार का मुद्दा यहाँ निस्तेज पड़ा दिखाई दे रहा है.
ऐसा लगता है की ये चुनाव उत्तर प्रदेश के लिए दुर्भाग्य का दरवाजा खोल देंगे ..
मुद्दे के आभाव में सिर्फ जातीय समीकरण ही चुनाव चर्चा का विषय बने हुवे है.. पार्टियाँ जातीय समीकरण के बहाने चुनावी वैतरणी पार करने की फ़िराक में है जो सिर्फ दुर्भाग्य ही ला सकता है.
बहन जी के चुनावी पंडितों ने २००७ के चुनावों का विश्लेषण सामाजिक इंजीनियरिंग के रूप में प्रचारित किया था, जो एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था. जब कि मेरा मत है कि कथित सामाजिक इंजीनियरिंग का परिणाम नहीं था कि मायावती जी को पूर्ण बहुमत मिला था. बल्कि इसका सबसे बड़ा कारण था कम मतदान होना. २००७ के चुनावों में ४५.९५% मत पड़े थे.
दलित और अति-पिछड़ा वोटर बसपा को वोट डालता है.गत चुनाव चिलचिलाती गर्मी के मौसम में हुवे थे जिसमे भाजपा और अन्य पार्टियों को वोट डालने वाला आराम पसंद वोटर बूथ तक ही नहीं पहुंचा . इसके विपरीत मेहनतकश दलित और पिछड़े मतदाताओं ने बसपा के लिए वोट किया और उसे पूर्ण बहुमत तक पहुँचाया.
गत चुनावों में हुवे मतदान के आंकड़ों पर नजर डाले तो बात स्पष्ट हो जाएगी.
वोटर मत प्रतिशत
अति-पिछड़े और दलित 80% मतदान
मुस्लिम 5०%
सवर्ण 27%
उच्च-पिछड़ा 27%
कुल मतदान ४६%
इस बार चुनाव के समय को देखते हुवे लगता है कि मत प्रतिशत ६० से ६५ % के बीच पहुँच जायेगा. अगर ऐसा हुवा तो बहन जी राजनितिक यात्रा कठिन लगती है.क्योंकि बढ़ा हुवा मत प्रतिशत ज्यादातर सपा और भाजपा को लाभ कि स्थिति में पहुंचा देगा.यदि मत प्रतिशत में होने वाली बढोतरी से स्वर्ण ५२ से ५५%, उच्च-पिछड़ा ५० से ५७% तक पहुँच गया. यद्यपि मुस्लिम मत प्रतिशत में भी ५ से ८ % कि मत वृद्धि कि संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.
बढे हुवे मत प्रतिशत का अल्प लाभ ही बसपा को मिलने कि संभावना है. सवर्णों के बढे हुवे मतदान का सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा.जबकि उच्च-पिछड़ों के बढे मत प्रतिशत का लाभ सपा और भाजपा दोनों को मिलेगा. ऐसे में यदि पहले और दूसरे नंबर पर भाजपा और सपा आसीन हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.बसपा ९० से ११० सीटो तक सिमट सकती है.
कांग्रेस ३५ से ४२ सीते प्राप्त कर सकती है. कुल मिलाकर राज्य का भाग्य पस्त करने में यह चुनाव अहम् भूमिका निभाएगा.
कुंवर सत्यम.
ऐसा लगता है की ये चुनाव उत्तर प्रदेश के लिए दुर्भाग्य का दरवाजा खोल देंगे ..
मुद्दे के आभाव में सिर्फ जातीय समीकरण ही चुनाव चर्चा का विषय बने हुवे है.. पार्टियाँ जातीय समीकरण के बहाने चुनावी वैतरणी पार करने की फ़िराक में है जो सिर्फ दुर्भाग्य ही ला सकता है.
बहन जी के चुनावी पंडितों ने २००७ के चुनावों का विश्लेषण सामाजिक इंजीनियरिंग के रूप में प्रचारित किया था, जो एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था. जब कि मेरा मत है कि कथित सामाजिक इंजीनियरिंग का परिणाम नहीं था कि मायावती जी को पूर्ण बहुमत मिला था. बल्कि इसका सबसे बड़ा कारण था कम मतदान होना. २००७ के चुनावों में ४५.९५% मत पड़े थे.
