किसी कथन/कानून/श्लोक/आयत आदि की व्यक्तिगत विवेचना(Interpretation) महत्वपूर्ण होती है. विवेचक जब किसी चीज की विवेचना करता है तो उसके अपने कुछ निहित हित होते है हालांकि यह उसके व्यक्तिगत ज्ञान और विवेक का परिचायक भी होता है..इस्लाम के विषय में गैर-इस्लामिक और इस्लामिक दोनों ही लोगों की जानकारी की अपनी अपनी सीमाएं है.पवित्र कुरआन मूल रूप से अरबी भाषा में लिखी गई. खासकर भारत में मुसलामानों में भी अरबी के कम ही जानकार है.इसलिए कुरआन के अन्य भाषाओं के अनुवादित संस्करण ही उपलब्ध हैं जिनमे आयातों की विवेचना अनुवादक के विवेक एवं ज्ञान से प्रभावित है.अरबी में अल्लाह,तुर्की में तारक,उर्दू में खुद एवं रब उपरवाले को दिए गए विशेषण हैं. खासबात यह है की ऊपर वाला शब्द सभी धर्मों को आपस में जोड़ता है क्योंकि ईश्वर के पर्यायवाची के रूप में सभी इस शब्द को स्वीकार करते है.कोई भी धर्म नफ़रत को मान्यता नहीं देता है,इस्लाम का तो शाब्दिक अर्थ ही सलामत है अर्थात सभी की सलामती को मानने वाला पंथ.गाँवों में तो अभिवादन के रूप में साहब सलामत शब्द खूब प्रयोग किया जाता है जिसका अर्थ है क्या आप सलामत हैं? जेहाद शब्द धर्म के अन्दर आ गई कुरीतियों से धर्म की रक्षा के लिए किये जाने वाले प्रतिधर्म सुधार प्रयासों के लिए होता है लेकिन कुछ उन्मादी एवं ज़ाहिल इस शब्द की गलत व्याख्या करते है..वंदेमातरम् गाने को लेकर भी कम अकलियत वाले हाय तौबा मचाते है. यदि मुहम्मद साहब ने किसी उपकारी के लिए सम्मान प्रदर्शित करने की मनाही की होती तो नमाज़ अता करने में धरती की और सिर झुकाने और दंडवत करने की प्रक्रिया ही न होती, अप्रत्यक्ष रूप से तो नमाज़ अता करते वक्त ही एक सच्चा अल्लाह का स्मरण करते हुवे दिन में पांच बार धरती माँ का भी सजदा करता है. वन्देमातरम् के ठेकेदारों से कहीं ज्यादा एक सच्चा मुसलमान माँ की वंदना करता है..इबादत और वंदना में एक मूल फर्क है जिसे हम सब यदि समझ ले तो गैर जरुरी विवाद खड़े नहीं होंगे-इबादत सिर्फ उपरवाले की होती है और वंदना आप चाहे जिसकी करे...मा,बाप,मातृभूमि..आदि.
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