भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए मानसिकता में बदलाव जरूरी : सुनील सत्यम
भ्रष्टाचार रोकने
में कई बाधाएं
भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध लड रहे देश के
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी इस लड़ाई में सैनिक और सेनापति सब कुछ अकेले ही दिखाई
दे रहे हैं l यही हाल उत्तर प्रदेश में भी दिखाई दे रहा है जहाँ प्रदेश के
मुख्यमंत्री महंत आदित्यनाथ योगी जी अकेले ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा संभाले
हुए है l देश उस दौर से गुजर रहा है जहाँ भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में शामिल
होकर हर कोई भ्रष्टाचार के विरुद्ध बुलंद आवाज में नारेबाजी करना चाहता है लेकिन
वह इससे ज्यादा भूमिका निभाने को तैयार नही है l अपनी बारी आने पर भ्रष्टाचार के
विरुद्ध धरनारत अधिकांश व्यक्ति चुपचाप अपनी तिजौरी भरने का कोई नैतिक-अनैतिक मार्ग
छोड़ना नही चाहते है l
भ्रष्टाचार एक शाश्वत सत्य है जिसको समूल
नष्ट करना तब तक असंभव है जब तक व्यक्ति की मानसिकता में अमूल-चुल परिवर्तन न हो l
अपने आप को सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र की संतान घोषित करने वाले भी जरूरत पड़ने पर
अपना काम निकालने के लिए स्वयं बदले में रूपये या अमूल्य उपहार का प्रलोभन देने
में संकोच नही करते हैं l
शासन तंत्र से
भ्रष्टाचार समाप्त करने में कई बाधाएं हैं l जहाँ निर्णय में विवेक का पुट ज्यादा
होता है वहां भ्रष्टाचार पनपने की संभावनाएं अधिक बलवती होती हैं l जब तक सरकार
निर्णयों के सम्बन्ध में कोई निर्धारित प्रारूप लेकर नही आती है तब तक विवेक की आड़
में भ्रष्टतंत्र द्वारा निरीह जनता का खून चूसा जाता रहेगा l प्रदेश में भूमि
हस्तांतरण में दाखिल-ख़ारिज के मामलो में अधिकारी स्तर से जानबूझकर देरी की जाती है
ताकि समबन्धित पक्ष अधिकारी के पास आये और कुछ भेंट अर्पण करे l भू-उपयोग प्रतिरूप
में तीस हजार प्रति बीघा का रेट सरेआम है l दाखिल ख़ारिज के मामलों में राजस्व
संहिता 2006 में स्पष्ट रूप से यह तय किया गया है कि किस भूमि में किसका हित निहित
हो सकता है और किसका नही , इसके बावजूद नायब तहसीलदार द्वारा किसी भी व्यक्ति की
आपत्ति " साक्ष्य प्रस्तुत करें" नोटिंग करके स्वीकार कर ली जाती है और
फिर मौल-भाव शुरू होता है l उसके लिए मामलों को जानबूझकर लंबित किया जाता है l
राजस्व संहिता में विवादित मामलों का 90 दिन में निस्तारण करने की समय सीमा तय कर
दी गई है लेकिन फिर भी मामलों को लटकाकर रखा जाना आम बात है l ऐसे भी कई उदहारण
सामने है जिनमे नायब तहसीलदार द्वारा दाखिल-ख़ारिज करने के अपने ही आदेश को स्वयं
ही अग्रिम आदेशों तक स्थगित कर दिया गया l जबकि यह पदानुक्रम के सिद्धांत के खिलाफ
है l कोई अधिकारी यदि स्वयं ही अपने आदेश को स्थगित कर देगा तो इससे न्याय का
सिद्धांत ही चरमरा जायेगा और भ्रष्टाचार पनपेगा l
मलाईदार पोस्टिंग: भ्रष्टाचार
की चाबी
मलाईदार पोस्टिंग की
अवधारणा भ्रष्टाचार की चाबी है l असरदार और रसूखदार, अधिकारी मलाईदार पोस्टिंग के
लिए हर कीमत देने को तैयार रहते हैं l ऐसे मामलों में स्थानांतरण नीति की खूब
धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं l उत्तर प्रदेश में अधिकांश अधिकारी/कर्मचारी अपेक्षाकृत