दलित और अति-पिछड़ा वोटर बसपा को वोट डालता है.गत चुनाव चिलचिलाती गर्मी के मौसम में हुवे थे जिसमे भाजपा और अन्य पार्टियों को वोट डालने वाला आराम पसंद वोटर बूथ तक ही नहीं पहुंचा . इसके विपरीत मेहनतकश दलित और पिछड़े मतदाताओं ने बसपा के लिए वोट किया और उसे पूर्ण बहुमत तक पहुँचाया.
गत चुनावों में हुवे मतदान के आंकड़ों पर नजर डाले तो बात स्पष्ट हो जाएगी.
वोटर मत प्रतिशत
अति-पिछड़े और दलित 80% मतदान
मुस्लिम 5०%
सवर्ण 27%
उच्च-पिछड़ा 27%
कुल मतदान ४६%
इस बार चुनाव के समय को देखते हुवे लगता है कि मत प्रतिशत ६० से ६५ % के बीच पहुँच जायेगा. अगर ऐसा हुवा तो बहन जी राजनितिक यात्रा कठिन लगती है.क्योंकि बढ़ा हुवा मत प्रतिशत ज्यादातर सपा और भाजपा को लाभ कि स्थिति में पहुंचा देगा.यदि मत प्रतिशत में होने वाली बढोतरी से स्वर्ण ५२ से ५५%, उच्च-पिछड़ा ५० से ५७% तक पहुँच गया. यद्यपि मुस्लिम मत प्रतिशत में भी ५ से ८ % कि मत वृद्धि कि संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.
बढे हुवे मत प्रतिशत का अल्प लाभ ही बसपा को मिलने कि संभावना है. सवर्णों के बढे हुवे मतदान का सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा.जबकि उच्च-पिछड़ों के बढे मत प्रतिशत का लाभ सपा और भाजपा दोनों को मिलेगा. ऐसे में यदि पहले और दूसरे नंबर पर भाजपा और सपा आसीन हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.बसपा ९० से ११० सीटो तक सिमट सकती है.
कांग्रेस ३५ से ४२ सीते प्राप्त कर सकती है. कुल मिलाकर राज्य का भाग्य पस्त करने में यह चुनाव अहम् भूमिका निभाएगा.
कुंवर सत्यम.
Sunday, January 15, 2012
चुनाव आयोग की मूर्तियां...!
चुनाव आयोग को इसकी वास्तविक महत्ता का भान तत्कालीन चुनाव आयुक्त टी.एन . शेषण ने कराया था. तब से लेकर आज तक यह चुनावोत्सव के सफलता पूर्वक कई aayojan कर चुका है.
हाल में ५ राज्यों में चुनावों का आयोजन होने जा रहा है. जिनकी तयारी में चुनाव आयोग कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता है. अनेक महत्वपूर्ण फैसले इस सन्दर्भ में चुनाव योग ले चुका है.
लेकिन इसी बीच एक हास्यास्पद और सनक से भरा फैसला भी योग ने लिया जो किसी भी तरह से तार्किक नहीं है. यह फैसला है हाथियों की मूर्तियों को ढकने का. मूर्तियों को ढकने में लाखो रुपये का खर्चा आयेगा जो सिर्फ फिजूल खर्च माना जाना चाहिए. हाथी की या किसी अन्य चुनाव चिन्ह की प्रतिमा बना देने मात्र से वोट नहीं मिलते..आज का मतदाता पहले से कही अधिक जागरूक है. उसे पता हिया की वह किसे और क्यों वोट देगा.
सभी व्यक्तियों के दो दो हाथ हैं जो कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है..लेकिन फिर भी लोग सिर्फ इसी वजह से कांग्रेस को वोट नहीं दे देते..
