यह एक कोरी अकादमिक एवं कृत्रिम बहस है कि क्या आतंकवाद का कोई मज़हब होता है ?
भले ही आतंकवाद को कोई मज़हब हो या न हो लेकिन हर आतंकवादी का अपना एक सुनिश्चित मजहब होता है।उसके अपने धार्मिक विचार और उद्देश्य होते है जिनसे कुप्रेरित होकर वह आतंकी घटनाओं को अंजाम देता है। अधिकांश आतंकवादी कथित जेहादी है और ज़ेहाद आतंक के बिना नहीं हो सकता है।
ढाका की आतंकवादी घटना ने बता दिया है कि आतंकवाद न केवल हमारे दरवाजे पर पुरजोर दस्तक दे रहा है वरन घर में घुसकर हमारी रेकी भी कर रहा है।
अपने निजी स्वार्थो के कारण जो दुनिया आज तक आतंकवाद को परिभाषित ही नहीं कर पाई है उससे आतंकवाद का संगठित मुकाबला करने की उम्मीद पालना बेवकूफी होगी।
यदि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं है तो फिर कैसे ओवैशी ISIS आतंकियों की मदद करने की सार्वजनिक घोषणा कर देते हैं।कमाल की बात तो यह है कि कोई उनकी निंदा तक नहीं कर रहा है।
राजनितिक नेतृत्व से किसी उम्मीद करने की बजाय हमें न केवल अपने स्वाभिमान व आत्मरक्षा के लिए स्वयं तैयार रहना होगा वरन अपने पडोसी की भी चिंता करनी होगी।पड़ोसी आज आपदा में है तो कल हमारी ही बारी है।।।
#निजीविचारसत्यम
Saturday, July 2, 2016
आतंकवाद का मजहब ?
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