आगे बढना है तो पहले खुद से आगे निकलना होगा।यदि एक पावन लक्ष्य लेकर,सेवा भाव से हम आगे बढना चाहते है तो हमारा सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी तो हम खुद होते हैं।हम अपने कार्य पर केंद्रित होने के बजाय अपनी ऊर्जा को दूसरों की कमियां गिनाने और उजागर करने में नष्ट करने में लगा देते हैं।जब हम कोई लक्ष्य निर्धारित करते है तो हमसे प्रतियोगिता रखने वाले लोग उसी तरह का लक्ष्य की अपने लिए चर्चा करने लगते है।ऐसी चर्चा सुनकर एक स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया हमारे मन में आती है और हम उस व्यक्ति की निंदा में लिप्त हो जाते है जिससे हमारी आंतरिक सकारात्मक ऊर्जा क्षय होने लगती है।हमारा प्रतिद्वंदी उस लक्ष्य में कितना सफल होता है यह एक अलग बात है लेकिन 'ईर्ष्या के नकारात्मक बल के कारण'हमारी लक्ष्य यात्रा गतिहीन होने लगती है।
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