मूर्ती ढकने का मूर्खता पूर्ण फैसला लेने से चुनाव आयोग बसपा का चुना प्रचार ही कर रहा है..जब से यह खबर बनी तब से अनेक बार टीवी चैनल हाथी की मूर्तियों का प्रसारण कर चुके है और अनेक बार समाचार पत्र इनकी तस्वीरे प्रकाशित कर चुके है..यहाँ काम अगर करना ही था तो इन मूर्तियों की तस्वीरो से सम्बंधित खबरे प्रकाशित होने एवं उनके प्रसारण को रोकने की व्यवस्था चुनाव आयोग क्यों नहीं कर पाया. क्या एक चुनाव आयुक्त की सनक पूरा करने का खर्च उठाने के लिए देश की जनता विवश है..
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी लोकतंत्र के सबसे बड़े रक्षक की भूमिका निभाने की है..मदारी की नहीं...
कुंवर सत्यम.
Tuesday, November 29, 2011
काला धन या कला धन....?
देश में आजकल काला धन चर्चा में है. बड़ी बड़ी बाते हो रही है. रामदेव और आडवाणी जी विरोध में ताल थोक रहे है कि विदेश से काला धन वापस लाया जाये. सरकार के पसीने छूट रहे है, उसे आशंका है कि देश कि जनता कही इसकी भारी कीमत न वसूल कर ले...चुनाव में.
काला धन क्यों उत्पन्न हो गया इससे जनता को कुछ खास लेना देना नहीं है. कुछ अ[वादों को छोड़ दे ( नेताओं के पैसे को ) तो विदेश में जमा अधिकांश काला धन टैक्स व्यवस्था में अन्तर्निहित खामियों के कारन पैदा हुवा है..ये उस समय में इकठ्ठा हुवा जब फेरा जैसे कानूनों का दौर था.टैक्स डरे बहुत ज्यादा थी.सुविधाओं और प्रोत्साहन के नाम पर बाबुओं कि दुत्कार के आलावा कुछ नहीं था.. ऐसे में अपनी मेहनत कि कमाई कोई टैक्स के रूप में क्यों देना चाहेगा . नतीजा काला धन के रूप में आया..हम इसे कला धन भी कह सकते है.. क्योंकि इसे इसके मालिकों ने अपनी कला से कमाया था जिसे वे ऐसी निकम्मी सरकार को नहीं देना चाहते थे जो बदले में उनको कोई भी सुविधा न देती हो..जिसके नेता चोर हो. और इतना ही नहीं गोपनीयता के नाम पर उनके सारे काले कारनामों को सुरक्षा का मजबूत आवरण उपलब्ध हो..घोटाले बाज नेताओं का मकसद ही जनता कि गाढ़ी कमाई को चाट कर जाना रहा हो..
विदेश में जमा काले धन को दो वर्गों में बांटा जा सकता है.
१. ऐसा धन जो ऊंची टैक्स दरो से बचने के लिए विदेश में जमा किया गया है..यह मुख्य रूप से व्यवसाइयों एवं उद्योगपतियों का पैसा है.
इस पैसे को विदेश से भारत लाकर आज कि टैक्स दरों के हिसाब से टैक्स काटकर इसके मालिको को सौंप देना चाहिए ताकि यह पैसा देशी अर्थव्यस्था को मजबूती प्रदान कर इसके साथ यह शर्त होनी चाहिए कि इस पैसे का उपयोग ये लोग ग्रामीण उद्योगीकरण, ग्रामीण सड़को एवं परिवहन के उन्नतीकरण एवं ग्रामीण क्षेत्रों के विद्युतीकरण में करेंगे.
२. दूसरी श्रेणी में ऐसा पैसा है जो नेताओं ने इस देश को लूटकर कमाया है. ऐसे धन को वापस लाकर राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर देना चाहिए. देश को लूटने वाले इन नेताओं के विरुद्ध कठोर क़ानूनी कार्यवाही कि जनि चाहिए. इस पैसे का उपयोग देश में आधारभूत सरंचना को मजबूत करने, कृषि अर्थव्यवस्था में अनुसन्धान एवं गरीबी उन्मूलन योजनाओं पर खर्च करना चाहिए.