अधिक संपन्न पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पोस्टिंग चाहते हैं ताकि वे भी इसकी समृद्धि
की मलाई में हिस्सेदारी निभा सके l वास्तव में यदि देखा जाए तो स्थानांतरण नीति का
लाभ भी यही रसूखदार लोग पैसे के बल पर लेते हैं l हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार
ने ट्रान्सफर-पोस्टिंग में भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए नई स्थानान्तरण नीति घोषित
की है जिसके अनुसार कोई अधिकारी एक जनपद में तीन तथा मंडल में 6 वर्ष से अधिक
नियुक्त नहीं रह सकता है l यदि नीति घोषित होने के एक सप्ताह के अन्दर स्थानांतरण
कर दिए जाते तो इस बात की लगभग नगण्य संभावना रहती कि ट्रान्सफर-पोस्टिंग में कोई
भ्रष्टाचार हो पाता ! लेकिन अब ऐसी खबरे आ रही हैं कि घाघ एवं शातिर लोगों ने
भ्रष्टाचार के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी जी की मुहिम को पलीता लगाने का इस नीति के
अंदर ही जुगाड़ तलाश कर लिया है l ट्रान्सफर के लिए सिफारिश के मामले बहुत कम सामने
आएंगे, मलाईदार पोस्टिंग के लिए कथित मार्किट में कुछ दलाल एक तय धनराशि पर मनचाही
जगह ट्रान्सफर के लिए पैकेज लिए घूम रहे हैं l नीति के अनुसार ट्रान्सफर के लिए
ऑनलाइन विकल्प पहले भी मांगे जाते रहें है लेकिन कम ही मामलों में इसका पालन हुआ
है और अधिकांश मामलों में ट्रान्सफर के लिए
"ऑनलाइन" विकल्प देने वाले अधिकारीयों को पोस्टिंग नही दी गई हैं
l देखना यह होगा कि क्या नए परिवेश में इस पर अमल होगा ?
ट्रान्सफर-पोस्टिंग
में भ्रष्टाचार रोकने के लिए सरकार को स्थानातरण नीति के तहत " ऑटो-ट्रान्सफर " के बारे में विचार
करना चाहिए l ताकि किसी विभाग की अलग-अलग शाखाओं में चक्रानुक्रम में अधिकारीयों
का स्वतः स्थानातरण होता रहे l कोसिस की जानी चाहिए कि अधिकारीयों की पोस्टिंग
उनके भौगोलिक क्षेत्रों (जैसे पूरब, पश्चिम आदि ) में ही की जाए, इस प्रवृत्ति से "खसोटू"
प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है l
दफ्तरों के हजार
चक्कर: भ्रष्टाचारोन्मुख करते हैं
किसी जायज़ अधिकार/ काम के लिए सरकारी
कर्मचारियों द्वारा नागरिकों से सरकारी
दफ्तरों के इतने चक्कर लगवाएं जाते हैं कि थक हार कर व्यक्ति ऐसा रास्ता तलाशता है
जिससे उसका काम आसानी से हो जाये और रोज रोज उसे किसी दफ्तर के चक्कर न लगाने पड़े
l यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जिस पर अंकुश
लगाने का कोई तरीका नही खोजा गया है l इसका निवारण सिर्फ सरकारी कार्यों को
"समयबद्ध ऑनलाइन निस्तारण" से ही किया जा सकता है l जीएसटी के लागू होने
से इस प्रवृत्ति पर बहुत हद तक लगाम लग जाएगी l
सार यह है कि जब तक आम आदमी की मानसिकता में
परिवर्तन नही आयेगा और वह यह संकल्प नही लेगा कि मै भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडे जा
रहे इस युद्ध में अपने पूरे मनोयोग से भाग लूँगा, तब तक जीत कठिन है l इस लड़ाई में
हमें तात्कालिक रूप से हानि भी उठानी पड सकती है लेकिन इसके परिणाम सुखद होंगे और
भारत को एक वैभवशाली राष्ट्र के रूप में पुनर्स्थापित करेंगे l
(# लेखक वाणिज्यकर
विभाग उ.प्र. में सहायक आयुक्त हैं l यहाँ प्रकाशित लेख लेखक की निजी राय हैं l)
2 comments:
well said sir...
well said sir...
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