उपरोक्त के अतिरिक्त काले धन का एक और वर्ग है जिस के बारे में कोई बात करने को तैयार नहीं है..यह है इस देश के मठ, मंदिर मस्जिद,आश्रमों चर्चों और गुरद्वारों में दबा अथाह धन का भंडार..सरकार सभी दलों की सहमति से देश के सभी धार्मिक स्थानों को वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर ट्रस्टों को सौंप दे ताकि वहां चल रही धार्मिक लूट को रोक कर इस पैसे का धार्मिक स्थानों के विकास एवं सञ्चालन के साथ साथ देश की आर्थिक उन्नति के लिए भी प्रयोग किया जा सके. ऐसा करने से इन धार्मिक स्थानों पर कार्यरत लोगो को तो सरकारी सरंक्षण मिलेगा ही और बहुत से लोगो को भी वहां रोजगार दिया जा सकता है..
कुंवर सत्यम..
Wednesday, November 23, 2011
ईंट की गाड़ी.
गुल्ली डंडा ,
पिट्ठू जिंदाबाद.
गोल का टोरा..
चोट गोली पिल..
रेत से वो घर बनाना.
कंदूरी से भैंस -बैल बनाना.
ईंट की गाड़ी.
मुह से घुरघुर
करके गाड़ी चलने की,
आवाज निकालना..
जितना आनंद देता था
उतना आज सचमुच की लग्जरी
गाड़ी चलाने में भी नहीं आता.
क्यों नहीं बचपना
जवान हो जाता
अपनी उसी सादगी के साथ.
कुंवर सत्यम.
Sunday, November 13, 2011
TET EXAM...
केंद्र के साथ साथ राज्यों में भी TET परीक्षा लागू कर दी गई है. बेरोजगारी का आलम है की आप किसी भी चीज के लिए कोई परीक्षा पद्दति लागु कर दे तो दो चार लाख की भीड़ आराम से मिल जाएगी. जिस किसी भी महाशय ने शिक्षकों की योग्यता परखने के लिए टेट का सुझाव दिया होगा वह भी अपने आप को धन्य मान रहा होगा की उसका दिया सुझाव लागू हो गया है..
टेट की नौटंकी की कीमत लाखों बेरोजगार युवक आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार से चुकायेंगे. टेट एक नौटंकी परीक्षा है यह किसी रोजगार की गारंटी नहीं है. tet का अर्थ है teacher 's elegibility test अर्थात अध्यापक पात्रता (योग्यता) परीक्षा . यह परीक्षा पास करने वालो को योग्यता का प्रमाण पत्र मिलेगा जो इस बात का प्रमाण होगा का certificate धारक अध्यापक नियुक्त किये जाने के योग्य है..लेकिन उसकी योग्यता का यह प्रमाण पत्र उसे जीवनभर कही अध्यापक नियुक्त करवा सकेगा इस बात की कोई गारंटी नहीं है.यानि कि जीवन भर युवक को हताशामय जिंदगी जीने की गारंटी जरुर मिलेगी...धारक को हमेशा एक बात सालती रहेगी की योग्य होने के बावजूद भी उसके पास नौकरी नहीं है.
टेट का दूसरा पहलु यह है की टेट की परीक्षा पास करने के बाद भी प्रमाण पत्र धारक को नोकरी पाने के लिए दोबारा परीक्षा पास करनी होगी. जब दोबारा, तिबारा परीक्षा पास करके ही नोकरी मिलनी है तो टेट के नाम पर युवा शक्ति की योग्यता का मखौल क्यों.?
हम सब जानते है की आज B.Ed. करने के नाम पर हजारो संस्थान कुकुरमुत्तों की भांति सड़क के दोनों किनारों पर उग आये है. वहां बी.एड. की डिग्री कैसे मिलाती है यह किसी से छुपा नहीं है..उत्तर प्रदेश सरकार ने विशिष्ट बी.टी.सी की शुरुवात की थी ..जिसने प्रदेश में हजारो युवको को रोजगार तो दिया लेकिन उनकी योग्यता आंकने के लिए कोई परीक्षा क्यों नहीं ली गई ? इस बात पर कोई प्रशन कही किसी ने नहीं पूछा. जब यही सब होना है तो फिर टेट का नाटक क्यों? और अगर टेट परीक्षा से योग्यता की परीक्षा होनी है ( जो संभव है ) तो फिर टेट पास करने के बाद भी नौकरी की गारंटी क्यों नहीं.?
सवाल यह है की युवा शक्ति की शक्ति का मखौल कब तक उड़ाया जाता रहेगा..क्या वास्तव में कोई राजनितिक दल युवा शक्ति की शक्ति का राष्ट्रहित में सदुपयोग कर पायेगा.
कुंवर सत्यम.
Tuesday, November 1, 2011
दिग्विजय को चाहिए चंदे का हिसाब..
दिग्विजय सिंह अन्ना आन्दोलन के धुर विरोधी है. उन्होंने हमेशा आन्दोलन की निंदा की है. उनका हर संभव प्रयास आन्दोलन को किसी भी प्रकार से बदनाम करने का रहा है. अन्ना आन्दोलन को उन्होंने चवन्नी का दान नहीं दिया. लेकिन उन्हें आन्दोलन को मिले चंदे का हिसाब चाहिए. एक-एक पाई का हिसाब चाहिए दिग्विजय को.. देश की जनता , जिसने १५ दिन के अन्दर आन्दोलन को लगभग ३ करोड़ रुपये का चंदा दिया, उसने कभी आन्दोलन से चंदे के पैसे का हिसाब नहीं माँगा. जनता को अपने सामाजिक नेतृत्व पर भरोसा है इसीलिए उसने आन्दोलनकारियों से हिसाब नहीं माँगा.
अच्छा रहता की दिग्विजय सिंह ने दिल्ली में हुए commanwealth games में हुए खर्च का हिसाब शीला दीक्षित से माँगा होता. कांग्रेस को मिले राजनितिक चंदे का कभी हिसाब माँगा होता. अच्छा रहता उन्होंने दिल्ली में बन रहे सिग्नेचर ब्रिज पर हो रही लूट का दिल्ली की मुख्यमंत्री से हिसाब माँगा होता.
ऐसे बहुत से हिसाब है जो यदि दिग्विजय सिंह ने मांगे होते तो उनके साथ-साथ कांग्रेस की छवि भी सुधरी होती..
कुंवर सत्यम
अच्छा रहता की दिग्विजय सिंह ने दिल्ली में हुए commanwealth games में हुए खर्च का हिसाब शीला दीक्षित से माँगा होता. कांग्रेस को मिले राजनितिक चंदे का कभी हिसाब माँगा होता. अच्छा रहता उन्होंने दिल्ली में बन रहे सिग्नेचर ब्रिज पर हो रही लूट का दिल्ली की मुख्यमंत्री से हिसाब माँगा होता.
ऐसे बहुत से हिसाब है जो यदि दिग्विजय सिंह ने मांगे होते तो उनके साथ-साथ कांग्रेस की छवि भी सुधरी होती..
कुंवर सत्यम
Saturday, October 29, 2011
जिन्ना भारत विभाजन के लिए जिम्मेदार नहीं थे.
अन्ना के संघ से संबंधों पर दिग्विजय सिंह ने ऐसे हाय तौबा मचा रखी है जैसे कि संघ ही अल-कायदा हो.
यह समझ से परे है कि दिग्विजय सिंह ओसामा बिन लादेन जैसे कुख्यात आतंकवादी को तो ओसामा जी कहकर संबोधित करते है और संघ से इतनी चिढ रखते है. देश का पढ़ा लिखा मुस्लिम वर्ग भी समझता है कि क्या संघ उनके खिलाफ है.? दिग्विजय सिंह की यह हाय तौबा मुस्लिम वोटो के लिए एक नौटंकी है.. लेकिन कांग्रेस इस समय आपातकाल के समय की लोकप्रियता के स्तर से भी न्यूनतम स्तर पर है..
दिग्विजय सिंह को शुभ कामनाये कि वह कांग्रेस की लोकप्रियता के गिरते ग्राफ को ऊपर उठा सके. इसके लिए जरुरी है कि उन्हें अपने बयानों को और ज्यादा घटियातम बनाना होगा.
आनेवाले दिनों में दिग्विजय सिंह कुछ और बयान दे सकते है...जैसे..
* जिन्ना भारत विभाजन के लिए जिम्मेदार नहीं थे. मुस्लिम लीग कांग्रेस जितनी ही देशभक्त पार्टी थी. हिन्दू महासभा और संघ ने उसे विभाजन का मार्ग चुनने के लिए मजबूर किया था.
* आपातकाल लगने के पीछे संघ कि गतिविधियाँ जिम्मेदार थी. संघ ने इंदिरा जी कि हत्या का षड्यंत्र रचा था जिसकी खबर मिलने पर इंदिरा जी ने भय के कारण आपातकाल कि घोषणा की थी.
* भारत-पाक युद्धों के लिए संघ ही जिम्मेदार था. पाकिस्तान कि मंशा भारत पर आक्रमण करना नहीं था. क्योंकि संघ हिंदुस्तान के मुस्लिमो का कत्ले-आम करना चाहता था अतः उनकी रक्षा के लिए ही पाक ने भारत पर आक्रमण किया था.
* कारगिल युद्ध का षड़यंत्र तत्कालीन भाजपा सरकार ने अपनी लोक प्रियता बढ़ाने के लिए किया था. कश्मीर में उस समय पाकिस्तान कि और से कोई घुसपैठ नहीं हुई थी.. भाजपा ने जेलों में बांध पाकिस्तानी कैदियों को मारकर यह दिखाया था कि ये वह घुसपैठिये है जिनकी कारगिल युद्ध में मोत हुई है.
* भारतीय संसद पर हमला, मुंबई आतंकवादी हमलो, दिल्ली विस्फोटों के पीछे संघ परिवार का हाथ है.. आगामी चुनावों को देखते हुए संघ देश के विभिन्न हिस्सों में विस्फोटों कि साजिश रच रहा है.
* संघ मेरी हत्या का षड्यंत्र रच रहा है. मेरे ऊपर हमला हो सकता है. इसके लिए संघ जिम्मेदार होगा..
* कोमनवैल्थ खेलों में हुए घोटाले की लिए भाजपा सरकार जिम्मेदार है. भाजपा सरकार के समय में भारत को इन खेलो की मेजबानी सौंपी गई थी. तभी इस घोटाले की नीव पड़ गई थी. कलमाड़ी निर्दोष है.
इस प्रकार के बयान आने वाले दिनों में यदि आपको सुने पड़े तो आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए..
कुंवर सत्यम.
Friday, October 28, 2011
मनु अभी जिन्दा हैं.
मनु अभी जिन्दा हैं..राजा ने उन्हें आखिरकार जिन्दा कर ही दिया..
मायावती बहन ने मनु को इतनी गाली दे दी थी की उनकी मौत ही हो गई थी,, ऐसा लगने लगा था.अपने राजनितिक सफ़र को गति प्रदान करने के लिए मायावती जी के पास कोई मुद्दा नहीं था.. उनके पास यदि कुछ था तो वह था सदियों से दमित समाज को आत्मविश्वास से भर देने वाले कुछ नारे..तिलक,तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार..और मनु को ज्यादा से ज्यादा गलियों से संबोधित करना.. दलित वोट बैंक को संगठित करने के बाद मायावती ने सर्वसमाज की वैतरणी से राजनितिक दरिया को पार करके सिंहासन सुख चखा ...सर्वसमाज की बाते होने लगी तो मनु महाराज गौण हो गए.हम तो भूल ही गए थे मनु को..
लेकिन अब महाराजा दिग्विजय सिंह ने मनु को पुनरजीवित कर दिया है.मनु ने लगभग ३५० ईस्वी के आस पास कानून की पुस्तक मनुस्मृति की रचना की थी .इसमें उन्होंने जाति आधारित दंड संहिता की व्यवस्था की थी..मै समझता हूँ इस संदर्भ में अधिक गहराई में जाने की जरुरत नहीं है.
अब जब सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था तो राजा दिग्विजय सिंह को मनु की जरुरत महसूस हुई . दिग्विजय सिंह राजा है तो उन्होंने क़ानूनी सलाहकार की जरुरत पड़ती ही है. दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव के व्यवसायिक रूप से चिढ़ते है, वे उन्हें दण्डित करना चाहते है. लेकिन गलती से आज भारत में लोक-तंत्र है अतः राजा साहब यूँ ही किसी को पकड़-कर दण्डित नहीं कर सकते है. ऐसे में वह सिर्फ किस स्थिति में किस व्यक्ति को क्या दंड दिया जाना चाहिए, यही व्यक्त कर सकते है. भारतीय लोक-तंत्र में दिग्विजय सिंह जी जैसे कुछ लोग राज-तंत्र के अंतिम स्तम्भ है. अतः इनका राज-धर्म बनता है की ये राज-तंत्र की आत्मा को जिन्दा रखे.यह काम सिर्फ बयानबाजी से संभव है.. और यह काम राजा साहब बखूबी कर रहे है. राजा साहब ने मनुस्मृति से संदर्भ देते हुवे कहा है की ' यदि कोई व्यक्ति सन्यासी के वेश में व्यवसाय करे तो राजा का धर्म है की वह उसके गले में भारी पत्थर बाँध कर उसे नदी में डूबा दे,."
दिग्विजय जी के राज-तंत्र में विरोधी आवाज के लिए कोई स्थान नहीं है..यही राजतन्त्र की वास्तविक आत्मा है. यदि दिग्गी हिंदुस्तान के वास्तविक राजा होते तो सबसे पहले RSS को नेस्तनाबूद कर दिया जाता.भाजपा सहित तमाम विपक्षी दलों को समाप्त कर दिया जाता.हिंदुस्तान में सिर्फ एक दल होता..कांग्रेस..
रामदेव, अन्ना आदि कोई भी व्यक्ति यदि सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के खिलाफ बोलेगा तो उसे
येन-केन-प्रकरणेंन बदनाम करके ठिकाने लगाने के समस्त प्रबंध किये जायेंगे. दिग्गी साहब बखूबी जानते है की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से प्राप्त सत्ता में राजतंत्र की चासनी कैसे लगाई जा सकती है. सत्ता प्रतिष्ठान का प्रयोग लोकतंत्र को बंधक बनाने में कैसे किया जा सकता है , यह भी वह जानते है. जो भी लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना आदि के साथ खड़े होंगे, उनसे जुड़े सारे ऐसे दस्तावेज ढूंढ निकाले जायेंगे जो उन्हें नंगा कर सके.बस टिकट में २ रुपये बचा लेने तक की तुलना भी कलमाड़ी जैसे माननीयों के घपलों से कर दी जाएगी.
इस देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आज अगर कोई खड़ा है तो वह सोनिया जी और कांग्रेस है, ऐसा दिग्गी साहब का मानना है. यह सही भी है क्योंकि कई कांग्रेसी इस समय तिहाड़ में छुट्टियाँ बिता रहे है. कांग्रेस उन्हें जेल जाने से रोक तो नहीं सकती थी लेकिन उनके जेल जाने को राजनितिक रूप से भुनाया तो जा ही सकता है.. दिग्गी महाराज कलमाड़ी के लिए सार्वजनिक रूप से टीवी पार दुवा कर रहे है की वह अपने आप को निर्दोष साबित कर सके.
मैंने पहले भी कहा है की देश में दिग्विजय-वाद का उदय हो रहा है. दिग्विजय-वाद की आत्मा है- लोकतंत्र के साथ राजतन्त्र का काकटेल. इसमे हमें मनु की जरुरत हमेशा रहेगी ही. दिग्विजय-वाद कभी मनु को मरने ही नहीं देगा. अब हमें देखना यह है की हमेशा मनु की मुखर विरोधी रही बहन जी इस के साथ कैसे सामंजस्य बैठाती है.
भारत अब दुनिया में गांधीवाद के साथ-साथ दिग्विजय-वाद के लिए भी जाना जायेगा.
कुंवर सत्यम.
Subscribe to:
Posts (Atom)

